ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-29

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -29
(31 दिसम्बर, 2020)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय मिथक वीथी मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
कच्छ, गुजरात के कुम्हारों के मिथक

मिथक वीथी मानव संग्रहालय की एक रोचक एवं अनूठी प्रदर्शनी है जहां मिथकों और किंवदंतियों को विभिन्न माध्यमों जैसे टेराकोटा, पत्थर, धातु, लकड़ी आदि में दर्शाया गया है। मिथक का कोई मूर्त रूप नहीं होता है। इसलिए उसे हमेशा व्यक्त नहीं किया जा सकता है। इस प्रदर्शनी के मुख्य उदेश्यों में से एक उद्देश्य मिथक के अमूर्त पहलुओं को मूर्त रूपों में बदलना है ताकि जनमानस उसमें छिपे भाव को अच्छी तरह से समझ सकें। इस प्रदर्शनी में कई जनजातीय तथा लोक कलाकारों ने अपने मिथकों, मान्यताओं, अनुष्ठानों को अपने-अपने माध्यम व विशिष्ट पारम्परिक शैली में मूर्त रूप दिया है। इनमें से कुछ तो मिथकों का निरूपण करते आये है, किन्तु कई ऐसे भी है जिन्होंने पहली बार ऐसा किया है।

इस संदर्भ में की गई पहल पर आधारित कहानी मानव संग्रहालय के मिथक वीथी प्रदर्शनी में देखने को मिलती है जोकि कुम्हारों के मिथक से जुडी हुई है । यहां प्रदर्शित मिट्टी के बर्तन गुजरात के कच्छ जिले के भुज तालुक के एक छोटे से गाँव खवड़ा के हैं। जोकि रण के निकट स्थित है। यहाँ पर पानी और अनाज के भंडारण के लिए विभिन्न प्रकार के मटके, तश्तरियां, बड़े थाल, कटोरे, दीयें आदि बनाए जाते हैं।

खावड़ा गांव की महिला सारा इब्राहिम विगत 40 वर्षों से मृद्भाण्ड शिल्प को जीवंत रखे हुए है। मध्यप्रदेश सरकार ने उनके मिट्टी शिल्प और बर्तनों पर चित्रकला में निरंतर रचनात्मकता कार्यों के प्रति समर्पण भाव के लिए उन्हें वर्ष 2001- 02 में देवी अहिल्या राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया। वह पिछले तीस सालों से इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के साथ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने समय-समय पर मानव संग्रहालय द्वारा भारत के विभिन्न हिस्सों में आयोजित कार्यशालाओं और कलाकार शिविरों में भाग लिया। वह कई बार संग्रहालय के शैक्षणिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनीं और प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया। सारा इब्राहिम के पति इब्राहिम कासम भी मिट्टी के बर्तन बनाने में कुशल हैं। ये दोनों ही यों से चली आ रही धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं । पुरुष मिट्टी को गढ़ने का काम करते हैं तथा महिलाएं बिना पहिये के प्लेट, कटोरे आदि बर्तन बनाती हैं और सजावट करती हैं।

बर्तनों को आम तौर पर एक मोटी दीवार और तले के साथ बनाया जाता है, जबकि गर्दन और मुंह को अंत में आकार दिया जाता हैं। आधे सूखे बर्तन को अंदरूनी भाग में पत्थर की एक गोल थापी से सहारा देकर बाहरी सतह पर लकड़ी के पटटे से पीटा जाता है। जिसके पीटने से यह मिट्टी फैलती है और बर्तन को एक आकार देती है। इस प्रक्रिया से बर्तनों की दीवार भी पतली की जाती है। महिलायें सफ़ेद बाहरी सतह वाले बर्तनों पर लाल एवं काले रंग से जबकि लाल बाहरी सतह वाले बर्तनों पर काले एवं सफ़ेद रंग से चित्र बनाती है। चित्र बनाने के लिए ब्रश के रूप में बांस की टहनियों का उपयोग किया जाता है। सभी डिज़ाइनों को संकेंद्रित वृत्तों के अंदर बनाया जाता है जिसे स्थानीय रूप से “लिख” कहा जाता है। इनके अधिकांश डिज़ाइन प्रकृति से प्रेरित होते हैं जो इनकी बुनाई में भी दिखाई देते हैं।

एक दिलचस्प कहानी को कलाकार सारा इब्राहिम ने दीवार पर मिट्टी में दर्पणों के साथ कम उभरे नक्काशी कार्य के रूप में दर्शाया है, जो आम तौर पर कच्छ और काठियावाड़ के क्षेत्र में दीवारों, दरवाजों, आलों और भंडारण पात्रों में पाया जाता है। कहानी कुछ इस प्रकार से है :

पुराने समय में कुम्हार के बर्तन पकने में छ:महीने लगा करते थे। एक दिन कुम्हार ने अपनी भट्टी सुलगाई ही थी कि भागते हुए कुछ किन्नर आये जिनका पीछा राजा के सैनिक कर रहे थे। जान बचाने के लिये वे कुम्हार के लाख मना करने पर भी आवे में रखे बड़े मर्तबानों में जा छिपे।

