25 -31 जनवरी/January, 2021

‘सप्ताह का प्रादर्श-36’
(25 से 31 जनवरी, 2021 तक)

कोविड-19 महामारी के प्रसार के कारण दुनिया भर के संग्रहालय बंद है लेकिन यह सभी अपने दर्शकों के साथ निरंतर रूप से जुड़े रहने के लिए विभिन्न अभिनव तरीके अपना रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने भी इस महामारी द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियो का सामना करने के लिए कई अभिनव प्रयास प्रारंभ किए है। अपने एक ऐसे ही प्रयास के अंतर्गत मानव संग्रहालय ‘सप्ताह का प्रादर्श’ नामक एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। पूरे भारत से किए गए अपने संकलन को दर्शाने के लिए संग्रहालय इस श्रंखला के प्रारंभ में अपने संकलन की अति उत्कृष्ट कृतियां प्रस्तुत कर रहा है जिन्हें एक विशिष्ट समुदाय या क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में योगदान के संदर्भ में अद्वितीय माना जाता है। यह अति उत्कृष्ट कृतियां संग्रहालय के ‘AA’और ‘A’ वर्गों से संबंधित हैं। इन वर्गों में कुल 64 प्रादर्श हैं।

मुथियो, हाथी दांत का कंगन

प्राचीन काल से ही हाथी दांत अपने बेदाग श्वेत रंग और तुलनात्मक रूप से दुर्लभ होने के कारण एक विशिष्ट आभूषण है। उपलब्ध साहित्य और पुरातात्विक खोजों ने प्राचीन भारत में हाथी दांत शिल्प की समृद्धि के बारे में पर्याप्त प्रमाण प्रदान किए हैं। रेत घड़ी के आकार के इस कंगन को  बहुत सावधानी से  हाथी दांत के एकल  टुकड़े से बनाया गया है।आसानी से पहनने के लिए इसके खोखले ऊपरी हिस्से का आकार  निचले हिस्से की तुलना में बड़ा है। इसका उपयोग रबारी समूह की ढेबरिया महिलाओं द्वारा विवाह के बाद अपनी कलाई को सजाने के लिए किया जाता है। रबारियों में हमेशा हाथीदांत के कंगन पहने जाते हैं। रबारी महिलाऐं अपनी वैवाहिक पहचान दिखाने के लिए मुथियो और चुड़ो  पहन कर कंधे तक अपना हाथ ढँक लेती हैं, जबकि अविवाहित महिलाएं केवल कोहनी तक ढकी रहती हैं। मुथियो को एक महत्वपूर्ण उपहार माना जाता है, जो विवाह समारोह से एक दिन पहले मामा के परिवार द्वारा वधू को भेंट किया जाता है।

आरोहण क्रमांक : 90.658
स्थानीय नाम: मुथियो, हाथी दांत का कंगन ।
जनजाति/समुदाय : रबारी
स्थान: कच्छ, गुजरात
माप: लंबाई- 9.5 सेमी।, गोलाई – 31 सेमी।

श्रेणी : ’A‘ 

OBJECT OF THE WEEK-36
(25th to 31st January, 2021)

Due to spread of COVID-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Object of the Week’ to showcase its collection from all over India. Initially this series will focus on the masterpieces from its collection which are considered as unique for their contribution to the cultural history of a particular ethnic group or area. These masterpieces belong to the “AA” & “A” category. There are 64 objects in these categories.

MUTHIO, An Ivory Bangle

Since time immemorial, ivory has become a distinctive ornament for the property of its stainless purity of white colour and comparative scarcity. The available literature and archaeological findings have provided ample evidence about the richness of ivory craft in ancient India. This hourglass-shaped wristlet is meticulously carved out of a single ivory piece. The size of the hollow upper rim is bigger than that of the other to facilitate easeful wearing. It is used by the Dhebaria women of the Rabari group to decorate their wrists after marriage. Wearing of ivory bangle among the Rabaris is common for all stages of life. The Rabari women covered their hand up to shoulder by wearing Muthio and Chudo to show their marital identity, whereas the unmarried women covered up to elbow only. The Muthio is regarded as an important item of the gift, presented to the bride by the maternal uncle’s family one day ahead of the marriage ceremony.

Accession No.:   90.658
Local Name – MUTHIO, An Ivory Bangle
Tribe/Community – Rabari
Locality – Kutchh, Gujarat
Measurement  – Height –  9.5 cm., Cir. –  31 cm
Category –  ‘A’