ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-40

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -40
(18 मार्च, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

पारंपरिक तकनीक उद्यान मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
रहट: सिंचाई की एक पारंपरिक तकनीक

सांस्कृतिक उद्विकास का प्रारंभ मनुष्य द्वारा अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तकनीकी ज्ञान अर्जित करने के प्रयास से प्रारंभ होता है। इस शुरुआत को आधुनिक एवं उन्नत तकनीक की तुलना में सरल भले ही कहा जाता हो, परंतु मानव द्वारा निर्मित एवं उपयोगित प्रथम उपकरण आज भी उसके तकनीकी इतिहास में प्रारंभिक एवं महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आज जब हम अपनी अधिकतम दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तकनीकी क्रांति के उपकरणों पर निर्भर हैं, वही आज भी इस देश में ऐसे लोग हैं जो अपनी इन आवश्यकताओं से संबंधित विभिन्न कार्यों को करने के लिए विरासत में प्राप्त पारंपरिक तकनीकी के विभिन्न उपकरणों को परिष्कृत करते रहे हैं तथा उन्हें आकार प्रदान करते रहे हैं। आधुनिक तकनीकी के उत्पादों की आसान उपलब्धता ने पारंपरिक तकनीक को भले ही कम महत्वपूर्ण कर दिया हो फिर भी हम उन लोगों को नमन करते हैं जिन्होंने सदियों तक लोगों का निर्वाह करने वाली पर्यावरण के अनुरूप तकनीकों का अविष्कार किया और इनकी निरंतरता को बनाये रखा। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने इस पारंपरिक ज्ञान परंपरा पर ‘पारंपरिक तकनीकी उद्यान’ नामक एक मुक्ताकाश प्रदर्शनी का संयोजन किया है, जिसमें भारत के विभिन्न समुदायों की ज्ञान परम्पराओं को दर्शाते 26 प्रादर्श हैं। इनके माध्यम से हम दर्शकों को सरल समाजों के बौद्धिक एवं रचनात्मक कौशल से परिचित कराना चाहते हैं और इस तथ्य को रेखांकित करना चाहते हैं कि समकालीन वैभव में पारंपरिक तकनीक की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

ऑनलाइन प्रदर्शनी शृंखला की इस कड़ी में इस बार हम आपका परिचय पारंपरिक तकनीकी उद्यान प्रदर्शनी में प्रदर्शित रहट से करा रहे हैं। रहट मुख्यतः देश के मैदानी क्षेत्रों में सिंचाई की सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली तकनीक रही है। इस प्रादर्श को म.प्र. केभिण्ड जिला से संग्रहीत किया गया है। भिण्ड के अलावा रहट का प्रयोग राजस्थान व अन्य मैदानी इलाकों में भी सिंचाई हेतु किया जाता है। इस पारंपरिक सिंचाई तकनीक व्यवस्था से किसानों के स्थानीय पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कौशल विकास को अच्छी तरह से समझा जा सकता है। रहट पारंपरिक रूप से लोहे व स्थानीय लकड़ी से बनाया जाता है, जिसमें लोहे का एक बड़ा पहिया/चक्र होता है जो लोहे के एक पाइप से जुड़ा होता है। यह बड़ा पहिया/चक्र कुएं के पाट पर लकड़ी के सहारे ऊर्ध्वाधर रखा जाता है, जिससे छोटी-छोटी लोहे की बाल्टियों को चैन के माध्यम से जोड़कर लटकाया जाता है। इस प्रादर्श में 29 छोटी-छोटी बाल्टियाँ जोड़ी गई हैं। बाल्टियों की संख्या कुएं की गहराई के आधार पर तय की जाती है। बड़े पहिया/चक्र से लगे लोहे के पाइप के दूसरे छोर पर एक छोटा लोहे का पहिया/चक्र ऊर्ध्वाधर जुड़ा होता है, जिसमें लोहे के गेयर होते हैं। इस चक्र को घरिया कहा जाता है। इस घरिया के नीचे एक अन्य चक्र को क्षैतिज रूप से इस प्रकार फिट किया जाता है कि उसके गेयर घरिया में फंस जाए। क्षैतिज चक्र की धुरी से एक लंबी लकड़ी फंसाई जाती है, जिसे एक या दो बैलों द्वारा गोल चक्र में घुमाया जाता है। इस से कुआं पर रखा दूसरा बड़ा चक्र भी घूमता है, परिणामस्वरूप उसमें लगी बाल्टियों में पानी भर कर कुआं से बाहर आता है। जो एक टीन की बनी डोंगी में गिरकर उससे जुड़ी नाली के माध्यम से खेत में पहुंचता है। यहाँ पानी को विभिन्न नालियों में ले जाकर फसलों की सिंचाई की जाती है। गेयर का उपयोग उस पारंपरिक ज्ञान के उन्नत तकनीकी विकास को दर्शाता है। इस विधि से सिंचाई के लिए पानी निकालने में बैलों को अधिक श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती। बैलों को हाँकने के लिए एक व्यक्ति की आवश्यकता होती है।