राजा के लोग कुम्हार के घर की छान-बीन कर चले गये। जलते हुए आवे में किसी के छिपे होने की बात तो कोई सोच भी नहीं सकता था। आवा सुलगने के बाद थके-हारे कुम्हार की आंख लग गई। कुछ समय बाद स्वप्न में कुम्हार के कानो में आवाज पड़ी “आवे में रखे तुम्हारे बर्तन सुनहरे हो गए है” लेकिन उसने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। फिर आवाज आयी “तुम्हारे बर्तन रुपहले हो गये” लेकिन कुम्हार ने इसे भी सुना-अनसुना कर दिया। थोड़ी देर बाद वही आवाज फिर बोली “तुम्हारे बर्तन आधे कच्चे, आधे पक्के निकले” यह सुन कुम्हार आवे की तरफ भागा और उसने पाया कि जिन बर्तनो में किन्नर छिपे हुए थे, वे कच्चे रह गए और इस तरह उनकी जान बच गयी।

तब से कुम्हार का आवा एक दिन में ही पक जाता है पर कुछ बर्तन सदा कच्चे रह जाते है। कुम्हार चाहता तो अपने लिए सुनहरे या रुपहले बर्तन चुन सकता था, लेकिन उसने नुकसान झेलते हुए भी किन्नरों का जीवन बचाने को चुना। कच्छ में आज भी किन्नर,कुम्हार और उसकी पत्नी को अपने माता-पिता के रूप में मानते हैं, महत्वपूर्ण अवसरों पर उनका आशीर्वाद लेते हैं और उन्हें पैसे और कपड़े भेंट करते हैं।

Online Exhibition Series-29
(31st December, 2020
)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Open Air Exhibition Mythological Trail of IGRMS
Potter’s myth of Kutch, Gujarat

Mythological trail is an interesting and unique exhibition of IGRMS where myths and legends are depicted in different media like terracotta, stone, metal, wood etc. Myth does not have any tangible forms. So it cannot be expressed always. One of the main objectives of this exhibition is to transform the intangible aspects into the tangible forms so that people can understand the myths very well. In this exhibition the folk and tribal artists from various parts of the country have attempted to give form to their myths, beliefs and rituals in their respective mediums and styles. Some have tried it before while some others have dealt with it for the first time here.

In this context one such initiative can been seen in the mythological trail of IGRMS is the story of potter’s myth. The pottery displayed here belongs to Khavda, a small village in Bhuj taluk of Kutch district, Gujarat. It is located very near to the Rann of Kutch. A wide variety of vessels, such as pots for storing water and grains, plates, big dishes, bowls, lamps etc. are made.

Sara Ibrahim, a female potter from Khavda village has been continuing the craft for more than 40 years now. She has been honoured by Devi Ahilya National Award in the year 2001-02 by the Govt. of Madhya Pradesh for her dedication and continuous creativity towards clay craft and painting of pots. She has been associated with IGRMS since last thirty years, attended several workshops and artist camps organised by IGRMS in various parts of India. She became a part of museum’s education programmes time to time and imparted training to participants. Sara Ibrahim’s husband Ibrahim Kasam is also an expert in making pottery. Both of them are taking forward a legacy that has been passed down from generations. Men do all the throwing work, the women make plates, dishes and bowls without wheel and do all the surface decorations.

The pots are roughly made with a thick wall and base, while the neck and mouth are given final shape. The half dried pot is beaten with wooden beater on outer surface while holding a round smooth dabber on inner. This clay expands and gives a shape to pot. The wall of the pots is also thinned by this process. Women paint delicate red and black designs on white coated pottery or black and white designs over the red coated pottery. Simple bamboo twigs are used as brush for painting. All the designs are made with in concentric circles locally called “likh”. Most common designs are inspired from nature which is visible in their weaving pattern also.    

An interesting story is depicted on the wall by the artist Sara Ibrahim in the pattern of mud- mirror bas relief decoration that is usually found in the walls, doorways, niches and storage containers in the region of kutch and kathiawad.  The story goes like this:

In the ancient times, generally, it took six months for a potter to bake his pots. Once it so happened that the potter had just pre-heated his furnace, a group of eunuchs (kinar) took refuge inside his pots kept in the furnace. These eunuchs were followed by the soldiers.

The king’s men entered into potter’s house to search for the eunuchs. In spite of all the efforts of the potter, soldiers searched all over the house and left. None could conceive of the kiln as a hiding place. After lighting the fire, the tired potter feels asleep. In his dreams, the potter heard a voice announcing that his pots had turned golden, potter was not much surprised with the announcement. After a while the same voice said “your pots have turned silver.” The potter did not pay any attention. For the third time the voice was heard saying that half of his pots have baked and others have remained unbaked. At this, the potter rushed to the furnace and was delighted to find the eunuchs alive inside the unbaked pots.

Since then, it is a great pleasure for the potter that the pots take only a day to get baked, but some pots are always left half- baked. The potter could have chosen the golden or silver pots, but he chose to save a few lives at the cost of riches. In Kutch even today, the eunuchs regards the potter and his wife as their parents, seek their blessings on important occasions and offer money and clothes to them.

Introductory video from Open Air Exhibition Mythological Trail of IGRMS
on Potter’s myth of Kutch, Gujarat