ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-32

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -32
(21 जनवरी, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

वीथि संकुल- अंतरंग भवन दीर्घा क्रमांक 02 में प्रदर्शित
देवार और रबारी समुदाय के ख़ानाबदोश जीवन

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने अपनी दीर्घा क्रमांक 02 में आदिवासी और ग्रामीण समाजों की पारंपरिक आजीविका एवं आवास प्रतिमानों को दिखाया है। दीर्घा में 667 प्रादर्श हैं जो विभिन्न पर्यावरणिक क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और लोक समुदायों की पारंपरिक आर्थिक गतिविधियों को दर्शाते हैं। इस श्रंखला में छत्तीसगढ़ के देवार समुदाय और गुजरात के रबारी समुदाय के खानाबदोश जीवन की जानकारी आगंतुकों के लिए ऑनलाइन प्रस्तुत की जा रही है। इस संग्रह में इन दोनों समुदायों के पारंपरिक घरेलू सामान, गहने, वस्त्र तथा वाद्य यंत्र आदि शामिल हैं। रबारी पारंपरिक घरों “भुंगा” के एक भाग को सौंदर्य परक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। ख़ानाबदोश देवार के संग्रह को उनके अस्थायी आवास के साथ दिखाया गया है।

देवार मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पाये जाते हैं तथा माना जाता है कि वे गोंड राज्य के पतन के बाद गढ़ मंडला नामक अपने मूल स्थान से प्रवास कर गए थे। देवार पुरुष गायन में निपुण होते है और अन्य समुदायों के लिए भाट का काम करते हैं। महिलाएं गोदना गोदने में कुशल होती हैं। वे गाँव या कस्बे के बाहर नदी, तालाब, कुएं के किनारे और घने पेड़ों के नीचे टेंट लगाकर डेरा डालना पसंद करते हैं और आस-पास के गांवों के लोगों को अपनी गायन सेवाएं प्रदान करते हैं और कुछ समय बाद एक नए स्थान पर चले जाते हैं। देवारों ने साप्ताहिक बाज़ारों में जाकर गोदना गोदने का काम प्रारंभ कर दिया है। देवार समुदाय के प्रादर्श में उनकी प्रमुख देवियों यथा हिंगलाज देवी, बूढ़ी माई, चौरा देवी और कस्तूरी देवी के स्थान को भी प्रस्तुत किया गया है। चैत (मार्च-अप्रैल ) और कुंवार (सितंबर-अक्टूबर) की नवरात्रि में देवी को प्रसन्न करने और आर्शीवाद मांगने के लिए प्रसाद आर्पित किया जाता है।

रबारी जनजातीय पशुपालक ख़ानाबदोश हैं। वे राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी मैदानों में निवास करते हैं। रबारी का ख़ानाबदोश जीवन उनके द्वारा पाले जाने वाले पशुओं के झुंड के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। वे चारागाहों की तलाश में पशुओं के साथ लंबी यात्रा करते हैं और यह मौसमी प्रवास अपने मूल स्थान पर लौटने तक लंबा दूरी तय कर लेते है। वर्तमान में रबारी जनजाति ने अपने निर्वाह के लिए पशुपालन के पारंपरिक व्यवसाय के साथ कृषि का काम भी शुरू कर दिया है। रबारी महिलाएं अपनी कुशल कढ़ाई, चित्रकारी और मिट्टी से भित्ती चित्रण, जिसमें दर्पण का काम शामिल होता है, के लिए जानी जाती हैं। दीर्घा में इस प्रदर्शनी के माध्यम से आगंतुक रबारी समुदाय के ख़ानाबदोश जीवन का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

Online Exhibition Series-32
(21st January, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

Exhibit from the Indoor Gallery no.2 of Veethi Sankul
Nomadic life of the Dewar and Rabari community

The Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya showcases the traditional livelihood and housing patterns of tribal and rural societies in its gallery No. 2. The gallery houses 667 exhibits that narrate the survival strategies, livelihood patterns and traditional economic activities of tribal and folk communities living in different environmental zones. In this episode, exhibits portraying the nomadic life of the Dewar community from Chattisgarh and Rabari from Gujarat are being presented for the online visitors. The collections include traditional household items, ornaments, textiles, and musical instruments of these two communities. The Rabari households are aesthetically presented with an ambiance of a life-size Bhunga (a traditional house) laid in a sectional view. The collections from the nomadic Dewar are uniquely presented with their temporary shelter.

The Dewars are found mainly in Madhya Pradesh and Chhattisgarh, and they are known to have moved from their original place called Garha Mandla after the fall of the Gond state. Devar men are proficient in singing and work as the minstrel for the other communities. Women are skilled in marking tattoos. They prefer to camp by setting tents near the river, pond, well, and under the dense trees outside the village or town and provide their minstrel services to the people of nearby villages and move to a new place after some time. Dewars have started to engage their work of tattooing by visiting the weekly markets. Dewar exhibit also presents the abode of their principal deities namely Hinglaj Devi, Budhi Mai, Chaura Devi, and Kasturi Devi. In Navratri of Chaitra and Kuwaar, offerings are made to the Goddess for appeasement and seeking blessings.

The Rabari tribe is a shining example of the pastoral nomads. They are found in the desert plains of Rajasthan and Gujarat. The nomadic life of the Rabari is deeply associated with their herds of animals they rear. They travel a long distance, searching for pastures to feed their animals, and this seasonal movement takes a long course to return to their native place. Presently, the tribe has also started the work of agriculture with the traditional occupation of animal husbandry for their subsistence.  The Rabari women are known for their skillful embroidery, painting, and clay relief work that embodies the art of mirror embellishment. Visitors may find a first-hand experience to explore the nomadic life of the Rabari tribe through this exhibition in the gallery.

Introductory video on the Exhibit from the Indoor Gallery no.2 of Veethi Sankul – Nomadic life of the Dewar and Rabari community