ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-43

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -43
(08 अप्रैल, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मुक्ताकाश प्रदर्शनी कुम्हार पारा से
मध्यप्रदेश  की कुम्हारी परम्पराऐं

भारतीय मानचित्र में केन्द्रीय स्थिति प्राप्त और भारत का हृदय प्रदेष कहलाने वाला राज्य मध्यप्रदेश अपने गौरवशाली अतीत के लिए जाना जाता रहा है।

भारत के राजनैतिक मानचित्र में वन,मरूस्थल, तटीय, पठारी और मैदानी जैसी भौगोलिक ही नहीं बल्कि भाषायी, रहन-सहन खानपान और जलवायु की विषमता वाले छः राज्यों के साथ सीमायी साझेदारी करता यह अनूठा प्रदेश देश की गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल है।

क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत के दूसरे सबसे बडे राज्य को यदि प्रकृति ने कैमूर, मालवा और निमाड के सतत पठारी क्षेत्र दिये हैं तो वहीं नर्मदा, चंबल, बाणगंगा, ताप्ती, सोनभद्र, क्षिप्रा जैसी नदियां और विंध्याचल तथा सतपुडा के पर्वतीय क्षेत्रों सहित झाबुआ की पहाडी और वन्यभूमि भी दी है जिसमें लोक जनजातीय और नगरीय सभ्यताएं और संस्कृतियां अपनी रंगबिरंगी आभास से जीवन को आलोकित करती रहीं है। निशिचित ही यह किसी भी राज्य के लिए अतुल्य गौरव का विषय होगा कि उसकी धरा को ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक संपन्नता भी हासिल है।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से दो ओमकारेश्वर और महाकालेश्वर तथा गुरू सांदिपनी के आश्रम के रूप में द्वापर युग से ही शिक्षा के केन्द्र, भारत के विषिष्ट राजवशों की कार्यस्थली, भीमबैठका, सांची, उज्जयिनी, जैसी विष्व धरोहर स्थलों के साथ खजुराहो की स्थापत्य धरोहर और पचमढी, कान्हा, पेंच इत्यादि दर्जनों प्राकृतिक और वनसंपदाओं को समेटे इस प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता का हर पक्ष अतुलनीय है।

बात चाहे साहित्य की हो, शिल्प की, संगीत नृत्य की, खानपान और बोली की या फिर रीति रिवाज और परम्पराओं और त्यौहारों की, संस्कृति का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है।

लकडी, धातु, पत्थर, वस्त्र, कोई भी माध्यम हो, मध्यप्रदेश का शिल्पी समुदाय उसमें प्राणों का संचार कर देता है। यही कारण है कि कारीगर और इतर समाज के बीच अंतर्संबधों का एक ऐसा ताना-बाना है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। इसका छेाटा सा उदाहरण हमें इस प्रदेश की लोक-परंपराओं और कुम्हारी कला के उत्पादों के रूप में देखने को मिलता है।

भौगोलिक विषमताओं के अनुसार मध्यप्रदेष की मिटटी में भी विषमता देखने को मिलती है परंतु कारीगर उसको उपयोगी बनाने में निपुण होते हैं और दीपक से लेकर विशालकाय मूर्तिंयां गढ लेते है।

मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक मृदभाण्डों और अन्य मृदा उत्पादों के इर्द-गिर्द रचे जीवन चक्र के प्रस्तुतिकरण का एक संक्षिप्त प्रयास, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की मुक्ताकाश प्रदर्शनी कुम्हारपारा में मध्यप्रदेश की झांकी में किया गया है।

Online Exhibition Series-43
(08th April, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From the Open Air Exhibition of Kumhar-Para
POTTERY TRADITIONS OF MADHYA PRADESH

Occupying a central location in the Indian map, also known as the heart of India, Madhya Pradesh has also been known for its glorious past. This unique state of India shares its border with six states not only differentiated by their geographical features like forests, deserts, coastal, plateau, and plains in the political map but also for diverse linguistic, living patterns or lifestyles, food habits, and climates exemplifies the “Ganga Jamuni Sanskriti,” the mix blend of culture of the country.


Area wise, the second largest state of India has been granted with the plateau of Kaiur, Malwa, and Nimar. On the other hand, there are rivers like Narmada, Chambal, Banganga, Tapti, Sonbhadra, Kshipra, mountains of Vindhyanchal and Satpura, including hilly and forestland of Jhabua is also there in which folk, tribal and urban civilization and cultures have been illuminating the life with their colorful aura. It is definitely a matter of incredible grace and pride for a state that it posses historic and prehistoric cultural property.


Each and every aspect of the cultural diversity of the state consisting of two out of famous 12 Jyotirling, namely Omkareshwar and Mahakaleshwar, an education hub in the form of Sandeepani Ashram since Dwapar era, workplace of important dynasties of India, world heritage sites like Bhimbhetika, Sanchi, and Ujjaini, besides architectural heritage of Khajuraho and dozens of natural and forest wealth like Panchmadhi, Kanha, Pench, etc., is truly incredible.


It may be about anything, whether literature, craft, music, dance, cuisine, dialect or customs, traditions and festivals any of the aspect of culture is not untouched by the same.


Be it wood, metal, stone textile, or any other medium; artisan communities infuse the life in them. That is why a strong network of inter-community relationships between artisan communities and the rest of the society that imagination of either is impossible without the other one. A small example of the same can be seen with pottery products and the folk tradition of this state.


As per the geographical diversity, unevenness, or variety in the soil of Madhya Pradesh is also seen, but artists are perfect in making it useful and create articles ranging from tiny lamps to mannequins. A short attempt to portray the life cycle around pottery and other clay objects has been made in this corner of the “Kumharpara,” an open-air exhibition of the Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya.

Introductory video on the Open Air Exhibition of Kumhar-Para : POTTERY TRADITIONS OF MADHYA PRADESH