माह का प्रादर्श श्रृंखला – EXHIBIT OF THE MONTH- मार्च/March, 2021

‘जैंजद्रुंगराई’ – एक देशज तंतु वाद्य

“Jenzadrunrai” is an indigenous string instrument

इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के अंतरंग भवन वीथि संकुल में आज “माह के प्रादर्श” श्रृंखला के अंतर्गत माह मार्च, 2021 के प्रादर्श के रूप में ओडिशा के रिनजिंताल, पुट्टासिंग, जिला रायगड़ा के ‘‘जैंजद्रुंगराई’’ एक देशज तंतु वाद्य का उदघाटन श्री राकेश कुमार भट्ट, सहायक क्‍यूरेटर, मानव संग्रहालय द्वारा किया गया। इस अवसर पर अनेक गणमान नागरिक उपस्थित थे। इस प्रादर्श का संकलन डॉ. सुदीपा रॉय, सहायक कीपर एवं सुश्री पी. अनुराधा, संग्रहालय एसोशिएट द्वारा किया गया है एवं संयोजन सुश्री पी. अनुराधा, संग्रहालय एसोशिएट द्वारा किया गया है।

प्रदर्शनी में प्रदर्शित प्रादर्श के बारे मे सुश्री पी. अनुराधा, संग्रहालय एसोशिएट ने बताया कि जैंजद्रुंगराई ओडिशा की लांजिया सवरा, जनजाति द्वारा गायन में संगत के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक देशज तंतु वाद्य है। सवरा जनजाति ओडिशा और आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में निवास करती है। इसमें कई उप-जनजातियां हैं, जिन्हें उनके विशिष्ट सामाजिक रीति-रिवाजों, पहनावे, जीवन यापन के तरीके और उनके आर्थिक क्रिया-कलापों से आसानी से पहचाना जा सकता है और लांजिया सवरा उनमें से एक है। वे विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्र बजाते हैं। ताल वाद्य जैसे अलग-अलग आकार के ड्रम (डगरू), तुरही (त्रेतेप), झांझ, पीतल के गोंग (नेनेंग), पीतल की घंटी (तिनारजाप) एवं शहनाई आदि आमतौर पर कृषि त्योहारों के दौरान बजाये जाते हैं जबकि चिकारा (गोगेरई), अन्य तंतु वाद्य एवं रैस्प्स शादी के समारोहों में लोकप्रिय हैं। प्रस्तुत प्रादर्श, लांजिया सवरा जनजाति की संगीत परंपरा तथा संबंधित मिथक, वाद्य प्रकार, तकनीकी पहलू एवं सामाजिक तथा सांस्कृतिक उपयोगिताओं पर प्रकाश डालता है।

शुरुआत में मनुष्य के पास कोई वाद्य यंत्र नहीं था। जब भी किसी की शादी या मृत्यु हो जाती थी, तो अन्य गांवों में समाचार भेजने का कोई साधन नहीं था। रक्षक देवता किट्टुंग ने इसका उपाय सोचा और संगीत बनाने का फैसला किया जिससे सभी मनुष्यों तक शादी या मृत्यु संस्कार का समाचार पहुंच सके और संगीत से उन्हें खुशी भी मिले। किट्टुंग ने एक डोलम (ड्रम) बनाया और उसके ऊपर भैंस का चमड़ा चढ़ाया। मिट्टी से एक दगडान (ढोल) बनाया और उसे गाय की खाल से ढक दिया और पीतल के थाल से पीतल का एक गांग बनाया। जब सब कुछ तैयार हो गया तो उन्होंने रामा को बुलाया और उसे वाद्ययंत्र देते हुए कहा कि जब भी वह बलि दे या जब किसी की मृत्यु या शादी हो, तो उसे उत्सव मनाना चाहिए। रामा ने वो वस्तुऐं ली और जब उन्होंने बलि दी तो चार-पाँच गाँवों के सवरों को बुलाया और उन्हें शराब पिलाई तथा लड़कों और लड़कियों को ढोल और बांसुरी की धुन पर नृत्य कराया। इससे देवता प्रसन्न हुए और यह परम्परा हर गाँव में फैल गयी। यह माना जाता है कि संगीत की प्रत्येक लय पूर्वजों को कुछ विशेष प्रकार की जानकारी प्रदान करने के लिए उद्देशित है। सवरों में अभी भी इन वाद्य यंत्रों के उपयोग से संबंधित विभिन्न नियम प्रचलित हैं।

