30 नवम्बर से 06 दिसम्बर, 2020 तक/ 30th November to 06th December, 2020

‘सप्ताह का प्रादर्श’
(30 नवम्बर से 06 दिसम्बर, 2020 तक)

कोविड-19 महामारी के प्रसार के कारण दुनिया भर के संग्रहालय बंद है लेकिन यह सभी अपने दर्शकों के साथ निरंतर रूप से जुड़े रहने के लिए विभिन्न अभिनव तरीके अपना रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने भी इस महामारी द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियो का सामना करने के लिए कई अभिनव प्रयास प्रारंभ किए है। अपने एक ऐसे ही प्रयास के अंतर्गत मानव संग्रहालय ‘सप्ताह का प्रादर्श’ नामक एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। पूरे भारत से किए गए अपने संकलन को दर्शाने के लिए संग्रहालय इस श्रंखला के प्रारंभ में अपने संकलन की अति उत्कृष्ट कृतियां प्रस्तुत कर रहा है जिन्हें एक विशिष्ट समुदाय या क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में योगदान के संदर्भ में अद्वितीय माना जाता है। यह अति उत्कृष्ट कृतियां संग्रहालय के ‘AA’और ‘A’ वर्गों से संबंधित हैं। इन वर्गों में कुल 64 प्रादर्श हैं।

चर्रक्का / उरूली, केरल के पीतल का एक पारंपरिक बर्तन

चर्रक्का, केरल के मूसारी समुदाय द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला   पीतल का एक पारंपरिक बर्तन है। उथले तले और चौड़े खुले  मुंह वाले इस भारी एवम् गोलाकार बर्तन को आसानी से लाने ले जाने के लिये दोनों तरफ हत्थे लगे हुए हैं। यह बर्तन  इस क्षेत्र के लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और धार्मिक गतिविधियों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह विभिन्न आकारों के होते हैं।  परंपरागत रूप से चर्रक्का का उपयोग सामुदायिक दावतों, त्योहारों, विवाह और मंदिर में बड़े पैमाने पर खाना पकाने के लिए किया जाता है। मंदिरों में अभिषेक के लिए, पायसम जैसे भोजन तैयार करने तथा आयुर्वेदिक औषधि तैयार करने के लिए भी  इसे उपयोग  किया जाता है।  स्वागत समारोहों में प्रवेश द्वार को भव्य स्वरूप प्रदान करने के लिए इसमें पानी भर कर फूलों से सजावट की जाती है। इस तरह की व्यवस्था किसी भी स्वागत समारोह के परिवेश और प्रवेश द्वार को एक आकर्षक रूप प्रदान करती है।  इसका उपयोग आंतरिक सज्जा में भी किया जाता है। इसे लॉस्ट वैक्स प्रोसेस  से ढलाई करके बनाया गया है।

आरोहण क्रमांक – 89.183
स्थानीय नाम – चर्रक्का / उरूली
समुदाय – मुसारी
स्थानीयता – त्रिचूर, केरल
माप – ऊँचाई – 31 सेमी, व्यास – 120 सेमी, गोलाई – 340  सेमी।
श्रेणी – ‘ए’

OBJECT OF THE WEEK
(30th November to 06th December, 2020)

Due to spread of COVID-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Object of the Week’ to showcase its collection from all over India. Initially this series will focus on the masterpieces from its collection which are considered as unique for their contribution to the cultural history of a particular ethnic group or area. These masterpieces belong to the “AA” & “A” category. There are 64 objects in these categories.

Charrakka/Uruli, a traditional brass vessel of Kerala

Charrakka is a traditional brass vessel used by the Musari community of Kerala. It is a heavy vessel, circular in shape having shallow base and wide open mouth. It has handles on either side for lifting and carrying purpose. The vessel occupies a prominent place in the socio- cultural sphere and religious practices of the people of this region. It is found in different sizes. Traditionally Charrakka is used for large scale cooking during communal feasts, festivals, marriage parties and temple feasts. Charrakka is widely used in temples for Abhisheka purposes, preparing food like payasam. It is also used for preparing medicine. By filling it with water, floats of flowers are prepared for grand welcome ceremonies at the entrance and also used as  interior décor element. This kind of arrangements provide a pleasant look to the surroundings and entrance in any welcoming ceremony. It is made by means of the lost wax process of casting.

Acc. No. –  89.183
Local Name  –  Charrakka,Uruli
Tribe/Community – Musari
Locality   –  Trichur, Kerala
Measurement – Height – 31  cm., Diameter – 120 cm , Sphericity-  340 cm.
Category –   ‘A’

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