ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-28

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -28
(24 दिसम्बर, 2020)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
पारंपरिक गालो आवास

गालो,  अरुणाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण जनजातियों में से एक है, जो राज्य के पश्चिम सियांग जिला में बड़े पैमाने पर केंद्रित है। यह जनजाति तानी जनजाति के पूर्वज-अबोतानी के वंशज है। ये राज्य के अन्य जिलों में भी फैले हुये हैं। 

गालो गाँव अक्सर नदी के समीप स्थित होते हैं और साथ ही ये अपनी बसाहट के लिये पहाड़ियों के किनारे पर काफी ऊँचाई वाले स्थान का चयन करते है। ये उस क्षेत्र को पसंद करते हैं, जहां पानी और खेती योग्य भूमि सुगमता से उपलब्ध हो सके। पारंपरिक गालो आवास एक विशाल संरचना है जो स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्रियों जैसे- लकड़ी, बांस, बेंत और छप्पर में लगाने वाली ताड़ के पत्तों से बनाया जाता है। यह आयताकार और लकड़ी, बांस के सीढ़ीनुमा खंभों पर स्थित है  जिसकी ऊँचाई भूमि की ढाल पर निर्भर करती है। फर्श या समतल सतह बांस की बीम की एक के ऊपर एक स्थित अनेक पंक्तियों की व्यवस्था के बाद निर्मित किया जाता है। समतल तल के नीचे के खंभों में लकड़ी की सुदृढीकरण व वास्तुशिल्प स्थानीय वास्तुकला को विशिष्टिता प्रदान करते है ।

निर्माण से काफी पहले ही कच्चे माल की व्यवस्था कर ली जाती है। जरूरत के अनुसार वृक्ष, बांस और छप्पर छाने के पत्तों को जंगल से पर्याप्त मात्रा में एकत्र और लम्बी अवधि के लिए तैयार संरक्षित कर लिया जाता है । वे चंद्र चक्र गणना की अपनी पारंपरिक विधि के आधार पर निर्माण सामग्री से कार्य प्रारम्भ करते हैं। गालो जनजाति में आवास निर्माण एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से सफल होता है। आवश्यक समग्रियों की पूर्ति मिलजुल कर आपसी सहयोग से की जाती है। निर्माण के दौरान, एक कुशल बुजुर्ग के द्वारा निर्माण कार्य का नेतृत्व किया जाता है। आवास निर्माण पूर्ण होने के बाद, परिवार और वन देवताओं के सम्मान में अनुष्ठान किए जाते हैं।

गालो आवास में परिवार के पुरुष और महिला सदस्यों के लिए स्पष्ट रूप से अलग-अलग स्थान चिन्हित होते हैं। इस पारंपरिक प्रथा को पवित्रता की अवधारणा से जुड़ा माना जाता है। आवास  में महिलाओं एवं पुरुषों हेतु दो अलग-अलग प्रवेश द्वार हैं जिसकी अपनी अलग सीढ़ी और दरवाजें  है । मुख्य हॉल के अंदर दो चिमनियां बहुत ही खास हैं। यह घर में देवताओं व आत्माओं के लिए आरक्षित स्थानों की पवित्रता बनाए रखने के लिए उनके पूर्वजों द्वारा निर्धारित नियमों और पारंपरिक रीति-रिवाजों को संदर्भित करता है। परिवार के मुखिया की बैठने के स्थान के पीछे एक पवित्र स्थान आरक्षित होता है, जहां जबड़े, खोपड़ी और अनेक प्रतीक चिन्ह और शिकार के उपकरण सजाए जाते हैं। महिला सदस्यों के लिए इस पवित्र स्थान में प्रवेश करना वर्जित है। आवास में सबसे कोने का स्थान परिवार के देवता, न्योदे हरे के लिए होता है।

पिछले कुछ दशकों में उनके वास्तुशिल्प रूपों, सदियों पुराने पारंपरिक प्रथाओं में अनेक परिवर्तन हुए हैं। आधुनिक साधनों और जीवन के स्तर ने धीरे-धीरे गालो जीवनशैली के तरीके को एक नई जगह में रूपांतरित करना शुरू कर दिया है।

Online Exhibition Series-28
(24th December, 2020
)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From the Open Air Exhibition of IGRMS
THE TRADITIONAL GALO HOUSE

The Galo is one of the important tribes, largely concentrated in the West Siang district of Arunachal Pradesh. The tribe is among the descendants of the great ancestor of the Tani tribe – the Abotani. They are also distributed in other districts of the state.

Galo villages are often situated near the river, and the site with considerable height on the spur of hills is generally chosen for habitation. They prefer the area where there is easy access to water and suitable land for cultivation. The traditional Galo house is a massive structure built with locally available materials like wood, bamboo, cane, and palm leaves as thatching material. It is rectangular in plan and stands on stilts of wooden and bamboo poles, the height of which depends on the gradient of an undulating terrain of the land. The floor or plain surface is obtained after the arrangement of several rows of bamboo beams rested one upon the other. The pillars below the plain floor consists of wooden reinforcements that provide a unique appearance in this vernacular architecture.

Arrangement of raw materials is made well in advance before the construction takes place. The required quantity of tree, bamboo, and thatching leaves is adequately collected from the jungle and seasoned for its longevity. They adopt traditional methods of felling construction materials based on their age-old practices of reading the lunar cycle. Construction of a house among the Galo tribe is not an individual affair. It needs a collective effort of the villagers. Material requirements are fulfilled by the mutual co-operation of borrowing and sharing. During the construction, a skillful elder takes the lead to guide the work. After completion of the house, appropriate rituals are conducted to appease the family and forest deities.

The Galo house is well designated into spaces for the male and female members of the family. This traditional practice is believed to be associated with their concept of sanctity and purity. The house has two different entrances approached by staircases and doors separately meant for men and women. The two fireplaces inside the main hall are very special. It determines the rules and traditional customs set by their ancestors to maintain the sanctity of spaces reserved for the deities and spirits in the house. A sacred area is reserved behind the family head’s sitting place where jaws, skulls, and many insignias and hunting tools are decorated. It is taboo for the female members to enter this sacred place. The extreme corner of the sidewall is the abode Nyode Hare, the family deity.

In the last few decades, many changes happened in their architectural forms, age-old traditional practices. Modern means and living standards have gradually started transforming a new space of Galo’s way of life.