ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-52

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -52
(10 जून, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

कुम्हार पारा मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
सलमोरा गांव, माजुली, असम, की कुमार समुदाय की कुम्हारी परंपरा

माजुली असम की विशाल ब्रम्हपुत्र नदी में एक द्वीप है । सलमोरा गांव माजुली द्वीप के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है, जो व्यापक पैमाने पर कुमार समुदाय द्वारा बसा हुआ है, जो एक कुशल कुम्हार और नाव बनाने में सिद्दहस्त हैं। ऐसा कहा जाता है कि कुमारों की प्रारंभिक बस्ती ऊपरी असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर सादिया में थी, और वे 13वीं से 16वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान विभिन्न चरणों में मिट्टी के बर्तनों के लिए उपयुक्त मिट्टी की तलाश में इस द्वीप पर चले आये। इस गांव में मिट्टी के बर्तन पारंपरिक रूप से महिलाओं द्वारा हाथ से बनाये जाते हैं। ये विभिन्न प्रकार के उपयोगी बर्तन, औपचारिक और सजावटी वस्तुओं का निर्माण इस द्वीप व अन्य गांवों और कस्बों में लोगों की मांगों की आपूर्ति हेतु करते हैं। जब कुमार समुदाय के लोग बड़े पैमाने पर मिट्टी के बर्तनों को लेकर विशाल ब्रम्हपुत्र नदी में नावों के माध्यम से गांव से पास के शहर तक जाते हैं तो यह एक अद्भुत दृश्य होता है ।

मानसून के प्रारंभ में, बाढ़ के दौरान मिट्टी को एकत्र करने के लिए नदी के किनारे गड्ढे तैयार किए जाते हैं। बरसात के मौसम में, नदी के किनारे वाले भाग पर नए जलोढ़ जमा हो जाते है। उपयुक्त मिट्टी को 30-40 फीट गहरे गड्ढों से खोदकर एकत्र कर लिया जाता है और नदी के किनारे ढेर लगा दिया जाता है। फिर मिट्टी को उनके घरों के आंगन में ले जाया जाता है। जिसे पानी में मिलाकर एक गड्ढे में रख दिया जाता है और भविष्य में उपयोग हेतु सुरक्षित रखने के लिए रेत से ढक दिया जाता है। मानसून खत्म होने के बाद मिट्टी के बर्तनों के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया जाता है।

कुम्हार बर्तन बनाने हेतु पारंपरिक उपकरणों और औजारों का उपयोग करते हैं।
कठ- एक लकड़ी का तख्ता होता है, जिसमें मिट्टी को रेत के साथ मिलाकर पिंड तैयार किये जाते  हैं।
इथाली- रिम को आकार देने के दौरान उपयोग किया जाने वाला कपड़ा, साथ में पानी में डूबा हुआ मिट्टी का कटोरा।
अफ़ारी- एक उथला व चौड़ा मिट्टी का कटोरा, जिसमें निचला हिस्सा धँसा हुआ होता है, जिसका उपयोग बर्तन को आकार देने के लिए रोटर के रूप में किया जाता है।
पिटन- एक लकड़ी या मिट्टी का मुदगर
बलिया- एक पत्थर या गीली मिट्टी का निहाई

इन मिट्टी के बर्तनों की अनूठी विशेषताओं में से एक अफ़ारी नामक उपकरण का प्रभावी उपयोग है। जब एक पिंड से खोलोनी नामक बर्तन का आधार तैयार किया जाता है तो इसे वांछित आकार देने के लिए अफ़ारी पर रखा जाता है। बर्तन बनाने के दौरान कुम्हार अपने पैर के अंगूठे से इस कटोरे जैसे उपकरण के किनारे को घुमाने के एक अनूठे शिल्प कौशल का प्रदर्शन करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि  यह हस्तनिर्मित और चाक से मिट्टी के बर्तनों निर्माण की अवस्था है। घर के खुले आंगन का उपयोग धूप में बर्तन सुखाने के लिए किया जाता है। सूखे मटके को भट्टी में पकाने के पूर्व ही रंगा-मिट्टी (एक प्रकार की लाल मिट्टी) से उपचार और सजावट की जाती है, जिसे कुम्हार डेरगांव आंचल में नदी किनारे से प्राप्त करते हैं, जहां इस मिट्टी के भंडार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

