ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-27

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -27
(17 दिसम्बर, 2020)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
बस्तर का दशहरा रथ

देश के अन्य हिस्सों में, दशहरा  “राम” या देवी “शक्ति” की विजय के  उत्‍सव के रूप में  मनाते है, परन्तु  बस्तर में दशहरा, बस्‍तर की स्थानीय जनजातियों की आराध्य देवी “दंतेश्वरी माई” के पूजन एवं अनुष्ठान कर रथ संचालन के रूप में मनाने का पर्व है। भगवन जगन्नाथ ने बस्तर पर शासन करने के लिए माई सुभद्रा को सम्मान स्वरुप बारह पहिया वाला रथ भेट किया था  जिसे माई सुभद्रा ने बस्‍तर के महाराजा पुरुषोत्तम देव को उपहार में दिया था | इस रथ को  राजा ने दंतेश्वरी माई के चरणों में  अर्पित  कर दिया तभी से बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर  में दशहरा उत्‍सव में देवी जी डोली रख कर  रथ परिक्रमा की शुरुवात हुई |

  बारह चक्के के रथ बनाने एवं परिक्रमा करने  में होने वाली दिक्कतों के कारण राजा ने दो रथ बनाने की अनुमति दी जिसमे रैनी रथ – आठ पहिया वाला बड़ा रथ विजय रथ जिसे दशहरा उत्सव में,  और चार पहिये वाला छोटा रथ फूल रथ,जिसे गोंचा उत्सव में चलाते हैं| रथ निर्माण श्रम विभाजन की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है जो निर्दिष्ट गांवों और निर्दिष्ट समुदायों के बीच काम को  बाट कर पूरा किया जाता है | जंगल की लकड़ी संग्रह करने के बाद पाटा जात्रा का आयोजन किया जाता है पाटा लकड़ी का उपयोग रथ के पहियों के निर्माण में किया जाता है इस कार्य को ग्राम बेल्लारी के चालीस से पैतालीस ग्रामीण मिलकर करते है |

रथ निर्माण की समग्र जिम्मेदारी पारंपरिक रूप से झाड़उमरगाँव और बेडा उमरगाँव के सवारा नाइक की होती है | एक सौ तीस के आसपास ग्रामीण इन दोनों गांवों से आकर रथ का निर्माण करते हैं |रथ के निर्माण कार्य शुरू होने से पहले श्रमिकों के उपकरणों की पूजा कर एक बकरे की बलि दी जाती है और शराब, चूड़ियाँ, कपूर, अगरबत्ती, नारियल और बाल देवी को भेट करते हैं। इसे बरसी उतरनी कहते है | रथ के पहिये बनाने और छिद्रों के छिद्रित करने से पहले पुनः देवी को भेट चढ़ाते है  इसे नर फोडनी,कहते हैं|

रैनी रथ की साइज़ 32 फिट लम्बा और 18 फिट चौड़ा एवं 18 फिट ऊँचा होता है फूल रथ की साइज़ 32 फिट लम्बा 17 फिट चौड़ा और 17 फिट ऊँचा होता है | इस प्रकार रथ का निर्माण पूरा कर दशहरा उत्‍सव में देवी की डोली को आसन मे प्राण प्रतिस्ठा करके रखकर पूण्‍य क्षेत्र में रथ की परिक्रमा की जाती है|

