ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-47

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -47
(06 मई, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मिथक वीथी मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
ओडिशा के सोनपुर की टेराकोटा परंपरा

मिथक वीथी विभिन्न समुदायों की कहानियों और किंवदंतियों पर आधारित एक अनूठी प्रदर्शनी है जहां कलाकारों द्वारा अपने तरीके से मौखिक कथाओं को मूर्त रूप प्रदान किया गया है। इनमें चित्रकला, भित्ति-चित्र, उभरा नक्काशी कार्य, टेराकोटा और मूर्तियां विभिन्न माध्यमों, आयामों और रूपों में बनाई गयी हैं।

आज भी कई समुदायों में टेराकोटा एक जीवंत परंपरा है। यह मानव जीवन के सामाजिक-आर्थिक तथा धार्मिक पहलुओं के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं। सोनपुर की टेराकोटा मूर्तियाँ अतीत से चली आ रही पारंपरिक प्रथाओं का एक हिस्सा हैं जो प्राणी जगत एवं मानव समाज के अंतर-संबंधों को दर्शाता है। ये टेराकोटा मूर्तियाँ प्राचीन काल से ही त्यौहारों और अनुष्ठानों से जुड़ी हुई हैं।

सोनपुर को सुबरनपुर भी कहा जाता है जो ओडिशा के सोनपुर जिले में महानदी और उसकी सहायक तेल नदी के संगम पर स्थित है। यहाँ की जलवायु एवं नदी में  मिट्टी की पर्याप्त उपलब्धता ने कुंभकारों को मिट्टी से मनमोहक वस्तुएं बनाने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया। जिससे विभिन्न प्रकार के बर्तन, पशु मूर्तियां, सुंदर दीये और छत में लगने वाले खपरैल बनाए गये। पक्षियों, बंदरों और अन्य पशु आकृतियों से सुसज्जित खपरैल सोनपुर की विशेषता हैं। शायद वन्य प्राणियों को डराने या बुरी आत्माओं से अपने परिवार की रक्षा करने हेतु इस परंपरा की शुरुआत की गई थी। यह छोटे बच्चों के मनोरंजन का साधन भी है।

सोनपुर के एक कुशल कुम्हार स्वर्गीय श्री लोकनाथ राणा ने इस कला रूप को गढ़ने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने देश – विदेश के कई हिस्सों में अपने काम को प्रदर्शित किया। लोकनाथ जी के मेधा स्पर्श से  साधारण मिट्टी को भी जीवंत स्वरुप मिला। वह कहानियों, मिथकों और लोक-कथाओं के कोषाध्यक्ष थे। उनकी इस प्रतिष्ठित कला ने मिथक वीथी प्रदर्शनी में अपना एक स्थान सुनिश्चित कर लिया था। यहाँ प्रदर्शित टेराकोटा मूर्तियाँ पुराउनस या पुरा-बलद अनुष्ठान एवं लंका पोड़ी जात्रा से जुड़ी हैं।

पुराउनस या पुरा-बलद अनुष्ठान एवं लंका पोड़ी हनुमान की पूजा का उत्सव भाद्रपद अमावस्या या सप्तपुरी अमावस्या, जो कि आमतौर पर सितंबर महीने में पश्चिमी उड़ीसा में मनाया जाता है। पुराउनस समारोह के दौरान, पकी मिट्टी से बनी बैल की मूर्तियों की पूजा की जाती है। चूंकि मवेशी ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग हैं और कृषि कार्यों में इनका उपयोग किया जाता है, इसलिए बैल के कठिन श्रम से हुई पीढ़ा को राहत देने के लिए, वे बैल की पूजा करके आभार व्यक्त करते हैं। पकी मिट्टी से बनी मूर्तियों और मिठाइयों से भरे छोटे-छोटे बर्तन देवी सठी को चढ़ाए जाते हैं। अनुष्ठान पूरा होने के बाद, बैल की मूर्तियों को आस-पास की नदियों या तालाबों में विसर्जित कर दिया जाता है।

