ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-19

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -19
22 अक्टूबर, 2020

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मिथकवीथी मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
जैतिर देव की कथा

मिथक वीथी

मिथकवीथी मुक्ताकाश प्रदर्शनी में जनजातियों तथा लोक समुदायों की अंतरात्मा और जीवन दृष्टि की अनुगूँजों को स्थानीय कलारूपों के माध्यम से चित्रित किया गयाहै। जनजातियों और लोक मिथकों के विषय पर आधारित, यह अब तक की देश में अपनी तरह की एक मात्र प्रदर्शनी है। सामान्यतः यह माना जाता है कि किसी भी संस्कृति को समझने के लिए उसके मिथकों को जानना व समझना अति आवश्यक है अतः किसी न किसी तरह से जनजातियों और लोक समुदायों के जीवन और संस्कृति का मिथकों के साथ गहरा संबंध होता है। भारत के लगभग सभी समुदायों में पूर्वज पूजा का प्रचलन है जो कि इन समुदायों की भलाई और बुरे प्रभावों से सुरक्षा के लिए की जाती है। पूर्वजों के मिथको से जुडी ऐसी ही एक कहानी है जैतिर देव की कथा, जो महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग में प्रचलित है।

चित्रकथी शैली में चित्रित जैतिर देव की यह कथा पूर्व जों के कालांतर में देव-रूप में पूजे जाने का उदाहरण है। जब जैतिर बहुत ही छोटे थे तभी उनकी बहन का विवाह किसी सुदूर गाँव के श्रीमंत से हो गया था। कुछ ही समय पश्चात उसके माता-पिता का देहांत हो गया। उसके बाद एक दयालु चरवाहे ने उस कापालन-पोषण किया। हालाँकि, चरवाहा भी लंबे समय तक जीवित नहीं रहा। उसके पश्चात जैतिर व चरवाहे का बेटा, जो कि बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे, बड़े होने पर दोनों एक दिन जैतिर की बहन की खोज में निकल पड़े। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जब रात होने को थी तो वे नारुल नामक गाँव में एक श्रीमंत के घर पर रुक गए। उन्होंने घर की महिला को अपने साथ में लाये चावल पकाने को कहा। चावल खाते ही वो महिला रो पड़ी और बोली “इस भात में से मेरे गाँव के तालाब के पानी की सुगंध आती है”।  यह सुनकर भाई ने अपनी बहन को पहचान लिया और कुछ दिनों के लिए घर चलने को अनुरोध किया। लेकिन बहन के पति को एक अजनबी की यह बात बिलकुल नहीं जँची और उसका गुस्सा इतना बढ़ा कि उसनेजैतिरका सिर काट दिया। हतप्रभ चरवाहा मित्र जैतिर के सिर को लेकर अपने गाँव तुदास की ओर भागा। रास्ते में जहां उसका कम्बल गिरा वह स्थान कांबळे वीर तथा जहाँ उसका डंडा गिरा वह स्थान डांड या चेगाडवो कहलाये। अपने गाँव पहुंच कर चरवाहे ने भी प्राण त्याग दिये। जिस स्थान पर चरवाहे ने प्राण त्यागे उसी स्थान पर जैतिर के मंदिर एवं चरवाहे की समाधि का निर्माण किया गयाहै। बाद में नारुल में भी एक मंदिर का निर्माण किया गया। इन दोनों स्थानों पर प्रत्येक वर्ष वैशाख माह की अमावस्या को एक मेले का आयोजन होता है। मंदिर का पुजारी लकड़ी का बड़ा-सा जैतिर का मुखौटा पहन कर नृत्य करता है तथा लोगों के दुख-पीड़ा का निवारण करता है।

The myth of Jeteer depicted in Chitrakathi style at mythological trail, IGRMS

Online Exhibition Series-19
22nd October, 2020

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Open Air Exhibition Mythological Trail:
The Myth of Jeteer

Mythological Trail

Mythological Trail exhibition portrays the inner essence of the tribal and folk life and their worldviews through indigenous art forms. On the theme of tribal and folk myths, so far this is the only exhibition of its kind in the country. It is believed that a basic understanding of myths is expedient to the desire of knowing a culture. Somehow the myths are deeply intertwined with life and culture of the tribal and folk communities. Ancestral worship is prevalent among most of the  communities throughout India. They are worshipped for the well-being and protection from evil influences. One such story of ancestor and the associated myth which is prevalent in Sindhudurg of Maharashtra is “The myth of jeteer”.

The myth of Jeteer is painted in the Chitrakathi style tells about the eventual worshiping of the ancestors as god. When Jeteer was very small, his sister was married and sent off to a distant village. Soon after, his parents left this world, and he was brought up by a kind shepherd. Though the shepherd did not live long, by the time Jeteer was grown up enough to take the shepherd’s son and set out in search of his sister. In a village called Narul, they stopped at a house for the night. They asked the woman of the house to cook for dinner the rice they were carrying.When the woman sat down to eat, tears started rolling down her eyes. And she said to herself, the rice smells the lake water in my village, the brother recognized her long lost sister and pleaded her to accompany him home for a few days. The brother in law however got furious with the stranger’s behaviour and cut off his head. The shocked shepherd ran towards his village Tudas with the severed head in this hands. On his way the places where his blanket and stick fell came to be called Kamble veer and DandyacheGadwo respectively. Somehow he held his breath till his village, but on reaching there fell down dead. This is the place where a temple in memory of Jeteer is built and few steps before it stands his shepherd friend’s Samadhi or the grave. Later there was a temple constructed at Narul. At both these places, there is a fair on the new moon of baisakh (April- May) when the temple priest dances wearing Jeteer’smask and rids people of their misery.

Introductory video on the myth of Jeteer depicted in Chitrakathi style at mythological trail, IGRMS
From Open Air Exhibition Mythological Trail:
The Myth of Jeteer

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