18 -24 जनवरी/January, 2021

‘सप्ताह का प्रादर्श श्रृंखला-35’
(18 से 24 जनवरी, 2021 तक)

कोविड-19 महामारी के प्रसार के कारण दुनिया भर के संग्रहालय बंद है लेकिन यह सभी अपने दर्शकों के साथ निरंतर रूप से जुड़े रहने के लिए विभिन्न अभिनव तरीके अपना रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने भी इस महामारी द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियो का सामना करने के लिए कई अभिनव प्रयास प्रारंभ किए है। अपने एक ऐसे ही प्रयास के अंतर्गत मानव संग्रहालय ‘सप्ताह का प्रादर्श’ नामक एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। पूरे भारत से किए गए अपने संकलन को दर्शाने के लिए संग्रहालय इस श्रंखला के प्रारंभ में अपने संकलन की अति उत्कृष्ट कृतियां प्रस्तुत कर रहा है जिन्हें एक विशिष्ट समुदाय या क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में योगदान के संदर्भ में अद्वितीय माना जाता है। यह अति उत्कृष्ट कृतियां संग्रहालय के ‘AA’और ‘A’ वर्गों से संबंधित हैं। इन वर्गों में कुल 64 प्रादर्श हैं।

पालकी
लकड़ी की पारंपरिक पालकी

पालकी मानव द्वारा उपयोग किए जाने वाले पहिया रहित परिवहन का एक प्राचीन माध्यम माना जाता है। कई सदियों तक मानव शक्ति से संचालित यह  वाहन कई संस्कृतियों में अभिजात्य परिवहन के रूप में भी उपयोग किया जाता रहा है।

भारत में विवाह समारोह में परंपरागत रूप से पालकी के उपयोग का प्रतीकात्मक संबंध रहा है। पश्चिम बंगाल की यह पालकी विवाह के समय वधू की विदाई करने की गौरवशाली परंपरा को दर्शाती है। राज्य के विभिन्न भागों में, विवाह पालकियां पारंपरिक रूप से राउत समुदाय के स्वामित्व में रही हैं। कदाचित यह इसके मालिक के लिए एक अच्छा निवेश भी था जो इसे कई बार किराए पर दे सकता था। यह प्रादर्श लकड़ी से बना हुआ है, मध्य में बैठने के लिए एक आयताकार डिब्बा  है, जिसे उठा कर ले जाने के लिए इसके दोनों तरफ लकड़ी की दो गोल बल्लियां लगी हैं। इस पर पुष्प की आकृतियां चित्रित की गई है जो निर्माता के सौंदर्य बोध को दर्शाती हैं। पालकी में  कमल के फूल, फूलों के कलश, हाथी, बाघ और शंख जैसे विभिन्न रूपांकनों का प्रयोग किया गया है जिन्हे शुभ माना जाता है। पालकी की एक तरफ सरकाए जा सकने वाले दरवाज़ा है। बैठने के लिए पर्याप्त स्थान वधू को सुरक्षित रूप से यात्रा करने में सहायक है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के दुसाध मुख्य रूप से विवाह समारोहों में पालकी उठाने वालों के रूप में कार्यरत थे। परिवहन के आधुनिक साधनों के आगमन के साथ, पालकी के उपयोग की राज्य की यह मोहक परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।

आरोहण क्रमांक : 97.519
स्थानीय नाम : पालकी, लकड़ी की पारंपरिक पालकी।
जनजाति/समुदाय : लोक समुदाय
स्थान: मिदनापुर, पश्चिम बंगाल
माप: अधिकतम लम्बाई (बल्लियों सहित) – 389.5 सेमी, चौड़ाई – 67 सेमी, ऊँचाई – 90 सेमी
श्रेणी : ’A‘ 

OBJECT OF THE WEEK SERIES-35
(18th to 24th January, 2021)

Due to spread of COVID-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Object of the Week’ to showcase its collection from all over India. Initially this series will focus on the masterpieces from its collection which are considered as unique for their contribution to the cultural history of a particular ethnic group or area. These masterpieces belong to the “AA” & “A” category. There are 64 objects in these categories.

PALKI
Traditional wooden palanquin

The Palanquin is perceived to be an ancient medium of wheelless transport used by humans. For many centuries, this human-powered enclosed vehicle also served as an elite form of transport in many a culture.

In India, the traditional use of Palanquin has a symbolic attachment to the wedding ceremony. This Palanquin from West Bengal reflects the glorious tradition of bidding the bride farewell at the wedding time. In various provinces of the State, wedding Palanquins are traditionally owned by the Raut community. It was probably a good investment for the owner who could rent it out many a time.

The object is made out of wood, having a rectangular box at the center, supported by two round wooden poles on both sides for lifting and carrying purposes. It is painted with floral designs reflecting the aesthetic sense of the maker. Various motifs like the lotus flower, flowerpot, elephant, tiger, and conch used in the Palki are believed to be auspicious. The sliding doors at one side of the Palanquin with its spacious sitting place allows the bride to travel safely. The Dusadhs of Purulia district, West Bengal, were primarily employed as palanquin bearers at marriage ceremonies. With the advent of modern means of transportation, the use of Palanquin gradually vanishes from this alluring tradition of the State.

Accession No.:  97.519
Local Name -PALKI, Traditional wooden palanquin
Tribe/Community – Folk community
Locality – Midnapur, West Bengal
Measurement  – Height –  27cm ., Max Width –26.6  cm.,
Category –  ‘A’

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