ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-15

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -15
24 सितंबर, 2020

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

शैलकला – एक साझा धरोहर

दुनिया के बहुत से हिस्सों में सार्वभौमिक रूप से अस्तित्वमान शैलचित्र या राक पेंटिंग जिन्हें पुरातत्व की तकनीकी शब्दावली में Petroglyphs कहा जाता है। अपने प्रथम प्राकट्य में भौतिक संस्कृति की वस्तु होकर भी सादगी, खूबसूरती और अनेक रूपता अर्थात diversity or multiplicity of forms and patterns के कारण सामान्य दर्शक से शोधकर्ता, कला मर्मज्ञ और विद्वानों तक को आकर्षित ही नही करते बल्कि कहीं न कही उनके अतीत के साथ भी सम्वाद करते हैं। दुर्गम बीहड़ों और पर्वतों की कन्दराओं में रचे गये ये चित्र हजारों वर्ष पूर्व तब रचे गये थे जब दुनिया और समाज आज की तरह राजनीतिक सीमाओं में बंटे नहीं थे। प्रागैतिहासिक काल के विभिन्न चरणों में प्रस्तर से धातु युग तक रचे गये ये चित्र विषय वस्तु, प्रतिमान, सामग्री, रंग और प्रायोजनों की विविधता में भी हमें ‘अनेकता में एकता’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का संदेश देते हैं

देश और राज्य की सीमाओं से परे शैल कला किसी विषय विशेष या वर्ग की नही बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति की धरोहर है जिसे उसके प्राकृतिक परिवेश में ही देखना और समझना उचित ही नही सम्भव भी है। यह एक ऐसी अनूठी साझा सांस्कृतिक धरोहर है जो एक स्वतंत्र विषय हो कर भी प्रागैतिहास, पुरातत्व, मानवशास्त्र, कला, समाजशास्त्र और विज्ञान के अध्ययन को सरल और बोधगम्य बनाने में सहायक है तो दूसरी ओर इनमें मौजूद प्रतिमानों के निर्माण के तरीके, प्रयुक्त रंग, प्रतिमानों की समानता और विविधता, अर्थों की व्यापकता भले ही अपने आप में आनंद के साथ एक बौद्विक चुनौती प्रस्तुत करते हों लेकिन भारत और मध्य भारत के विषेष संदर्भ में तो क्षेत्र में सांस्कृतिक परम्पराओं की निरंतरता हमें परत-दर-परत सांस्कृतिक अतीत के उस छोर तक पहुंचने में मदद करती है जहां न लेखन था और न कथन लेकिन चिंतन अवश्य था और उसी चिंतन कंथन की भौतिक अभिव्यक्ति सुन्दर शैलचित्र है जिनका दस्तावेजीकरण, प्रलेखन और अध्ययन उसके अनाम सर्जकों के गुजरने या उनकी रचना के कई सदियां ही नही युग बीत जाने के बाद हुआ और आज भी जारी है।

दुनिया के कई संग्रहालयों में विभिन्न संदर्भों में शैलकलाओं को प्रतिकृति के रूप में प्रस्तुत किया गया है किन्तु यह इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय का सौभाग्य है कि इसे ये प्राकृतिक रूप से ही प्राप्त हो गये हैं किन्तु इन चित्रित शैलाश्रयों का महत्व केवल उनके मार्फ़त दुनिया में अनूठे संग्रहालय का दर्जा प्राप्त करने के लिये ही नही बल्कि ये इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि ये एक मानवशास्त्रीय संग्रहालय है और चूंकि मानवशास्त्र मनुष्य का उसकी समग्रता में अध्ययन करता है और मानव का उद्विकास, संस्कृति और समाज का अध्ययन उसके परंपरिक क्षेत्र है इस स्थिति में ये चित्रित शैलाश्रय तत्कालीन मानव द्वारा उसकी भौतिक और अभौतिक संस्कृति के कथन हैं। इनके अध्ययन से न केवल पुरातन जनसंख्याओं की जीवन शैली, मानसिकता, रीति-रिवाज लोकाचार और विश्वबोध की जानकारी प्राप्त होती बल्कि वर्तमान लोक समुदाओं और संस्कृतियों के लिये अपेक्षाकृत अधिक व्यापक बैज्ञानिक आधार भी तैयार होता है।

Online Exhibition Series-15
24th September, 2020

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

Rock Art : A Shared Heritage

Universally, existing in several parts of the world Rock painting are also called Petroglyphs in technical terminology of archaeology. In-spite of being an object of material culture in its first appearance and due to simplicity, beauty, variety and diversity or multiplicity of forms it attracts a vast range of audience including general observer to scholars, art admirers and researchers but also converse with their past at some extent. These paintings were prepared thousand years back in ravines of tough and inaccessible mountains when the universe and society was not divided in to political boundaries unlike today. Composed in various stages of prehistoric period from stone to metal, these paintings even being diverse in subject matter, pattern, material, color and purpose convey the message of university in diversity and ‘Vasudhaiv Kutumbakam’.

Beyond the boundaries of nation and state the rock art is not associated with a specific discipline or a particular group or class instead it is heritage of entire humankind. It will be more appropriate and possible to see and understand it in its natural surroundings. It is that unique shared heritage that even being an independent discipline is very much helpful in making study of archeology, anthropology, art, sociology and science easier and comprehensible, on the other hand the methods of construction of pattern present in them colors, similarity and diversity of patterns, vastness or connotation of meanings may present a blend of intellectual challenge and joy but in India and in special reference to central India the continuity of cultural traditions in the region helps us to gradually access to that end of cultural past where there was neither the text nor words but only meditation and these beautiful rock paintings are the articulation of that thought process which could been recorded, documented and studied only after the passing away of their unnamed composers or over centuries of their creation which is still continue.

In several museums of the world rock art has been presented in form of replica in various contexts but the Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya is fortunate enough that it has got the same in its natural form, however the significance of these painted rock shelters is not only to achieve the status of a unique museum in the world but also because it is an ethnographic museum and as anthropology is the study of humankind in its holistic form and the evolution of human kind, culture and society are its conventional domains, in that case these painted rock shelters are statement of the tangible and intangible culture. Its study not merely provides information on the lifestyle, psychic, customs, folkways and world view of ancient population but also prepares more comprehensive, more scientific basis for contemporary folk communities and cultures.

Glimpses of prehistoric site at IGRMS
Glimpses of prehistoric site at IGRMS
Glimpses of prehistoric site at IGRMS
Glimpses of prehistoric site at IGRMS
Glimpses of prehistoric site at IGRMS
Glimpses of prehistoric site at IGRMS
Glimpses of prehistoric site at IGRMS

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