माह का प्रादर्श श्रृंखला – EXHIBIT OF THE MONTH- जनवरी/January 2021

माह का प्रादर्श श्रृंखला
EXHIBIT OF THE MONTH
जनवरी/January 2021

परा – समृद्धि का प्रतीक

समुदायः लोक
क्षेत्रः मन्नाडी, केरल
आरोहण क्र.: 92.288
संकलनकर्ताः श्री राकेश भट्ट

​पर्रा या परा एक मापक पात्र है जो फसल कटाई के पश्चात धान मापने के लिए परंपरागत रूप से उपयोग किया जाता रहा है। केरल के कृषि जीवन से जुड़ा हुआ परा मापन की आधुनिक प्रणालियों के आगमन तक कई घरों में उपयोग किया जाता था। पुराने समय में अच्छी फसल आने के बाद गांव वासी स्थानीय मंदिर में उत्सव के आयोजन के लिए देवी – देवताओं को एक या अधिक परा धान/चावल अर्पित करते थे। त्योहारों के दौरान निकलने वाली शोभायात्रा के अवसर पर पारंपरिक हिंदू घरों के सामने धान एवं अन्य सामग्रियों से भरे परा देखे जा सकते हैं।

​एक परा में 8 या 10 इदांगाझी (एक छोटा मापक पात्र) के बराबर धान/चावल आता है। इसे समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। बड़े धान के खेतों को उनमें बोये जाने वाले बीज की मात्रा अनुसार 100/200/300/500/1000 परा भूमि के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में परा का उपयोग अनाज को मापने के लिए सामान्यतः नहीं किया जाता परंतु अनुष्ठान और अन्य पारंपरिक उद्देश्यों के लिए यह अब भी प्रचलन में है। केरल के लोग इस मापक पात्र को शुभ का द्योतक मानकर घरों में रखते हैं क्योंकि यह उनकी कृषक संस्कृति का स्मरण कराता है

​केरल में मुख्यतः दो प्रकार के परा उपलब्ध हैं। उनमें से एक बेलनाकार होता है जो लकड़ी के एक कुंदे से बना होता है, जिसके चारों ओर धातु का छल्ला होता है तथा दूसरा चैकोर आकार का होता है। लकड़ी या पीतल का बना परा विभिन्न शुभ अवसरों जैसे विवाह, पूजा, गृह प्रवेश, राजतिलक आदि के लिए एक महत्वपूर्ण वस्तु माना जाता है। चावल से ऊपर तक भरा हुआ और नारियल के फूलों से सुसज्जित परा विपुलता को दर्शाता है।

परा सामान्यतः कटहल की लकड़ी से बनाया जाता है जिस की बाहरी सतह पर सजावटी बीडिंग लगाई जाती है जो मौसम संबंधी परिवर्तनों के कारण परा में होने वाले फैलाव या संकुचन को रोकती है। जब यह शुभ मापन यंत्र पुनः लोकप्रिय हुआ तो इसे एक नया रूप मिला और यह पूर्ण रूप से पीतल से निर्मित होकर एक सजावटी वस्तु के रूप में स्थापित हो गया।

टेक्स्ट सहयोग:
डॉ. वी. जयराजन, अध्यक्ष, फोकलैंड, केरल।

Para – A Symbol of Prosperity

Community: Folk
Area: Mannadi, Kerala
Acc. No.: 92.288
Collected by: Shri Rakesh Bhatt

Parra or Para is a measuring pot that has traditionally been used to measure paddy after harvest. It was associated with the agrarian life of Kerala and was used in many households till the arrival of modern measuring systems. In the past, after a good harvest season, villagers were offering one or more Para of paddy/rice to the deities of local temple for the conduct of Temple festival. Para with heap of paddy and other materials can be seen placed in traditional Hindu houses during the procession on festive occasions.

A Para contains Paddy/Rice measure of 8 or 10 Idangazhi (a smaller measure). It is also considered as a symbol of prosperity. Large Paddy fields are known in accordance with its requirements of seeds to sow measured in Para such as 100/200/300/500/1000 Para land, etc. Nowadays Para are not used to measure the grains for general purpose but still it is in practice for rituals and other traditional purposes. People of Kerala still keeps this auspicious measure as it reminiscences their past agrarian culture.

There are mainly two types of Para available in Kerala. One is a cylindrical in shape and is traditionally made of wooden staves with metal hoops around them and the other one is square shaped. Para is made of either wood or brass and is considered as an important object for auspicious functions such as wedding, puja, house warming, coronation etc. A Para filled with husked rice and bunches of coconut tree flowers placed on top signify abundance.

Para is generally made from jackfruit timber with ornamental beading attached in the outer portion to avoid the expansion or contraction due to climatic changes. When this auspicious measure relegated in popularity, it went through a facelift and emerged in an all brass form as a decor accessory.

Text courtesy:
Dr. V. Jayarajan, Chairman, Folkland, Kerala