ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-46

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -46
(29 अप्रैल, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
कारापातमाजुली, असम के वैष्णव मठ का एक पारंपरिक द्वार

माजुली असम की विशाल नदी ब्रह्मपुत्र में एक द्वीप है। माजुली को नव-वैष्णव आंदोलन, जो 15 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जागृत हुआ था, के महत्वपूर्ण  केंद्रों में से एक माना गया है, । असम के इतिहास में माजुली को 16 वीं शताब्दी में श्रीमंत शंकरदेव और उनके अग्रणी शिष्य माधवदेव की ऐतिहासिक मुलाकात के लिए याद किया जाता है,  जिसे मणिकंचन संजोग के रूप में जाना जाता है, जिससे असम में नव-वैष्णव आंदोलन को बढ़ावा मिला। कहा जाता है कि शंकरदेव ने एक बिल्वा वृक्ष लगाकर द्वीप पर प्रथम सत्र स्थापित किया और उसका नामकरण बेलगुरी किया। इस श्रृंखला के अंतर्गत इस बार माजुली, असम के कमलाबाड़ी सत्र के पारंपरिक द्वार की प्रतिकृति के बारे में जानकारी दी जा रही है जिसे वर्ष 2019 में संग्रहालय परिसर में प्रवेश द्वार क्रमांक दो के नजदीक स्थापित किया गया है।

कारापात (पारंपरिक प्रवेश द्वार)-

यह वैष्णव मठ का एक आकर्षक रूप में सजाया गया विशाल और भव्य प्रवेश द्वार है, जो भक्ति की वैष्णव अवधारणा से जुड़ा है। कुछ कारापात आकर्षक रूप से चित्रित किए गए हैं, जबकि कुछ अन्य कारापात एक ही रंग से चित्रित किए गए प्रतीत होते हैं। एक सत्र से दूसरे में कारापात वास्तु प्रतिमानों में संरचनात्मक रूप से भिन्न हो सकते हैं, लेकिन भक्ति के रूप में कारापात के मुख्य अर्थ समान हैं। हालाँकि, 15 वीं या 16 वीं शताब्दी की वे संरचनाएं अब कंक्रीट संरचनाओं में बदल गई हैं, लेकिन आज भी इन प्राचीन विशाल लकड़ी के स्तंभों के तत्वों को माजुली के सत्रों के नामघर में मौजूद पा सकते हैं।

नामसिंघा (शेर की आकृति)-

नामासिंघा एक अभिव्यक्ति है, जो भगवान के नाम का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी दिव्य शक्ति एवं सौम्य उपस्थिति किसी भी समय सभी के लिए सर्वोच्च है जो नैतिकता देते हैं कि प्रभु का नाम जंगल में एक शक्तिशाली शेर की तरह है, जो ताकतवर हाथी को भी पराजित कर सकता है। इसलिए, असम में नव-वैष्णव के संस्थापक, महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव ने नाम भक्ति (भगवान के नाम का पाठ करने की भक्ति) की शक्ति के लिए इस प्रतीकात्मक प्रतिमा को स्थापित किया और यह करापात का एक प्रमुख आकर्षण एवं असम  के सत्रों की वैष्णव संस्कृति का प्रतीक बन गया।

खेलनाव (नाव)-

इस कारापात का क्षैतिज शीर्ष एक खेलनाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो तीव्र आवागमन या नाव-दौड़ में भाग लेने वाली एक पारंपरिक नाव है। भगतों (सत्र के भिक्षुओं) के अनुसार, खेलनाव एक ब्रह्मांडीय महासागर में पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करती है, जो मानव के अधर्मी कार्यों और बुरे विचारों की गहराई में डूबने से अनजान है। भगवान के नाम के प्रति समर्पित भक्ति इस ब्रह्मांडीय जलयात्रा में डूबने से बचा कर स्वर्ग तक पहुंचा सकती है। खेलनाव के पार्श्व सिरों में प्रतीकात्मक आकृतियाँ हैं जो मछली का आधा शरीर निगलते हुए मगरमच्छ को दिखाती हैं जो उस मानव का प्रतीक है जिसकी गलती उसे घातक प्राणियों (पाप) के मुंह में फंसा देती है और भगवान के नाम की भक्ति रूपी खेलनाव सत्य और परमानंद का एकमात्र मार्ग प्रशस्त करती है।

सिंघासन (प्रार्थना के लिए लकड़ी की बहुस्तरीय संरचना)-

सत्र के नामघर (प्रार्थना हॉल) के अंदर प्रार्थना के लिए रंगीन और बहुस्तरीय लकड़ी की संरचना का एक विशाल सिंघासन स्थापित है। सभी सत्रों में सिंघासन में भगवान के नाम उच्चारण के लिए सबसे अधिक भक्ति निहित है। हिंदू विश्वास परंपरा के अनुसार सिंघासन को कछुआ पर खड़ा दिखाया गया है, जो पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करता है। सप्त स्तरीय सिंघासन ‘सप्तबैकुन्ठ’ का प्रतिनिधित्व करता है, जो सर्वोच्च प्रभु के सात आकाशीय निवास हैं।