जैंजद्रुंगराई का निर्माण लांजिया सवरा जनजाति के देशज ज्ञान तथा विशिष्ट कौशल से परिपूर्ण एवं अनुभवी बुजुर्ग लोगों द्वारा कुशलता से किया जाता है। एक आधे कटे गुंजायमान तुम्बे को बाँस की छड़ी से हल्के से बाँधा जाता है। धातु के दो पतले तार छड़ी के एक छोर से दूसरे छोर तक बंधे होते हैं। वादन के समय, तुम्बे को छाती के सामने रखा जाता है और दाहिने हाथ से तार को छेड़ा जाता है। वाद्य के निचले तार से राग बजता है जबकि ऊपरी तार से एक जैंसी आवाज निकलती है । बांस की छड़ी को कुरेदकर ज्यामितिक आकृतियां और प्रतीकों से सुसज्जित किया गया है। अधिकांश डिजाइनें प्रकृति से प्रेरित हैं। जैंजद्रुंगराई की ध्वनि बहुत ही मनभावन है। दैनिक कार्यों को पूरा करने के बाद जब संध्या के शांत वातावरण में इसे बजाया जाता है तो इसकी मधुर ध्वनि बहुत दूर तक सुनाई देती है। गाते-बजाते और महुआ दारू या सल्फी का सेवन करते हुये उन्हें बहुत खुशी और संतुष्टि मिलती है।

लांजिया सवरा ओडिशा के गजपति एवं रायगडा जिले के गुनपुर उपखंड के पूर्वी घाट के पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) में से एक है। वे अपनी आजीविका के लिए शिकार, खाद्य संकलन और पहाड़ी ढलानों पर स्थानांतरित खेती और सीढ़ीदार खेती करते हैं।

Under the popular museum series ‘Exhibit of the Month’ of Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya, a traditional object is displayed in the appearance for a whole month. The exhibit for the month of March, 2021 – “Jenzadrunrai” (indigenous string instrument) from Rinzingtal, Puttasing, Rayagada district, Odisha is on display in the indoor exhibition building – Veethi Sankul. The ‘exhibit of the month’ was inaugurated by Sh. Rakesh Kumar Bhatt (Assistant Curator, IGRMS), and renowned people present on this occasion. This exhibit of the month had been collected by Dr. Sudipa Roy, Assistant Keeper and Smt. P. Anuradha, Sangrahalaya Associate and composed by Smt. P. Anuradha (Sangrahalaya Associate).

About the exhibit displayed in the exhibition Smt. P. Anuradha, Sangrahalaya Associate told that Jenzadrunrai is an indigenous string instrument used by Lanjia Saora tribe of Odisha for vocal accompaniment. Saora tribe is found in hilly tract of eastern ghat region of Odisha and Andhra Pradesh. It consist many sub-tribes which can be easily identified by their distinct social custom, peculiarity of dress, mode of living and their economic pattern and Lanjia Saora is one of them. They play variety of musical instruments on different occasions. The noisy percussion and sonorous instruments such as drums of different sizes (Dagru), blowing pipes (Tretepe), cymbals, brass gongs (Neneng), brass bell (Tinarjap) and clarinets are usually played during certain agricultural festivals whereas fiddle (gogerai), string instrument and rasps are popular at wedding ceremonies.

The present exhibit highlights the musical tradition of the Lanjia Saora and associated myth, typological variations, technological aspect and socio-cultural utilities.

At the beginning human had no musical instruments. Whenever someone got married or died there was no means of sending the news to other villages. Kittung – the guardian god wondered how he could remedy this and decided to make music so that all humans would know about the news of funeral or wedding, and it would make them happy too. Kittung made a dollum (drum) and covered it with buffalo-hide. With clay he made a dagadan (drum) and covered it with cow-hide. He made a brass gong with brass dish. When everything was ready he called Ramma and gave him the instruments and told that whenever he sacrifice or when someone dies or got married, he should dance, drink and make a noise. Ramma took the things and when he next sacrificed he called the Saoras of four – five villages and gave them wine and made the boys and girls dance on the tunes of drums and flutes. The gods were pleased and this custom spread to every village.

It is held that each individual musical rhythm is intended to provide the ancestors with some special type of information. Various rules still prevail among the saoras governing the use of these instrument.

Making of Jenzadrunrai always need experienced hands of the elderly males as it requires great skill and indigenous knowledge. A half sliced gourd resonator tied loosely with a bamboo stick. Two metal strings attached to one end of the stick and tied through the other end. While playing, the gourd is placed against the chest and the string is plucked by the right hand. The lower string of the instrument plays the melody while the upper act as drone. The bamboo stick is decorated by geometric designs and symbols in poker-work. Most of the designs are inspired from nature. The sound of Jenzadrunrai is very pleasing. It is played in the evening after completing the whole day work. The sweet sound of the instrument travels to a distance in the silence. They sing songs and play the instrument to make their mood light and drink local liquor (mahua daru or salfi). It brings happiness and satisfaction.

The Lanjia Saora Highlanders are one of the Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTG) living in the eastern ghat region of Gajapati District and Gunpur subdivision of Rayagada district of Odisha. They practise hunting, food gathering and both shifting cultivation and terrace cultivation on the hill slopes for their livelihood.