ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-14

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -14
17 सितंबर, 2020

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

लद्दाख की मृदभांड परंपरा
मुक्ताकाश प्रदर्शनी कुम्हार पारा से

लद्दाख में, लिकिर एकमात्र ऐसा गांव है जहां मिट्टी के बर्तन बनाने की परंपरा अभी भी प्राचीन काल से प्रचलन में है। यह गांव लेह-श्रीनगर राजमार्ग पर लेह से लगभग 52 किमी दूर स्थित है। स्थानीय लोगों के अनुसार, राजा ड्रॉग्स्पा बुमडले (14 वीं शताब्दी ईस्वी सन्) ने इस गांव को मिट्टी के बर्तन बनाने का काम सौंपा था। उस समय, बड़े पैमाने पर मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता था। इस प्रकार, पूरा गाँव शाही परिवार के साथ आम जनता के लिए भी मिट्टी के बर्तन बनाने में लगा हुआ था। यहाँ के कुम्हार पूरे लद्दाख में अपने शिल्प कौशल के लिए जाने जाते थे, और दूर-दराज के स्थानों तक इनके बर्तनों की आपूर्ति की जाती थी।

बर्तन बनाने के लिये मिट्टी सस्पोल और बास्गो गाँवों से प्राप्त की जाती है, जहां यह छोटे-छोटे खण्डों में उपलब्ध है। सभी प्रकार की अशुद्धियों को हटाने के बाद मिट्टी को तैयार किया जाता है । पानी के साथ 2:1 अनुपात में जसा (सफेद मिट्टी) और पेमा (रेतीली मिट्टी) का मिश्रण अच्छी तरह से गूंथ लिया जाता है। बर्तनों को बनाने के लिए लकड़ी के थापी, पकी मिट्टी की थापी, स्थानीय घास स्पोतो से बने ब्रश, अलग-अलग प्रकार की लेपनिया, बर्तनों को चमकाने के लिए बकरी की खाल, साँचे और चाक का इस्तेमाल किया जाता है।

स्कोर – एक प्रकार का चाक है, जिसका उपयोग बर्तन को आकार देने के लिए किया जाता है। इसका ऊपरी भाग पकी मिट्टी का बना होता है जिसके तल पर एक लोहे की धुरी लगी होती है तथा निचला भाग (पटक) जो कि लकड़ी का बना होता है उसको जमीन में गाड़ दिया जाता है। बर्तन को आकार देते समय इसे हाथ से

घुमाया जाता है और बालू रेत या राख से भर दिया जाता है। पू – एक पकी मिट्टी का सांचा होता है, जिस पर बर्तनों को आकार दिया जाता है। यह कुम्हार की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न आकारों का होता है। सांचे को दृढ़ता से बालू रेत या राख पर जमा दिया जाता है, ताकि उसका मुख अच्छे से गड़ जाए ताकि वह ठीक से पकड़ में आ सके और मध्य भाग से उसके विचलन को रोका जा सके। साँचा अपनी धुरी में सही घूम रहा है या नहीं इसको जांचने के लिए भी उनका अपना तरीका है जिसमें वे अपनी बड़ी ऊँगली का प्रयोग करते है।

मिट्टी की गांठ को सांचे पर रखकर पकी मिट्टी की थापी से पीट-पीटकर चपटा बनाया जाता है जो कि घूमते हुए चाक की सबसे ऊपरी सतह पर होता है। जब यह एक आकार ले लेता है, तो इसे थोड़ा सूखने के लिए निकाला जाता है। उसके बाद, इसे फिर उल्टाकर सांचे पर रखा जाता है। बर्तन को मजबूत करने के लिए समय-समय पर बालू रेत लगाया जाता है और आकार देने के लिए लकड़ी की थापी से पीटकर आकार दिया

जाता है। बाद में मिट्टी जोड़कर किनारे खड़े किए जाते हैं। अंत में बकरी की खाल के टुकड़े से बर्तन को चिकना किया जाता है। कुम्हार कुछ बर्तनों को विशेष रूप से चायदानी के हत्थे (लुंग) और अलंकृत टोंटी (खमाहु) को कलात्मक रूप देते हैं। टोंटी का आधा भाग पक्षी और आधा भाग जानवर के रूप में सजाया जाता है। यह एक कल्पित प्राणी है जिसका निवास स्थान ग्लेशियरों में माना जाता है और लद्दाख के बौद्ध धर्म में इसे शुभ माना जाता है। जिन्हें रंग-बिरंगे पत्थरों से सजाया जाता है।

वे घरेलू और अनुष्ठान उद्देश्यों के लिए चुरंग (छोटा दीपक), धूप स्टैंड, चम्बलिंग (स्पाउट पिचर), सैंगस्पॉपर (स्टैंड पर कटोरी), टपरीअल मेसलैंग (चूल्हा के साथ टोंटीदार केतली), झोबकार (मंथन के लिए बड़े बर्तन), ज़िम (छांगतैयार करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक टोंटी के साथ बर्तन) काकड़ुर (थुक्पा तैयार करने के लिए बड़ा कटोरा), अलचे (दही तैयार करने के लिए कटोरा), रिक्जा (थुक्पा खाने के लिए छिछला कटोरा), चाजेन (नमक रखने के लिए बर्तन), चसक (पानी भंडारण के लिए बर्तन), कॉर्टेक्स (मक्खन वाली चाय के लिए स्टैंड सहित ढक्कनदार कटोरा), स्कीन (छोटे जंगली जानवरों के आकृतियाँ), ज़ो (छोटे घरेलू जानवरों की आकृतियाँ) सजावटी सामान जो बच्चों के लिए खिलौने के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।