सारांश-

यह कारापात वैष्णव मठ के द्वार का केवल वास्तु प्रतिमान ही नहीं है बल्कि इस नदी-द्वीप असम में नव-वैष्णव धर्म का प्रचार करने वाले लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को संस्थागत रूप देने के साथ विकसित हुई रचनात्मकता की सार्थक अभिव्यक्ति भी है। हालाँकि, सत्र में प्रयोग किए गए प्रतीकों को धार्मिक संस्तुति प्राप्त है तथापि यह एक अनुशासित सामाजिक जीवन, सद्भाव और अखंडता का प्रसार करता है।

Online Exhibition Series-46
(29th April, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

Open Air Exhibition
KARAPAT- a traditional gate of the Vaishnava Monastery
in Majuli, Assam

Brief introduction

Majuli is an island of the mighty river Brahmaputra, Assam. Majuli has been reckoned as one of the important nerve centers of the Neo-Vaishnavite Movement that awakened in the later period of the 15th Century CE. In the history of Assam, Majuli is remembered for the historic meet of the Srimanta Sankardeva and his foremost disciple Madhavdeva in the 16th Century CE, and this event is reckoned as the Manikanchana Sanyog that propelled the neo-Vaishnava movement in the Assam. It is said that Sankaradeva established the first institution Satra on the island by planting a Bilva tree and naming the place as the Belguri1.

In this episode, an architectural grandeur and cultural meanings of Karapat with reference to the prototype of the magnificent gate from the Kamlabari Satra, established in the Museum premise in the year 2019 is presented.

Karapat (traditional entrance gate)

It is an attractively decorated massive gate that stands at the entrance of Satra- a Vaishnava Monastery, associated with the Vaishnava concept of Bhakti or devotion. Some Karapats are attractively painted, while some other Karapat appears to have been painted with a single color. Karapat from one Satra to the other may structurally differ in terms of their architectural patterns, but the core meaning of the use of Karapat as a devotional entity remains the same. Although those structures of the 15th or 16th Centuries have transformed into concrete structures, one can still find the elements of these ancient but massive wooden structures of pillars existing in the Namghar of Majuli Satras today.

Naamasingha (the lion figure)

Naamasingha is an expression that represents the name of Lord, whose divine power and benign presence are ever supreme to all the supremacies that gives the moral that the name of the Lord is like a powerful Lion in the jungle who can even overpower the mighty elephant. Therefore, Mahapurush Shrimanta Sankardeva, the founder of neo-Vaishnava in Assam, conjugated this highly expressive symbolic statue to the power of Naam Bhakti (the devotion of reciting the name of Lord) and it became a prominent attraction of the Karapat and a symbol of the Vaishnava culture of the Satras of Assam.

Khelnao (the boat)

The horizontal top of this Karapat represents a Khelnao, the traditional boat used in speedy transport or a boat-race. According to Bhagatas (monks of the satra), Khelnao (boat) represents the Earth sailing on the time of a cosmic ocean, uncertain about sinking into the depth of sinful acts and evil thoughts carried by the humans. A sincere devotion to the name of the Lord can protect and overcome the sink in this cosmic sail to reach the heavenly life. The lateral ends of Khelnao have symbolic figures showing a Crock like a creature swallowing half the fish’s body that symbolizes the human whose mistake may befall into the mouth of deadly creatures (sin) and Bhakti (devotion) with the name of Lord is believed that Khelnao is the only path to the truth and bliss”.

Singhasan (multi-tiered wooden structure for prayer)

Inside the Naamghar (Prayer Hall) of the Satra (Vaishnav Monastry), a huge Singhasan of the colorful and multitiered wooden structure is installed for Prayer. Among all the Satras, Singhasan carries the highest Bhakti of the recitals to the name of the Lord. According to the Hindu belief, the Singhasan is shown standing on the Tortoise, representing the Earth. The seventh tiered Singhasana represents ‘Sapta Baikuntha,’ the seven celestial abodes of the supreme Lord.

Summary

It appears that the Karapat is not merely an architectural form of a gate in the Vaishnava Monastery; it carries meaningful expressions of human creativity evolved with an institutionalized set up of the socio-cultural life of the people who preach neo-Vaishnavism in this river-island Assam. Although the symbols used in the Satra institution are religiously ordained, it disseminates a disciplined social life, harmony, and integrity.

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1. https://www.atributetosankaradeva.org/satra_majuli.htm

Introductory video on Open Air Exhibition at IGRMS, Gate no-2 : KARAPAT- a traditional gate of the Vaishnava Monastery in Majuli, Assam