22-28 मार्च/March, 2021

‘सप्ताह का प्रादर्श-44’
(22 से 28 मार्च, 2021 तक)

कोविड-19 महामारी के प्रसार के कारण दुनिया भर के संग्रहालय बंद है लेकिन यह सभी अपने दर्शकों के साथ निरंतर रूप से जुड़े रहने के लिए विभिन्न अभिनव तरीके अपना रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने भी इस महामारी द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियो का सामना करने के लिए कई अभिनव प्रयास प्रारंभ किए है। अपने एक ऐसे ही प्रयास के अंतर्गत मानव संग्रहालय ‘सप्ताह का प्रादर्श’ नामक एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। पूरे भारत से किए गए अपने संकलन को दर्शाने के लिए संग्रहालय इस श्रंखला के प्रारंभ में अपने संकलन की अति उत्कृष्ट कृतियां प्रस्तुत कर रहा है जिन्हें एक विशिष्ट समुदाय या क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में योगदान के संदर्भ में अद्वितीय माना जाता है। यह अति उत्कृष्ट कृतियां संग्रहालय के ‘AA’और ‘A’ वर्गों से संबंधित हैं। इन वर्गों में कुल 64 प्रादर्श हैं।

पट्टचित्र, कृष्ण जन्म कथा

ताड़ पत्र चित्र ‘पटचित्र’ धार्मिक केंद्र पुरी, ओडिशा के पुराने भित्ति चित्रों से समानता दर्शाते हैं। पटचित्र के उत्कृष्ट कार्य पुरी के आसपास मुख्यत: रघुराजपुर गाँव मे प्राप्त होते हैं। ताड़ के पत्ते पर बने पट्टचित्र जिन्हें यहां ताल पत्र चित्र कहा जाता है सुप्रसिद्ध एवं पवित्र स्थानीय कला रूपों में से एक हैं। पूर्व में ताड़ के पत्तों का उपयोग पांडुलिपियों को लिखने के लिए किया जाता था। पटचित्र बनाने के लिए ताड़ के पत्तों की लम्बी पट्टियों को सुई और धागे की मदद से एक साथ सिला जाता है। इन पत्तों की भंगुर सतह पर लोहे के एक नुकीले औजार से सावधानी पूर्वक चित्र उकेरे जाते हैं। सूती कपड़े के एक टुकड़े की मदद से रंग को पत्तियों पर फैलाया या रगड़ा जाता है, तत्पश्चात एक अन्य कपड़े से पोंछ कर साफ किया जाता है , जिससे उत्कीर्णित रेखाओं में बारीक काला रंग भर जाता है, और बाकी सतह साफ हो जाती है। चित्र बनाने के लिए महाकाव्यों जैसे रामायण, महाभारत और कृष्ण लीला से विषयों का चयन किया जाता है। यहां प्रदर्शित पटचित्र भगवान कृष्ण के जन्म और जीवन को दर्शाते सूक्ष्म रूपांकन के कारण अपनी तरह का एक दुर्लभ कार्य है।

आरोहण क्रमांक – 98.695
स्थानीय नाम – पट्टचित्र, कृष्ण जन्म कथा
समुदाय – चित्रकार
स्थानीयता –पुरी, ओडिशा
माप – ऊँचाई – 192 सेमी; चौड़ाई- 55 सेमी;
श्रेणी – ‘ए’

OBJECT OF THE WEEK-44
(22-28 March, 2021)

Due to spread of COVID-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Object of the Week’ to showcase its collection from all over India. Initially this series will focus on the masterpieces from its collection which are considered as unique for their contribution to the cultural history of a particular ethnic group or area. These masterpieces belong to the “AA” & “A” category. There are 64 objects in these categories.

PATTACHITRA, Krishna Janma Katha

The palm leaf painting ‘Pattachitra’ resembles the old murals of the religious centre of Puri, Odisha. The best works of Pattachitra are found in and around Puri, especially in the village of Raghurajpur. Pattachitra on palm leaf locally called Talapatra chitra is one of the most famous indigenous and sacred art form. Palm leaves were earlier used as writing material for manuscripts. For preparing pattachitra palm leaves are stitched together in zigzag folds with threads using needle. On the brittle surface of the leaf beautiful drawings are etched carefully with a sharp pointed iron tool. The color is spread or rubbed all over the leaves with the help of a piece of cotton cloth and then cleaned and wiped with another cloth giving fine black color to the carved lines leaving the rest of surface clean.The subjects from great epics like Ramayana, Mahabharata and Krishna Leela are mostly chosen for the illustrations. The pattachitra shown here is rarest of its kind due to minute designs depicting the birth and life of lord krishna.

Acc. No. –  98.695
Local Name  –  PATTACHITRA, Krishna Janma Kath
Tribe/Community – Chitrakar
Locality   –  Puri, Odisha
Measurement – Height – 192  cm., Width- 55
cm;
Category –   ‘A’

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