यह उत्‍सव “पितृ-मोक्ष अमावस्या” के दिन “काछन-माई” की पूजा के साथ प्रारंभ होता है। पहले मृत आत्माओं की पूजा की जाती है। तत्‍पश्‍चात मध्य रात्रि में “घाट-न्योता” की रस्म निभाकर, दूसरे दिन सुबह-सुबह “कलश” ‘वरुण’ (पानी के देवता) की स्थापना करके चौदह ब्राम्हणों द्वारा पूजा अर्चना कर, शाम को हल्बा जनजाति के साधु द्वारा “जोगी-बिठाई” (तपस्यारत) जाती है। इसके बाद, सात दिनों तक दंतेश्वरी देवी की पूजा की जाती है और उत्सव में रथ द्वारा पूण्‍य क्षेत्र की परिक्रमा की जाती है। त्यौहार के दसवें दिन कुंवारी लड़कियों की पूजा की जाती है; और शाम को तपस्वी तपस्या से उठकर बैठता है| जिसके बाद “मावली-परघाव” होता है। इसमें दंतेवाड़ा से श्रद्धापूर्वक दंतेश्‍वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत कर नए कपड़े में चंदन का लेप लगाकर उस मूर्ति को पुष्पाच्छादित कर दिया जाता है।

ग्यारहवें और बारहवें दिन “भितर-रैनी” और “बहार-रैनी” की रस्में होती हैं और रथ की  परिक्रमा जारी रहती है। तेरहवें दिन सुबह “काछन-जनना” का आयोजन होता है और शाम को सिरा-सार चौंक स्थित भवन में राजा या प्रशासन से जुडे लोगो द्वारा गाँव माझी , पुजारी, नाइक, पटेल, कोटवार, ग्राम सेवक और अन्य ग्रामीणों के समस्‍यो का सुनकर उसका निदान किया जाता है और उपहार भी दिया जाता है । चौदहवें दिन, “गंगा-मुंडा” तालाब में विभिन्न स्थानों से लाए गए ग्राम देवताओं की विदाई अनुष्‍ठानिक प्रक्रिया के द्वारा की जाती है “मा-दंतेश्वरी” आपने स्थान दंतेवाड़ा प्रस्थान करती है  और इसके साथ ही जगदलपुर में आयोजित 75 दिवसीय दशहरा महोत्सव संम्पन्न होता है|

Online Exhibition Series-27
(17th December, 2020
)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From the Open Air Exhibition of IGRMS
Dussera Chariot of Bastar

The Dussera is celebrated in various parts of India to mark the victory of god “Rama” or the goddess “Shakti” over the evil powers. But in Bastar, Chhattisgarh it is an occasion to propitiate the supreme goddess “Danteshwari Mai” of the local pantheon. It is believed that “Bhagawan Jagannath” had gifted a chariot having twelve wheels to “Mai Subhadra” to rule the Bastar which she gifted to Purushottam Dev- the King of Bastar. And then the king offered it to “Danteshwari Mai” the supreme goddess of Bastar. Since then, during Dussera the Rath Parikrama is celebrated in Jagdalpur, the district headquarters of Bastar by placing palanquin of Goddess Danteshwari on it. As it was difficult to construct such a huge single chariot, the King allowed to construct two smaller chariots i.e. “Raini Rath” (Vijay Rath)-the eight wheel chariot used during Dussera festival  and the “Phool Rath”- the smaller four wheel chariot used in Goncha festival.  

The construction of “Rath” is a systematic process with division of labour and distribution of work among the specified villages and specified communities. People of Billari village organise “Pata Jatra” for collection of wood from Jungle to construct the wheels. The overall responsibility of the construction is traditionally vested in the “Savara Naiks” of villages “Jharumargaon” and “Beda Umargaon”. Villagers from these villages take up the construction of the chariot. Before starting the construction the tools and equipments are worshipped and a goat is sacrificed and liquor, bangles, camphor, incense sticks, coconut and hairs are offered to goddess. It is called Barsi Utarani. The same offerings are again given on the occasion occasion of Nar Fodni.

The size of “Raini Rath” is about 32 feet long, 18 feet wide and 18 feet high. The size of “Phool Rath” is about 32 feet long, 17 feet wide and 17 feet high. After completing the construction the palanquin is kept on the chariot and taken for the Parikrama during Dussera festival.

Introductory video on the Dussera Chariot of Bastar at IGRMS open air exhibition