07 से 13 जून तक/07th to 13th June- 2021

‘सप्ताह का प्रादर्श-55’
(07 से 13 जून, 2021 तक)

कोविड-19 महामारी के प्रसार के कारण दुनिया भर के संग्रहालय बंद है लेकिन यह सभी अपने दर्शकों के साथ निरंतर रूप से जुड़े रहने के लिए विभिन्न अभिनव तरीके अपना रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने भी इस महामारी द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियो का सामना करने के लिए कई अभिनव प्रयास प्रारंभ किए है। अपने एक ऐसे ही प्रयास के अंतर्गत मानव संग्रहालय ‘सप्ताह का प्रादर्श’ नामक एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। पूरे भारत से किए गए अपने संकलन को दर्शाने के लिए संग्रहालय इस श्रंखला के प्रारंभ में अपने संकलन की अति उत्कृष्ट कृतियां प्रस्तुत कर रहा है जिन्हें एक विशिष्ट समुदाय या क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में योगदान के संदर्भ में अद्वितीय माना जाता है। यह अति उत्कृष्ट कृतियां संग्रहालय के ‘AA’और ‘A’ वर्गों से संबंधित हैं। इन वर्गों में कुल 64 प्रादर्श हैं।

खिसरा- दो मुंह वाला लकड़ी का मुखौटा

खिसरा लकड़ी का एक दो मुंह वाला मुखौटा है जिसे छत्तीसगढ़ के रजवार समुदाय के पुरुष द्वारा सैला नृत्य के समय उपयोग किया जाता है। सैला नृत्य एक प्रकार का आनंद उत्सव है जिसे फसल की कटाई के उपरांत गांव के लोगों द्वारा आयोजित किया जाता है। यह त्योहार पौष (दिसंबर-जनवरी) के महीने में आयोजित किया जाता है। इस नृत्य में लड़के अपनी छड़ी को अपने बगल में खड़े लड़के की छड़ी से टकराते हुए आगे बढ़ते हैं। खिसरा शब्द का अर्थ एक विदूषक है जो एक नर्तक समूह  में मुखौटा पहन कर लोगों को हंसाता है। यह मुखौटा स्थानीय बढ़ई द्वारा हल्दू और सज्जा की लकड़ी से बनाया जाता है। खूबसूरत पगड़ी पहने 40-50 लोगों की टोली खिसरा के साथ चलती है और गांव वालों का मनोरंजन करती है। गांव के लोग चावल, दाल और सब्जियां अर्पित कर खिसरा का अभिवादन करते हैं। दो मुंह वाला यह विशेष मुखौटा एक बार में दो विदूषकों को दर्शाता है। यह यात्रा दो महीने तक चलती है और त्योहार की समाप्ति के पश्चात इस मुखोटे को एक सामुदायिक घर- कोठार के अंदर रखा जाता है।

आरोहण क्रमांक – 95.04
स्थानीय नाम – खिसरा, दो मुंह वाला लकड़ी का मुखौटा।
समुदाय – रजवार
स्थानीयता –सरगुजा, छत्तीसगढ़

माप- ऊँचाई – 33 सेमी, चौड़ाई – 22 सेमी,
श्रेणी –
ए’

OBJECT OF THE WEEK-55
(07th to 13th June, 2021)

Due to spread of COVID-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Object of the Week’ to showcase its collection from all over India. Initially this series will focus on the masterpieces from its collection which are considered as unique for their contribution to the cultural history of a particular ethnic group or area. These masterpieces belong to the “AA” & “A” category. There are 64 objects in these categories.

KHISRA, A double faced wooden mask of male

Khisra is a double faced wooden mask and is used by a male of the Rajwar community of Chhattisgarh at the time of Saila dance. The Saila dance is a kind of merry making festival organized by the village people after the harvest season. The festival is held in the month of Paush (December- January) according to their lunar calendar. In this dance form the boys moves to strike their stick against the stick of the person standing next to them. The word Khisra means a jester who wears the mask in the group and makes the people laugh. The mask is made by the local carpenter from Haldu and Sajja wood. A team of 40-50 people wearing beautiful turbans move with Khisra and entertain the villagers. In return the village people greet Khisra by offering rice, pulses and vegetables. This particular double faced wooden mask portrays two jesters at one time. The procession takes place for two months and after completion of the festival the mask is kept inside the Kothar – a community house.

Acc. No. – 95.04
Local Name  –  KHISRA, A double faced wooden mask of male.
Tribe/Community – Rajwar

Locality   –  Mandla, Madhya Pradesh
Measurement : Max Height  33 cm., Max Width 22 cm.
Category –   ‘A’

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