वे बर्तनों को पकाने के लिए एक खुले आवे विधि का पालन करते हैं और बर्तनों को ग्लेज़िंग भी करते हैं। ग्लेज़िंग पदार्थ को ऊष्ण स्रोत से इकट्ठा किया जाता है और इसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि यह एक मोटा तरल रूप में न आ जाए। गर्म तरल पदार्थ को ब्रश की मदद से आधे-पके बर्तन पर लगाया जाता है। शीशे का आवरण ठंडा होने और सूखने के बाद, बर्तन को फिर से खुले आवे में पकने के लिए रखा जाता है।

यदि हम शिल्प के सांस्कृतिक पहलू पर गौर करें तो यह एक पवित्र शिल्प है । हालांकि इस शिल्प से संबंधित कोई विशेष देवता नहीं है, फिर भी दया के देवता, अवलोकितेश्वर इसका रक्षक माना जाता है। आज भी बर्तनों को आवे में रखने से पहले नाज़ोम ज्योतिषी द्वारा शुभ दिन निर्धारित किया जाता है। बौद्ध अपने घर में लूंगजेट नामक मिट्टी के कटोरे की पूजा करते हैं। यह भगवान बुद्ध का भीख का कटोरा है। मिट्टी के बर्तन और दीये का इस्तेमाल कुछ कर्मकांडों और संस्कारों में भी किया जाता है।

Online Exhibition Series-14
17th September, 2020

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

Pottery Tradition of Ladakh
From Open Air Exhibition Kumhar Para

In Ladakh, Likir is the only village where pottery making tradition is still practised from ancient times. It is located about 52 km from Leh, on Leh-Srinagar highway. According to the locals, King Dragspa Bumdle (14th century CE) assigned pottery making to this village. At that time, earthen wares were used on a large scale. Thus, the entire village was engaged in pottery making for royal as well as general public usages. The potters were well known in entire Ladakh for their craftsmanship, and pots were supplied to distant places.

The raw material has been collected from village Saspol and Basgo, where it is available in patches. The clay is prepared after removing all the impurities. The mixture of jasa (white clay) and pema (sandy clay) in 2:1 ratio with water is kneaded properly. Very simple tools like wooden beater, burnt clay anvil, brush made of local grass spoto, varieties of spatula, goat skin for polishing, mould and a turn disk are used for making pottery.

Skor is a turn disk, used for shaping the pot. The upper part is made of terracotta with an iron pivot fixed on its bottom and the lower part which is embedded in ground made of wood called patak. It is hand rotated and filled with loose sand or ash, when shaping the vessel. Poo is a baked clay mould on which the pots are shaped. It is made of different sizes according to the potter’s requirement. Poo is firmly fixed on it, in an inverted position, so that its open mouth is buried in the ash to hold it properly and prevent from sagging or deviating from the centre. They have their own way to check the centre point of the poo with the help of middle figure.

The clay lump is flattened by an anvil on the terracotta mould which is fixed at the top surface of revolving disk. When it takes a shape, it is taken out to dry a little. After that, it has been again placed on the mould on an inverted position. To strengthen the pots, sand applied time to time and shaped it with a wooden beater. The sides are raised by adding clay coils subsequently. Finally the vessel is smoothen by a piece of goat leather. The potters give artistic form to some vessels by providing handle (lung) and ornamental spout (khamahu) particularly to the teapots. The spout is shaped as half bird and half animal, a mythical creature whose abode is believed to be in the glaciers and held auspicious by all the Buddhist of Ladakh. Those are decorated with colourful stones.

They prepare pots for household and ritual purposes churcung (small lamp), incense stand, chambling (spouted pitcher), sangspor (bowl on stand), teprialmeslang (spouted kettle with hearth), zobkar (big vessels for churning buttermilk), zim (vessel with a spout used for preparing chang), kakadur (big bowl for preparing thukpa), Alche (bowl for preparing curd), Rikza (a shallow bowl for eating thukpa), chajlook (pot for keeping salt), chusak (pot for storing water), kortex (lidded bowl with stand for butter tea), skin (small wild animal figures), zo (small domestic animal figures) decorative items used as toys for children

They follow an open firing method to bake the pots and also glazing the vessels. The glazing substance is collected from the hot spring area and boiled until it gets a thick liquid form. The hot liquid is applied on semi-baked pot with the help of a brush. After cooling and drying of glaze, the pot is again placed for open firing.

So far as the cultural facet of the craft is concern, it is a sacred craft. Though there is no special deity associated to the craft, Aavalokiteshwar, the god of mercy, is believed to be the protector of the craft.  Till now an auspicious day is prescribed by the Nazom the astrologer to fire the unbaked vessels. The Buddhists worship an earthen bowl called lunhgzet in their home. It is the begging bowl of Lord Buddha. The earthen vessels and lamps are also used in certain rituals and rites during natal, mortuary and many other ceremonies.

Ladakhi women from Likir village preparing clay by removing impurities at IGRMS premises
A potter shaping the clay over a baked clay mould at IGRMS premises
Potters from Likir village engaged in pottery making at IGRMS premises
A potter shaping the pot with a wooden beater at IGRMS premises
Tsering Dolma, a ladakhi woman decorating the pot with the help of wooden spatula at IGRMS premises
Rigzen Namgyal, a potter from Likir village decorating the spout of a tea pot at IGRMS premises
Potters collecting pots after open firing in IGRMS premises
Varieties of pots used in household and ritual purposes displayed at Kumhar Para open air exhibition in IGRMS premises
Introductory video on Pottery Tradition of Ladakh
From Open Air Exhibition Kumhar Para
by Dr. P. Anuradha, Museum Associate, IGRMS, Bhopal