ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-50

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -50
(27 मई, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

एथनो-म्यूजिकल दीर्घा से 
(वीथि संकुल -अंतरंग संग्रहालय भवन )
रॉचेम- एक मिजो संगीत वाद्य यंत्र 

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के आरक्षित संग्रह में 1400 से अधिक संगीत वाद्ययंत्र हैं। ये संगीत वाद्ययंत्र देश के आदिवासी, ग्रामीण और लोक समुदाय से एकत्र किए गए है । संग्रहालय के पारम्परिक संगीत वाद्ययंत्रों के संग्रहों को प्रदर्शित करने वाली इस एथनो-म्यूजिकल दीर्घा में आवश्यक रिनोवेशन के पश्चात् इसके विस्तारित स्वरुप को संग्रहालय के 40 वें स्थापना दिवस समारोह के शुभ अवसर पर दर्शकों  के लिए पुनः प्रारम्भ किया गया | इस दीर्घा के संयोजन हेतु संग्रहालय के  विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्रों के विशाल संग्रह में से 204 वाद्ययंत्रों का चयन किया गया । दीर्घा  में प्रादर्शों  को टाइपोलॉजिकल रूप से क्रमबद्ध किया गया है और इसमें भारत में मणिपुर राज्य के युवा मूर्तिकला कलाकारों द्वारा विकसित पुतलों या 3 डी मॉडल शामिल हैं। एक विशेष कोना पश्चिम बंगाल और झारखंड की संथाल जनजाति से संबंधित पारंपरिक वाद्ययंत्र बनम के संग्रह को समर्पित है।

ऑलाइन प्रदर्शनी की यह श्रृंखला रॉचेम नामक एक संगीत वाद्ययंत्र की जानकारी प्रदान करता है जो मिजोरम के मिजो जनजाति से  संबंधित है। यह संगीत वाद्ययंत्र संग्रहालय  की एथनो-म्यूजिकल गैलरी के विंड इंस्ट्रूमेंट्स सेक्शन में प्रदर्शित किया गया है। रॉकेम मिज़ो जनजाति का एक कुशलतापूर्वक तैयार किया गया वाद्य यंत्र है । यह भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में रहने वाली कुकी-चिन जनजातियों के बीच व्यापक रूप से फैली हुई है और विभिन्न कुकी और चिन जनजातियों द्वारा अलग-अलग नामों से जानी जाती है। रॉचेम की तैयारी में प्रयुक्त सामग्री लगभग अन्य समकक्षों के समान है। इसे अलग-अलग लंबाई के स्थानीय छोटे बांस की छड़ी, सूखी लौकी, पीतल की पन्नी, मधुमक्खी के मोम और सीप के खोल के पाउडर का उपयोग करके तैयार किया जाता है। लौकी और छोटे बांस के नरकट रॉचेम के सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं, उन्हें उचित समय पर एकत्र कर रखा लिया जाता है और उचित समय पर इनका उपयोग  वाद्ययंत्र के निर्माण हेतु किया जाता है । लौकी या तो जंगली हो या आसपास के आवासीय क्षेत्र में लगा कर, उसे तैयार होने तक किसी भी प्रकार के अवांछित नुकसान या क्षति से बचाव  और सुरक्षा दी जाती है। लौकी की बाहरी सतह पीली हो जाने पर इसे एकत्र कर लिया जाता है। लौकी को छीलकर कुछ दिनों के लिए धूप में रखा जाता है। इसे कीट और दीमक  से बचाने के लिए चूल्हे अथवा चिमनी के ऊपर रखा जाता  है।