सोनेपुर को पश्चिमी लंका के रूप में भी जाना जाता है और इससे संबंधित आराध्य देवी लंकेश्वरी हैं। इसलिए महाकाव्य रामायण के लंका दहन प्रकरण को मनाने के लिए, वे लंका पोड़ी जात्रा मनाते हैं। इस जात्रा में युवा लड़के अपनी खिलौना गाड़ी हनुमान के साथ खेलते और दौड़ लगाते हैं। पूंछ के चारों ओर कपड़ा बांध उसे तेल में डूबाकर दौड़ के दौरान जलाया जाता है।

समुद्र मन्थन से निकले चौदह रत्नों में से एक कामधेनु गाय देवताओं द्वारा वशिष्ठ को प्रदान की गई थी। यह समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली तथा समस्त पशु – धन की जननी मानी जाती है। इनकी मृण-मूर्ति कुम्हारों द्वारा भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में अर्ध-नारी, अर्ध-गौ के रूप में निर्मित की जाती है। सम्बलपुर क्षेत्र के गाँवों में इनके अनेक स्थान हैं, जहाँ कार्तिक माह में यह मूर्ति कामनापूर्ति हेतु चढ़ाई जाती है।

Online Exhibition Series-47
(06th May, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From the open air exhibition Mythological Trail
Living Terracotta of Sonepur, Odisha

Based on the stories and legends of different communities a unique exhibition Mythological Trail is curated where oral narratives are transformed to tangible forms by the artists in their own way. These are in the form of painting, murals, reliefs, terracotta and sculptures of various mediums, forms and dimensions.

Terracotta is a living tradition among many ethnic groups till date. These are deeply associated with the socio – economic and religious aspect of human life. Terracotta figurines of Sonepur are a part of ongoing traditional practices and understanding the inter relationship of human society with animal world.  These terracotta figurines are associated with festival and ritual practices from ancient times.

Sonepur also known as Subarnapur is situated on the confluence of river Mahanadi and its tributary Tel in Sonepur district of Odisha. The conducive geomorphology with the availability of ample river clay has provided an environment to the Kumbhars, to create a magic with this clay. Varieties of pots, animal figurines, beautiful lamps and roof tiles are made. Roof tiles with figures like birds, monkeys and other animals are a speciality of Sonepur. The tradition may originated in the need to scare the wild animals or to protect the family from evil spirits. This is also a means of entertainment for the small children.

Late Shri Loknath Rana, a proficient potter from Sonepur devoted his entire life in crafting this art form. He demonstrated his work in many parts of the county and abroad. The medhas touch of Loknath ji put life into mere clay. He was a treasurer of stories, myths and folklores. He had created a space for his terracotta art work in mythological trail exhibition. The terracotta figurines exhibited here are associated with Purauans or Pura Balada Rituals and Lanka Podi Jatra.

Bhadrapad Amavasya or Saptapuree Amavasya, generally falls in the month of September, western Orissa celebrates the ritual of Purauans or Pura Balada rituals and the Jatra of Lanka podi Hanuman. During Purauansa ceremony, terracotta figurines of bull are worshiped. As cattle are integral part of the rural life and used in agricultural works, in order to give relief to the hard labour of bull, they express gratitude towards the bull by worshipping them. Terracotta figurines and miniature pots filled with sweets are offered to goddess satthi. After the completion of rituals, the bull figurines are immerse in nearby rivers or ponds.

Sonepur is also known as Paschima Lanka and the associated deity is Devi Lankeswari. So to commemorate the Lanka Dahan episode of epic Ramayana, they celebrate Lanka Podi jatra. In this jatra Young boys play and race with their toy cart hanuman. Oil dipped cloth tied around the tail is lit during the race.

Kamdhenu, the wish fulfilling goddess is regarded as one of the fourteen precious things emerging out of the Samudramanthan, or the churning of the ocean. Supposed to be the wish-giver and was bestowed upon the Rishi, Vasishtha by the gods themselves. The terracotta image of Kamdhenu as half woman and half cow is made by potters all over India and is revered as the mother of all cattle. In the western Odihsa, there are many shrines dedicated to her, where in the month of October, the image is offered by the devotees for wish-fulfilment.

Introductory video on the open air exhibition Mythological Trail Living Terracotta of Sonepur, Odisha