ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-38

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -38
(04 मार्च, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मिथक वीथी मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
गोंड सृष्टि मिथक

पुराइन के पत्ते पर बैठे बड़ादेव के मन में सृष्टि की रचना करने का विचार आया। इस काम के लिये मिट्टी चाहिये थी पर झॉक कर नीचे देखा तो वहाँ जल ही जल था। अपनी छाती के मैल से बड़ा देव ने कौआ बनाया और उसे धरती की खोज-खबर लाने के लिये भेजा। उड़ते-उड़ते कौआ थक गया तभी उसे पानी के बाहर निकला हुआ एक ढूँठ दिखा, जिस पर वह बैठ गया। उसके बैठते ही आवाज़ आई “मेरे लट्ठे (पंजे) पर कौन बैठा?” आवाज़ ककरामल क्षत्रीय (केकड़े) की थी। कौए ने आने का प्रयोजन बताया तो ककरामल बोला, पृथ्वी तो पाताल में चली गई है और वहाँ कीचकमल (केंचुआ) उसे खाये जा रहा है। अनुरोध करने पर ककरामल कीचकमल को पकड़ लाये और उसकी गर्दन पंजे से इतनी जोर से दबाई कि उसने मिट्टी उगल दी। मिट्टी लेकर कौआ बड़ा देव के पास लौट आया ।

कुछ मिट्टी से देव ने सारे जीव-जन्तु बनाये और बाकी को मकरामल (मकड़ी) के पानी के ऊपर बनाये जाल पर छवा दिया। सारे जीव-जन्तु और मनुष्य फिर इस धरती पर रख दिये गये। मनुष्य बोला मैं क्या करूँ, अपने बच्चों को क्या खिलाऊँ?” बड़ा देव ने अपने सिर के तीन बाल धरती पर फेंके जो आम, सागौन और कस्सी के पेड़ों में बदल गये।

देव ने मनुष्य को कुल्हाड़ी, कोटेला (बसूला) आदि औजार दिये और कहा- इन पेड़ो से कुछ बनाओ मनुष्य काम में जुट गया, पर जैसे ही वह लकडी पर चोट करता, फड़की चिड़िया (कठफोड़वा) उस की नकल करती। मनुष्य का ध्यान भटक जाता और लकड़ी तिरछी हो जाती। एक-एक कर तीनों पेड़ खत्म होने को आये और बना कुछ भी नहीं। मनुष्य ने गुस्से से कोटेला फड़की चिड़िया पर फेक कर मारा। चिड़िया उड़ गई और कोटेला भी आकाश में खो गया। पस्तहाल मनुष्य देव के पास लौटा और सारा हाल कह सुनाया। बड़ा देव ने धूनी की राख दे कर उसे पेड़ की जड़ों में डालने को कहा और साथ ही यह कहा कि यदि लकड़ी बार-बार तिरछी हो रही है तो इसमें भी कोई राज छिपा होगा।

राख डालते ही पेड़ों में फूल आ गये और फिर पेड़ों का जंगल हो गया। टेढ़ी लकड़ी के राज को समझने में अक्षम मनुष्य ने उसे जोर से धरती पर मारा। चोट होते ही धरती में से बासिन कन्या (बौस) और उसके भीतर छुपी अन्न माई निकल पड़ी। वह टेढ़ी लकड़ी ही पहला हल थी और तभी से मनुष्य खेती करके अन्न उगाने लगा। अन्न फिर कभी खत्म न हो जाये इसलिये गौडी स्त्री ने पुत्ती (दीमक की बामी) को देखकर लिल्लार कोठी की रचना की और उसमें समस्त संसार के लिये अनाज भर लिया।

यहाँ लिल्लार कोठी की भित्ति पर गोंड सृष्टि कथा एवं आगे कैसे प्रकृति के सतत संपर्क में मनुष्य ने खेती करना, दुर्दिनों के लिए अन्न को सुरक्षित रखने का उपाय दर्शाया गया है। लिलार कोठी मिट्टी, बाँस, भूसा, गोबर से बनाई गई है। यह गोंड घरों के भीतर बनाई जाती है। इसमें एक छत से जोड़ने वाले दो आयताकार खोखले ढांचे तथा कोठी की भीतरी छत को आकाश की तरह प्रयुक्त किया गया है।

इसमें अनाज ऊपर से डाले जाते हैं और अनाज को बाहर निकालने के लिए आधार की ओर संकरे मुँह होते हैं जिन्हे मिट्टी के ढक्कनो से बंद किया जा सकता है। यह संरचना जमीन से डेढ़ फीट उपर तक ठोस होती है ताकि नमी अंदर प्रवेश न कर सके और अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। अनाज रखने के अलावा संरचना की विशेषता के कारण यह एक प्रवेश द्वार के रूप में या कमरे को दो भागों में विभाजित करने के लिए भी उपयोगी है। गोंड में लिलार मस्तक को कहा गया है। सामान्य रूप से इस कोठी की ऊँचाई को इतना रखा जाता है कि प्रवेश करते समय अपना सिर झुकाना पड़े। यह अन्न के प्रति प्रत्येक क्षण सम्मान करने की भावना है।

