ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-36

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -36
(18 फरवरी, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मरु ग्राम मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
भुंगा- रबारी समुदाय का
पारम्परिक आवास संकुल

संग्रहालय की ‘‘मरूग्राम‘‘ मुक्ताकाश प्रदर्शनी में निर्मित गुजरात के अर्ध-यायावर जनसमूह रबारी का पारंपरिक आवास संकुल भुंगा अपनी आकर्षक गोलाकार अधो-संरचना एवं शंक्वाकार छत तथा चित्ताकर्षक भीतरी सज्जा के चलते बरबस ही दर्शकों का मन मोह लेता है।

भारत के पश्चिमी तटीय प्रांत गुजरात की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को वैविध्य प्रदान करने में जितना महत्व वहां की जलवायु और दोहरी भौगोलिक स्थिति का है उतना ही वहां पर रहने वाले रबारियों का भी है।

मिथकों के अनुसार रबारियों की उत्पत्ति सम्बल नामक पशुपालक (ऊंट चराने वाले) तथा देव कन्याओं (अप्सराओं) की चार पुत्रियों के राजपूतों के साथ विवाह करने और एक पृथक जाति समूह (रबारी) की स्थापना करने से हुई। यायावर समूहों की स्थिरता व्यक्ति की औसत आयु और संक्षिप्त ऋतु चक्र पर निर्भर करती हैं रबारी भी इसके अपवाद नहीं है। पशुओं के इर्द-गिर्द बुने रबारी जीवनचर्या के तानेबाने में ऊंट का प्रमुख स्थान है, रबारी अपनी जीविका पशु अथवा पशु उत्पादों जैसे दूध, दूध से बने पदार्थ आदि बेच कर कमाते हैं। रबारी अर्थव्यवस्था पशुपालन पर निर्भर है।

कच्छी रबारी अब काफी हद तक स्थायी जीवन पद्धति अपना चुके हैं। पूर्वी कच्छ में वागडिया रबारी आज भी अपनी पारंपरिक यायावर जीवन शैली के पक्षधर हैं। छोटे-छोटे समूहों में स्थानांतरण करने वाले वागडिया रबारियों के पड़ाव किसी कुएं अथवा नदी के किनारे लगते हैं। समूह के वृद्ध सदस्य गाँव में ही रहते हैं। चारपाई, खाना बनाने के बर्तन, कंबल, पानी के बर्तन, मेमने और नवजात ऊंट आदि सीमित गृहस्थी के साथ युवा एवं वयस्क प्रवासन करते रहते हैं। पड़ाव डालने के बाद पुरूष पशु लेकर चारागाह में निकल जाते हैं तथा महिलाएँ पीछे रह गये नवजात पशु शावकों की देखभाल सहित घरेलु कार्य और कलात्मक गतिविधियां सम्पादित करती है।

रबारी महिलाओं के सौंदर्य-बोध और कला-कौशल की अनुभूति उनके पहनावे सहित बुनाई और कशीदाकारी में होती है। एक रबारी बालिका लगभग छः वर्ष की आयु से कशीदाकला का अभ्यास करने लगती है और परिवार की वयस्क महिलाओं के मार्ग दर्शन में निपुणता प्राप्त कर लेती है तथा निजी उपयोग व घरेलु सजावट के साथ-साथ अपने विवाह के लिये विभिन्न कढ़ाई युक्त वस्तुएं स्वयं तैयार करती है।

पहनावा, जीवन शैली, सामाजिक परम्परा और रीति रिवाजों की तरह रबारी आवास प्रकार भी विशिष्ट है, घास फूस से आच्छादित शंक्वाकर छत और वृत्ताकार अधो संरचना वाले अतिसाधारण परन्तु अत्यंत उपयोगी ‘भुंगा‘ कहलाने वाले आवास प्रकार रबारी गांवों की पहचान है। मिट्टी और गोबर से बने गोलाकार भुंगा में एक ही कमरा होता है। छत पेड़ों के तने व मोटी-मोटी शाखों के बीच पत्तों और घास की छाजन तैयार कर बनायी जाती है, जिसे मिट्टी और गोबर से छाप कर वाटरप्रूफ बनाया जाता है तथा एक और परत घांस की छाजन डाली जाती है। भीतरी दीवारों से लगी बहुउपयोगी कोठियां (वृत्ताकार) कोठले (चौकोर) बनाये जाते है। गोबर और मिट्टी से ही बने ये कोठी और कोठले रबारी महिलाओं के सौन्दर्य बोध एवं कला-कौशल के परिचायक है, घर की बाहरी दीवार तथा कोठियों आदि पर कांच और मिट्टी से विविध आकृतियां उकेर कर रबारी महिलाएं अपनी रचनात्मक अभिरूचि को व्यक्त करती हैं।

Online Exhibition Series-36
(18th February, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From the Desert Village of India Open Air Exhibition
Bhunga- A Traditional Dwelling Complex

of Rabari Community

Bhunga the traditional dwelling complex of semi nomad community of Gujarat constructed in the Desert village open air exhibition of the Museum automatically draw the attention of visitors for its attractive circular infrastructure, conical roof and fascinating interior decoration.

          Rabari the inhabitants of Gujarat: The western coastal state of India are equally important in making of its cultural background diverse as the climate and dual geographical condition.

          According to myths Rabaris claim their origin because of marrying four daughters of Sambal a camel herder and aspires with Rajputs and establishing a separate caste group. Stability of nomadic groups depends upon the average age and the shorter season cycle. Rabari are also not an exception. Camel holds a leading position in the life span of Rabaris women around cattles, they earn their livelihood from animals or animal products like selling milk and other dairy products. Rabari economy is based on cattle herding.

          Kutchchhi Rabaris have been settled at large extent, however Vagadia Rabari in the eastern Kutchchh are still partition of traditional nomadic life style. Migrating in small groups Wagadia Rabaris camp near a well or river of bank older or aged people stay back. Youth keep migrating with limited stuff of household’s like cot, cooking utensils, blanket, water vessels and lambs. After camping at a suitable place males move to grasslands with their cattles and women besides looking after the cubs left back perform domestic work and the artistic activities.

          Aesthetic sense and art skill of Rabari women is experienced in their attires, weaving and embroidery skills. A Rabari girl starts practicing embroidery at the age of six and acquires expertise under the guidance of the adult women of the family, and also prepares embroidered article for her marriage besides items for her personal use and home decor. Rabari habitat is also unique like their attires, lifestyle, social traditions and customs. Simple but very useful Rabari dwelling called Bhunga with articulated infrastructure and conical thatched roof are identity of Rabari villages. Made with clay and cow dung “Bhunga” consists of one room only. Roof of the house is made by thatching grass and leaves between branches and trees trunk. Water proofing is done by applying plaster of mud and cowdung and covered with another layer of grass. Multipurpose inbuilt storage almirahs (circular) called Kothiya and Kothle (rectangular) are also made of clay.

          These mud and cowdung made Kothi and Kothles are reflection of aesthetic sense and artistic skill of Rabari women. Rabari women express their creative interest on walls by etching vivid shapes with tiny mirrors and clay.

Introductory video on the Desert Village of India Open Air Exhibition – Bhunga- A Traditional Dwelling Complex of Rabari Community