15 -21 जून / June, 2020


सप्ताह का प्रादर्श

इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा कोरोना वायरस (कोविड-19) के प्रभाव से उत्पन्न कठिन चुनौतिपूर्ण समय में जनता को संग्रहालय से ऑनलाइन के माध्यम से जोड़ने एवं उन्हें संग्रहालय के ऐतिहासिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के बारे में गहरी समझ को बढ़ावा देने के उद्देश से शरू की गई नवीन श्रृंखला ‘सप्ताह का प्रादर्श’ के अंतर्गत इस माह के तृतीय सप्ताह के प्रादर्श के रूप में नागालैंड के कोनयक नागा के नागाओं की शिरोच्छेदन ट्रॉफी को दर्शकों के मध्य प्रदर्शित किया गया।

20 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक नागालैंड की नागा जनजातियों में शिरोच्छेदन एक परंपरा के रूप में प्रचलित था। इस परंपरा के अवशेष अभी भी विभिन्न नागा जनजातियों  की कला और शिल्प परंपराओं में देखे जा सकते हैं, जिन्हें उन्होंने सामाजिक प्रस्थिति के चिन्ह के रूप में संरक्षित किया है।

कोनयक नागा संस्कृति में कपाल का एक विशिष्ट स्थान था क्योंकि यह पौरुष से संबंधित होने के साथ-साथ गोदना प्रथा से भी संबंधित था। एक पुरुष अपने शरीर पर गोदना तभी करा सकता था जब उसने एक मानव के शीर्ष का आखेट कर लिया हो। इसे सामाजिक प्रस्थिति का सर्वोच्च स्वरूप माना जाता था। कोनयक नागाओं में मानव कपाल को दो तरह से संरक्षित किया जाता था प्रथमत:, रिश्तेदारों के कपाल इस विश्वास के साथ संरक्षित किए जाते थे कि एक व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसकी आत्मा उसके कपाल में निवास करती है। द्वितीय, दुश्मनों के कपाल वीरता और उपलब्धि के साक्ष्य के रूप में उनके युवा गृह मोरूंग में प्रदर्शित किए जाते थे।

नागालैंड के चांगलांगशु ग्राम से संकलित यह प्रादर्श एक नागा योद्धा की गौरवपूर्ण संपत्ति है जिसने वर्ष 1895 में फोम जनजाति के एक व्यक्ति का शिरोच्छेदन किया था। चांगलांगशु नागालैंड के मॉन जिले का एक बड़ा कोनयाक गांव है। यह गांव अपने प्रसिद्ध योद्धाओं, जिन्होंने अन्य समुदायों और गांवों से युद्ध किया, के कारण प्रख्यात है। प्रादर्श के कपाल में ललाट अस्थि में एक छेद है, जो संभवतः तीव्र वेग वाले नुकीले तीर से बने घाव का स्थायी चिन्ह है। इसे नासिका और चक्षु गुहा से केन डालकर भैसें के सींगो से बांधकर एक ट्रॉफी के स्वरुप में अलंकृत किया गया है।ट्रॉफी का हत्था बांस की चौखट से तैयार किया गया है।

नोट: ऊपर दी गई जानकारी में एक नागा विद्वान डॉ. जी. कनाटो चौफी का योगदान भी सम्मिलित है।

दर्शक इस प्रादर्श का अवलोकन मानव संग्रहालय की फेसबुक साईट के माध्यम से घर बैठे कर सकते है।

Exhibit of the Week

Due to spread of covid-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Exhibit of the Week’ to showcase its collection from all over India. Under this series, The Nagas’ Head hunting trophy of the Konyak Naga Tribe from Nagaland, India was displayed in the audience as the 03rd Exhibit of the June, 2020 through Facebook.

Headhunting was prevalent among the Naga Tribes of Nagaland as a tradition until the first half of the 20th century. The remnants of this tradition can still be seen in various art and craft traditions among the different Naga tribes who have preserved them as a mark of social status.

The human skull had a special place in the Konyak Naga culture since it was related to masculinity, and most importantly, with the tattoo tradition. A person could tattoo his body only when he has taken a human head, which was considered an ultimate form of social status. The Konyak Naga preservation of human skull was of two types. First, skulls of relatives were preserved since they believe that the soul of a person resides in the skull after the death of a person; secondly, the skulls of enemies were displayed in their youth dormitory called Morung as a sign of bravery and achievement.

This object is a pride possession of a Naga warrior collected from the Changlangshu village in Nagaland, who took the head of a person from the Phom tribe in 1895. Changlangshu is a large Upper Konyak village in Mon district, Nagaland. The village was known for its famous warriors who waged war with other communities and villages. The skull has a hole in the frontal bone, possibly the permanent mark of a wound created by the spikes of a pointed dart or an arrow. The skull is transformed as a trophy by decorating with the horns of Buffalo. It is tied with cane twisting across the nasal and orbital cavity. The handle of this trophy is prepared with a cross-frame of bamboo props.

Note: The information given above is also substantiated by a Naga scholar Dr. G. Kanato Chophy.

Visitors can see this object from home through the Facebook site of the museum.

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