रॉचेम का  मुख्य भाग कम्पन्न होने वाले सूखे लौकी का होता है। इसमें बांस के पाइप के नौ सरकण्डे हैं जिनमें स्वरों और ध्वनि  के ट्यूनिंग हेतु छिद्र हैं। इनमें से प्रत्येक पाइप में वांछित स्वरों और ध्वनि के अनुसार अंदर की ओर पीतल धातु की पन्नी की बजर होती है। बजर की कंपन ध्वनि के साथ गूंजन उत्पन्न करने लिए लौकी के मुंह से बांस के पाइप से बना एक फुकनी डाला जाता है। रॉचेम केवल पुरुष द्वारा बजाया जाता है। रॉचेम बजाने की अपनी कुशलता  के लिए  इन्हें मिज़ो समाज मेंसम्मानजनक स्थान प्राप्त है। वाद्य यंत्र को एक सुविधाजनक स्थिति में पकड़कर,  हवा की फूंक के साथ बांस के पाइप के छेद पर उंगलियों के साथ लयबद्ध स्वर व ध्वनि उतपन्न  करता है। कुछ लोक प्रदर्शनों में, रॉचेम वादक अन्य नर्तकियों के साथ नृत्य का भी प्रदर्शन करता है। चूंकि यह वाद्य यंत्र खुशी और प्रसन्नता से जुड़ा है, इसलिए इसे पारंपरिक रूप से मृतकों के शोक समारोह के दौरान बजाने से परहेज किया जाता है।


चीन और कई अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में, यह वाद्य  यंत्र विभिन्न स्थानीय रूपों में भी देखा जाता है। रॉचेम के  विभिन्न स्थानीय स्वरुप हमें संगीत की एकता और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ उनके प्राचीन अतीत में मिज़ो के अनकहे ऐतिहासिक संबंधों का संकेत प्रदान करता है।

Online Exhibition Series-50
(27th May, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From the Ethno-Musical Gallery
(Veethi Sankul Indoor Building Complex)
RAWCHEM- THE MIZO MUSICAL INSTRUMENT

The Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya has over 1400 musical instruments in its reserve collection. These musical instruments were collected from the tribal, rural and folk population of the country. The gallery showcasing the Ethno-musical collections had undergone the revamp process and it was re-opened to the general public during the auspicious occasion of the 40th Foundation Day Celebration of the museum. Out of the large collection of musical instruments of various types in the museum, 204 instruments were selected and displayed for public in this gallery. The exhibits in gallery are typologically ordered and it contains mannequins or 3D models developed by the young sculpture artists hailing from the state of Manipur in India. A special corner is dedicated to collections of Banam –a traditional string instrument belonging to the Santhal tribe of West Bengal and Jharkhand. 


This episode provides information of a musical instrument called Rawchem that comes from the Mizo tribe of Mizoram. This musical instrument is exhibited in Wind Instruments Section of the ethno-musical gallery of the IGRMS. Rawchem is an ingenously prepared wind instrument of the Mizo tribe. It is widely spread among the Kuki-chin tribes inhabiting across the north-eastern region of India and known by different names by different Kuki and Chin tribes. The materials used in the preparation of Rawchem are almost similar to the other counterparts. It is prepared by using local small bamboo reeds of different length, dry gourd, brass foil, bee wax and powder of oyster shell. Bottle gourd and small bamboo reeds being the most important component of Rawchem; they are collected in appropriate time and kept for seasoning. The gourd either wild or planted in the surrounding homestead land is given appropriate care and protection from any kind of unwanted loss or damages until it is harvested. The gourd is collected only when the outer surface of the body turns yellow. The skin of the gourd is scrapped and exposed to the sunlight for few days. It is than seasoned by keeping above the fireplace to prevent from insect and termite attack. 

Rawchem consists of a resonating body of dry gourd. It has nine reeds of bamboo pipe with tuning holes for notes and sounds. Each of these pipes contains brass metal foil buzzer fixed inside according to the desired notes and sound. A bellow made of bamboo pipe is inserted from the mouth of the gourd to blow wind into the shell to resonate with the vibrating sound of the buzzer. Rawchem is played only by the male. He has a dignified position in the Mizo society for his skillful art of playing Rawchem. By holding the instrument in a convinient position, the player blows air from the mouth piece and tunes the rythmic notes with fingers on the holes of the bamboo pipes. In some folk performances, Rawchem player also exhibit elegant moves and bodily gestures to accompany the other dancers. Since this instrument is associated with the mark of joy and happiness, it is traditionally refrain to play during the mourning ceremony of the dead. 

In China and many other South-east Asian countries, this wind instrument is also seen in different local forms. Although, Rawchem exists with different ethnic versions, this unique musical instrument provides us an indication of musical oneness and the untold historical connections of the Mizos with other South-east Asian countries in their ancient past.  

Introductory video on the Ethno-Musical Gallery (Veethi Sankul Indoor Building Complex) RAWCHEM- THE MIZO MUSICAL INSTRUMENT