सिंचाई की इस तकनीक में किसी तरह की बिजली या जीवाश्म ईधन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इससे पर्यावरण का भी संरक्षण होता है। वर्तमान समय में विभिन्न प्रकार की आधुनिक तकनीकों जैसे- डीजल या सौर ऊर्जा से संचालित पंप का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाने लगा है और धीरे-धीरे रहट का उपयोग समाप्त होता जा रहा है। फिर भी दूर-दराज के क्षेत्रों में अभी भी इसका उपयोग देखने को मिलता है।

Online Exhibition Series-40
(18th March, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From open air exhibition Traditional Technology Park
Rahat: A Traditional Technique of Irrigation

Cultural evolution begins with human endeavor to acquire technological knowledge for fulfilling his needs. This beginning may be said to be simple than modern and advanced technology, but the first device manufactured and used by man still holds an initial and important place in its technological history. Today, while we are relying on the tools of technological revolution to fulfill our maximum daily needs, still there are people in this country who refine various tools of inherited traditional technology to perform various tasks related to these needs and have been giving them shape. Even though the easy availability of modern technological products have made traditional technology less important, but we bow to those who have invented and maintained their technologies for centuries, in harmony with the environment that sustains the people. The Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya has developed on exhibition on these traditional knowledge traditions called the ‘Traditional Technical Park’ It has 26 exhibits reflecting the knowledge traditions of various communities in India. Through these we want to introduce the audience to the intellectual and creative skills of simple societies and underline the fact that traditional technology has played an important role in contemporary splendor.

Rahat is one of the important and effective traditional techniques of irrigation, mainly in the plain areas of the country. It is one of the important exhibits installed in the Traditional Technology Park open-air exhibition of the museum. In this episode of Online Exhibition Series we are introducing you to this exhibit. This object is collected from the Bhind District of Madhya Pradesh. Apart from the Bhind, Rahat is also used in Rajasthan and other plain areas too. With this traditional irrigation technique one can easily understood the traditional skill and wisdom of farmers related to conservation of environment. The Rahat is traditionally made of iron and local wood, which consists of a large iron wheel that is connected to an iron pipe. This large wheel it is placed vertically on the middle of the well with wooden support. In this exhibit 29 small iron buckets are attached and hung in the well through the chain. The number of buckets is decided based on the depth of the well. A small iron wheel is attached vertically to the other end of the iron pipe having iron gears. It is called gharia. Another wheel is fitted horizontally under this gharia in such a way that their gear gets stuck in the gear of gharia. A wooden balli is fixed in the axle of horizontal wheel and rotated in a circle by one or two oxen. This also rotates the second large wheel placed vertically in the well. As a result, the water-filled buckets come out of the well and empty the water into a wooden or tin canoe and reach the field through a small canal. For irrigated the field water is distributed through various drains. By this method, the oxen do not require much labor in extracting water for irrigation. A person is required to drive oxen.

No electricity or fossil fuels are used in this technique of irrigation. It also protects the environment. At present time, a variety of modern technologies such as diesel or solar-energies pumps are being used for irrigation, and gradually the use of Rahat are diminishing. Yet it is still used in remote areas.

Introductory video of open air exhibition Traditional Technology Park – Rahat: A Traditional Technique of Irrigation