लिलार कोठी के अलावा आकार और उद्देश्य के आधार पर कोठी या अन्न भंडार की विभिन्न किस्में होती हैं। उदाहरण के लिए पौला छोटी कोठियाँ, बीज रखने के लिए बिजदानी कोठी। बीजों को साफ किया जाता है और बिजदानी कोठी के अंदर संरक्षित किया जाता है और पूजा के समय ही बाहर निकाला जाता है। वे जून के महीने में बिदरी मनाते हैं, वे घर में सभी भंडारों में से अनाज इकट्ठा करते हैं और फिर पूजा के बाद खेतों में बुआई के लिए ले जाया जाता है।

गोंड महिलायें घर की दीवारों और कोठियों को मिट्टी और रंगों से सजाती है, जिसे नाहडोरा कहा जाता है। वे लाल मिटटी (गेरू), चुईमिटटी (सफेद मिट्टी), कोयले की धूल (काला रंग) और नीला का उपयोग करती हैं। फर्श को अलग-अलग आकृतिओं से सजाया जाता है जिसे ढिगना कहा जाता है। नाहडोरा एक तरह का सुरक्षा कवच है जो घर की दीवार को बांधने के लिए बनाये जाते हैं। आमतौर पर अनाज को नाहडोरा बनाने के बाद ही कोठी से बाहर निकाल के दूसरों को दिया जाता है।

Online Exhibition Series-38
(04th March, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Open Air Exhibition Mythological Trail
The Origin Myth of Gonds

In the beginning there was no earth and just water all around. Floating on the Lotus leaf, Badadev (the supreme god of Gonds) felt like creating the universe. He looked around for clay but there was water all over. He made a crow out of the dirt rubbed off his chest and sent him to find the earth. The crow flew miles and when he was tired he sat on a claw. As soon as he sat on it, he heard a voice, who is sitting on my claw?” The voice was of Kakramal kshatriya’s (the crab warrior). When the crow explained the nature of his search, Kakramal told him that the earth had receded to the netherworld i.e. patal lok where Keechakmal (the earthworm) was continuously gnawing at it. On the crow’s request, Kakramal brought Keechakmal from patal lok and squeezed his neck so that he spat the earth out. The Crow then flew back to Badadev taking the clay.

Badadev created the universe. He created all the creatures. The remaining clay he thatched on the net that Makramal (the spider) had woven over the water surface and placed all the creatures on it. Thereafter the man asked “What do I and my children eat?” Badadev broke three strands of hair from his head and threw them on the earth. They immediately turned into Mango, Teak and Kasi trees. Badadev also gave him some tools and asked him to make something out of the trees.

Man began the work, but whenever he struck the wood with pickaxe, the woodpecker sitting above imitated him, the man got distracted, and the wood became crooked. Thus one by one the three trees were cut down and nothing was made out of those. He got angry and threw the pickaxe at the woodpecker. Woodpecker flew off and the pickaxe also disappeared in the sky. Dejected man once again came to Badadev and explained everything, Badadev gave him some ash to put in the roots of those trees and asked him to ponder about what could be behind the wood becoming crooked again and again.

As soon as he put the ash the trees flowered and became a forest, but unable to get to the secret of the crooked wood, in despair he hit the ground with the stick. No sooner had it struck the ground, then the basin kanya, the bamboo girl came out and from inside her emerged Anna mai, “the grain goddess”. The crooked stick in fact was the first plough and ever since man has been farming with its aid. Further, taking inspiration from the anthill, the Gond woman made the Lillar Kothi or the mud granary to keep the grain for a long time.

The entire story of Gond origin and how man working in close harmony with nature learnt to till the land and subsequently to store the grain for rough weather in a granary is depicted on the Lillar Kothi in clay relief over it. The structure of lilar kothi, a mud granary made out of bamboo, clay, cow dung and rice husk. Usually this is made inside the Gond’s house. There are two rectangular hollow structures joined by a roof wherein the inner arch of the granary with the depiction of Sun and Moon is treated as the sky.

In this granary rice is poured from the top and there are outlets towards the base to take out the grain and these outlets can be closed by knobbed lid made of clay. The structure is one and half feet compact from the ground so that moisture cannot penetrate inside and the grain can be kept safe for a long period. Due to the speciality of the structure apart from keeping grains it also acts as an entrance or as an aid to divide the room into two parts. Among the Gonds Lilar means mastak or head. The height of the kothi is kept that much high that someone has to bow while entering inside it into the house. It is a sense of paying respect to grains every time.

Besides Lillar kothi there are different varieties of kothi or granary depending upon the size and purpose. For example, paulas small kothis, bijdaani kothi for keeping seeds. The seeds are cleaned and preserved inside the bijdaani kothi and taken out only during puja time. They celebrate Bidri in the month of June, they collect grains from all the granaries in the house and then kept for worship afterwards taken to the agricultural field for sawing.

The Gond woman decorated the walls of the house and granary with mud and colors, which are called Nah Dora. They use geru (ochre), chhui mitti (white soil), coal dust (black colour) and indigo. The floor is also covered with different patterns called dhigna. Nah Dora is a kind of protection shield like to bind the wall of the house. Grains are normally taken out of the granary only after making the Nah Dora.

Introductory video on the Open Air Exhibition Mythological Trail – The Origin Myth of Gonds