28 दिसम्बर, 2020 से 3 जनवरी, 2021 तक /28th December, 2020 to 3rd January, 2021

‘सप्ताह का प्रादर्श’
(28 दिसम्बर, 2020 से 3 जनवरी, 2021 तक)

कोविड-19 महामारी के प्रसार के कारण दुनिया भर के संग्रहालय बंद है लेकिन यह सभी अपने दर्शकों के साथ निरंतर रूप से जुड़े रहने के लिए विभिन्न अभिनव तरीके अपना रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने भी इस महामारी द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियो का सामना करने के लिए कई अभिनव प्रयास प्रारंभ किए है। अपने एक ऐसे ही प्रयास के अंतर्गत मानव संग्रहालय ‘सप्ताह का प्रादर्श’ नामक एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। पूरे भारत से किए गए अपने संकलन को दर्शाने के लिए संग्रहालय इस श्रंखला के प्रारंभ में अपने संकलन की अति उत्कृष्ट कृतियां प्रस्तुत कर रहा है जिन्हें एक विशिष्ट समुदाय या क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में योगदान के संदर्भ में अद्वितीय माना जाता है। यह अति उत्कृष्ट कृतियां संग्रहालय के ‘AA’और ‘A’ वर्गों से संबंधित हैं। इन वर्गों में कुल 64 प्रादर्श हैं।

फिंगारुक / फिरुक
अनुष्ठानिक टोकरी

फिंगारुक / फिरुक मणिपुर की घाटी में  निवासरत मैतेई समुदाय द्वारा उपयोग की जाने वाली विशेष भंडारण टोकरी है। फिरूक का शाब्दिक अर्थ है फी अर्थात कपड़ा और रूक अर्थात टोकरी। फिरुक का उपयोग  केवल विवाह समारोह के अवसर पर मिठाई, पान और सुपारी , फल – फूल, कपड़े और आभूषण वर के घर से वधू के घर ले जाने के लिए किया जाता है। पारंपरिक पोशाक में महिलाएं विवाह के इन उपहारों को वर के परिवार द्वारा आयोजित चल समारोह हईचिंगपॉट ( विवाह समारोह से पहले आयोजित एक समारोह) के दौरान और लुहोंगबा (विवाह) के शुभ दिन पर लेकर चलती हैं। एक प्रथा के अनुसार, वह महिला जो बारात का नेतृत्व करती है, उर्वरता और समृद्धि का आशीर्वाद देने के लिए उसके माता-पिता, सास – ससुर , पति और संतान जीवित होने चाहिए। इस फ़िरुक में कुछ मात्रा में चावल, तम्बाकू का पत्ता, बीज युक्त कपास, पान-मनाओ ( एरम प्रजाति का एक छोटा कंद), शिंग-मनाओ (छोटा अदरक) और दो सिक्कों के साथ एक के ऊपर एक रखी गई मैतेई थुम (नमक) की टिकिया होनी चाहिए। इन वस्तुओं को सफेद कपड़े से लपेट कर तथा बांधकर टोकरी में भरा जाना चाहिए। फिर इसे ऊपर से सफेद कपड़े से ढक कर ढक्कन लगा दिया जाता है और इस तरह यह चल समारोह का  पहला फिरुक बन जाता है। विवाह के पांच दिन के बाद, वधू के परिजन फिरूक खोलने के लिए वर के घर पर जाते हैं और उन सभी वस्तुओं का अवलोकन कर नवविवाहित जोड़े का भाग्य बताते हैं। टोकरी पर हीरे के आकार की आकृतियों को ट्विलिंग विधि से स्वयं तैयार किया जाता है जहां ताने में बहुत कौशल पूर्ण ढंग से प्राकृतिक काले रंग से रंगे बाने को पिरोया जाता है। माना जाता है कि ये रूपांकन पारंपरिक वस्त्रों पर बनाई जाने वाली आकृतियों से लिए गए हैं।

आरोहण क्रमांक :  78.105
स्थानीय नाम: फिंगारुक / फिरुक, अनुष्ठानिक टोकरी
जनजाति/समुदाय : मैतेई
स्थान: इंफाल, मणिपुर
माप: ऊंचाई : 46 सेमी;   परिधि
: 120 सेमी;
श्रेणी : ’A‘ 

OBJECT OF THE WEEK
(28th December, 2020 to 3rd January, 2021)

Due to spread of COVID-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Object of the Week’ to showcase its collection from all over India. Initially this series will focus on the masterpieces from its collection which are considered as unique for their contribution to the cultural history of a particular ethnic group or area. These masterpieces belong to the “AA” & “A” category. There are 64 objects in these categories.

PHINGARUK/PHIRUK
Ceremonial Basket

Phingaruk/Phiruk is the special storage basket used by the Meitei community in the valley of Manipur. The etymological meaning of Phiruk came from Phi means cloth and ruk means basket. Phiruk is used only at the time of marriage function for carrying sweets, betel leaves and nuts, fruits and flowers, clothes and ornaments, from the residence of the groom to the bride’s residence. Women folk in traditional attire carry these marriage presentations during the procession held by the family of the groom during Heichingpot (a ceremony held prior to marriage function) and on the auspicious day of Luhongba (Marriage). According to a customary practice, the woman who led the marriage procession must have her parents, parent-in-laws, husband and children alive to bless with fertility and prosperity. This Phiruk should contain some quantity of rice, tobacco leaf, raw cotton containing seed, Pan-manao (a small tuber of the species arum), Shing-manao (small ginger) and two cakes of Meitei Thum (salt) overlapping one another with two coins inside. These items should be wrapped and tied with white cloth and stuff in the basket. It is then covered with white cloth from the rim and lidded to represent the first Phiruk carried in the procession. On the 5th day after marriage, family and relatives of the bride visits groom’s house to open the Phiruk and observes all those items to spell the fortunes of the newlywed couple. The diamond shaped designs on the basket are indigenously prepared by twilling method where naturally dyed black colour wefts are skillfully inserted in the weave. These designs are believed to have taken out from the traditional textile motifs.

Accession No.:   78.105
Local Name – PHINGARUK/PHIRUK, Ceremonial Basket
Tribe/Community – Meitei
Locality – Imphal, Manipur
Measurement  -Height -46 cm, Circumference of rim
–  120 cm
Category –  ‘A’

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