ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-22

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -22
12 नवम्बर, 2020

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

वीथि संकुल भवन की दीर्घा क्रमांक 02 से
झारखंड की उथलू बिरहोर जनजाति

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के वीथि संकुल भवन की दीर्घा क्रमांक 02 आदिवासी और ग्रामीण समाजों की पारंपरिक आजीविका एवं आवास प्रतिमानों को दर्शाती है। इस दीर्घा में कुल 667 प्रादर्श  हैं जो विभिन्न पर्यावरणिक क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और लोक समुदायों की पारंपरिक आर्थिक पारंपरिक जीवन शैली गतिविधियों पर आधारित उत्तरजीविता  रणनीतियों और विशिष्ट आजीविका प्रकारों को दर्शाते हैं।  

        इस प्रस्तुति में, झारखंड की  बिरहोर जनजाति के संग्रह से  उनकी जीवन तरीकों को दर्शकों के लिए प्रस्तुत किया गया है। संग्रह में उनका आवास, उपकरण, हथियार, अस्त्र, फंदे और जाल तथा  टोकरियाँ शामिल हैं। प्रदर्शनी के रोचक पहलुओं में से एक है कुंबा नामक जुड़वां झोपड़ी। इस विशिष्ट आवास प्रकार को संग्रहालय में स्वयं उथलू बिरहोर समुदाय के लोगों ने तैयार किया था।

        बिरहोर मुख्य रूप से झारखंड के हजारीबाग, रांची और सिंहभूम जिलों में केंद्रित हैं। वे ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल राज्यों में भी विस्तृत हैं। यह जनजाति दो भागों में विभक्त है  (अ) उथलू बिरहोर या घुमन्तु जो अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं, और (ब) जंघी बिरहोर जो अब स्थायी जीवन जीने लगे है। अब इन्हें इन राज्यों में PVTG के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड राज्य में उनकी आबादी लगभग 10,000 है। बिरहोर मुंडारी शब्द बिर और होर से मिलकर बना है जिसमें  बिर का अर्थ है वन और होर का अर्थ है लोग और इस तरह बिरहोर का शाब्दिक अर्थ है। “वन के लोग”। इन्हें अन्य स्थानीय समुदायों द्वारा मांकड़िया और चोपदार के नाम से भी जाना जाता है।

        उथलू बिरहोरों की अस्थायी बस्ती को टांडा कहा जाता है। इसमें कुंबा ( परिवार का आवास ) के कुछ समूह शामिल हो सकते हैं, जिसके मुखिया या “नाया” नाम के पुजारी होते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उनमें आध्यात्मिक दुनिया से जुड़ने और आत्माओं के क्रोध  से उत्पन्न दुर्भाग्य को दूर करने की क्षमता होती है। बरसात के मौसम को छोड़कर, बिरहोर जंगलों में अपने परिवारों और सामान के साथ छोटे-छोटे समूहों में प्रवास करते हैं। पुरुष आत्माओं को विभिन्न अवसरों पर बलि चढ़ाने के लिए मुर्गियाँ, आखेट उपकरण, शस्त्र और फंदे लेकर चलते हैं।  इसके विपरीत, महिलाएं अपने सिर पर खजूर की पत्तियों की चटाई, टोकरियाँ, ओखली और मूसल, कुछ अनाज और खाना पकाने के बर्तनों में पानी लेकर चलती हैं।  बच्चे  छोटे जानवरों को पकड़ने में प्रयुक्त फंदे लेकर चलते हैं।

        बिरहोर छोटे जानवरों का शिकार करने और शहद, विभिन्न प्रकार के खाद्य और जड़ी-बूटियों को इकट्ठा करने के साथ-साथ सामूहिक प्रयास से  बंदरों को पकड़ने के भी शौकीन हैं। वे भोजन और रस्सी तैयार करने में प्रयुक्त चॉप और सियाली की तलाश में जंगलों में विचरण करते हैं और पास के साप्ताहिक बाजार में, इन उत्पादों को बेचकर अपनी आवश्यकताओं की अन्य वस्तुएं  खरीदते हैं। वन संसाधनों में आती कमी और उनकी जीवन पध्दति में हस्तक्षेपों के कारण बिरहोर अब  धीरे-धीरे एक अलग प्रकार की अर्थव्यवस्था और संसाधनों पर निर्भर होते जा रहे हैं।

Online Exhibition Series-22
12th November, 2020

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Veethi Sankul’s Gallery No. 2 of IGRMS
The Uthlu Birhors of Jharkhand

Veethi Sankul’s Gallery No. 2 of IGRMS presents the livelihood and settlement patterns of the tribal and rural societies. It houses 667 objects and presents the tribal and folk communities living in different ecological settings. The survival strategies and distinctive livelihood patterns based on their traditional economic activities are presented in this gallery.

In this episode, a collection from the Birhor tribe of Jharkhand showcasing their traditional way of foraging life is presented for the visitors. The collections include simple households, tools, weapons, snares, baskets, and nets used by the tribe in their foraging activities. One of the exciting aspects of the exhibition is the display of a twin hut known as Kumba. This typical house type was prepared by the Uthlu Birhors themselves at the time of making the exhibition.

The Birhors are concentrated mainly in the Hazaribag, Ranchi, and Singhbhum districts of Jharkhand. They are also scattered in the states of Odisha, Chhattisgarh, and West Bengal. The tribe is divided into two – (a) the Uthlu Birhor or the wanderers who move from one place to another for their foraging activities and (b) The Janghi Birhors or the settlers started living a settled life. Now they are categorized as the PVTG’s in these states. According to the 2011 census, their total population in the State of Jharkhand is approx 10,000. Birhor derived from the Mundari words Bir and Hor; Bir means Forest and Hor mean people, and the literal meaning of Birhor is “Forest People.” They are also known as Mankaria and Chopdar by other communities.

The temporary settlement of the Uthlu Birhors is called Tanda. It may consist of a few groups of Kumbas (family house) headed by the headman or the priest called Naya, who is believed to have the ability to connect with the spiritual world and avert the misfortunes from the ill-ailments of the spirits. Except in the rainy season, they move from jungle to jungle in small groups with families and their belongings. Men carry fowls for occasional sacrifices to the spirits, hunting tools, weapons, and nets. In contrast, women carry on their heads the items like palm-leaf mats, baskets, wooden mortar & pestle, baskets with grains they have, and cooking pots for carrying water. Children are allowed to carry snares to train them for catching small animals. 

Apart from hunting small games and collecting honey, fibers, edibles, and herbs, they are fond of catching Monkeys. It is performed with a collective effort. They wander from one forest to another in the quest for food and collection of Chops and Siali by which they prepare ropes. In the weekly market nearby, they sell these products and do purchase their requirements. With a deep erosion of forest resources and other interventions to their life-ways, they are slowly moving to a changing economy and resources. 

Introductory video on the Veethi Sankul’s Gallery No. 2 of IGRMS-The Uthlu Birhors of Jharkhand