अनुष्ठानिक बर्तन तैयार करने हेतु सामाजिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं का उचित रूप से पालन किया जाता है। विवाह समारोह के लिए, अवंतेकेली (पवित्र जल के लिए एक बर्तन) और दहातेकेली (दही के लिए एक बर्तन) नामक विशेष बर्तन उपयुक्त अनुष्ठानों संपादित कर तैयार किए जाते हैं। जब शादी तय हो जाती है, तो इन बर्तनों को बनाने के लिए कुम्हारों को दूल्हे के घर से तामूल-पान (पान और सुपाड़ी) दिया जाता है। इन्हें तैयार करने वाले कुम्हार को एक दिन उपवास करना होता है । अगले दिन स्नान करने के बाद अनुष्ठान पूजा की जाती है। तैयारी के समय कुछ खास बातों का ध्यान रखा जाता है, जो दोनों के वैवाहिक संबंधों से गहराई से जुड़ी होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर बनाते समय घड़ा टूट जाए तो विवाह की तिथि आगे बढ़ा दी जाती है। यदि मटके में पानी जमा हो जाता है, तो शादी के दिन बारिश होगी। यदि घड़ा बार-बार टूटता है तो यह विवाह के लिए अशुभ संकेत है।

ग्रामीण अपने बर्तनों को पकाने हेतु पारंपरिक भट्टे का उपयोग करते हैं। यह एक उभरी हुई गोलाकार दीवार की संरचना है, जिसमें एक केंद्रीय भट्टी होती है जिसमें चार छिद्र होते हैं। वृत्ताकार भट्ठे की ऊपरी सतह लकड़ी के तख्ते से बनी तथा मिट्टी और पुआल से ढकी होती है। सामने की दीवार में भट्ठी में आग लगाने के लिए अंदर की ओर एक जगह होती है। एक व्यक्ति इस खुले स्थान से अंदर प्रवेश कर सकता है और आवश्यक तापमान के अनुसार आग को नियंत्रित कर सकता है। बर्तनों को पकाने के लिये इकट्ठा कर उपयुक्त रूप से व्यवस्थित किया जाता है। इसे घास और मिट्टी  के कई स्तरों से ढक कर का एक गुंबद जैसी संरचना तैयार कर ली जाती है। भट्ठी की आग समान रूप से पूरी गुंबद संरचना में वितरित होती है। मटके को पकने में लगभग 3 से 4 घंटे का समय लगता है, और उन्हें तभी हटाया जाता है जब ऊपरी गुंबद की सतह पूर्ण रूप से ठंडी हो जाती है।       

असम में माजुली द्वीप के मिट्टी के बर्तन इन प्राचीन प्रथाओं की गौरवशाली संस्कृति और परंपरा को दर्शाती है। यद्यपि कुम्हारों ने पहिया और मशीनीकृत मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करना शुरू कर दिया, फिर भी पारंपरिक विश्वास व्यवस्था अभी भी कुम्हारों में गहराई से अंतर्निहित है। संग्रहालय की इस प्रदर्शनी को 2016 में असम, माजुली द्वीप के सलमोरा गांव के कुम्हारों को आमंत्रित करके तैयार करवाया गया था।

Online Exhibition Series-52
(10th June, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Kumhar Para  open air exhibition
The Kumar Pottery of Salmora Village, Majuli, Assam

Majuli is an island in the mighty Brahmaputra river in Assam. Salmora village lies on the southeastern bank of the Majuli Island, and it is largely inhabited by the Kumar community, who are efficient potters and boat makers. It is said that the Kumars had their early settlement in Sadiya on the bank of River Brahmaputra in Upper Assam, and they migrated to this island in the quest for suitable clay for pottery in different phases during the period from the 13th to 16th Century A.D. Pottery in this village is traditionally handmade and practiced mainly by women. They produce different varieties of utilitarian pots, ceremonial and decorative items, and supply to fulfill the people’s demands in the island and other villages and towns. The inland water transport plying from the village to the nearby town carrying a large scale of pottery is a pleasing sight to the spectators.

At the onset of the monsoon, pits are prepared on the river bank to assemble clay during the floods. In the rainy season, the site gets filled with spanking new alluvium deposits on the river bank. Suitable clay is dug out and collected from 30-40 feet deep inside the pits and heaped on the river banks. The clay is then transported back to the yard of their homes. It is stored in a pit by mixing with water and covered with sand to reserve for their annual use. Pottery work begins after the monsoon is over.

The potters use traditional tools and devices for making pots.
Kath- A wooden plank used mixing the clay with tempering sand and preparing lumps
Ethali- an earthen bowl for water-dipped with the cloth used at the time of shaping the rim
Afari- A shallow and wide earthen bowl with blunted bottom end used as a rotor to shape the pot
Pitan- A wooden or earthen club or a beater
Balia- A stone or mud anvil

One of the unique features of this pottery is the effective use of a device called Afari‘. When the foundation of a pot called Kholoni is prepared from a lump, it is placed on the Afari to provide the desired shape. A unique gesture of turning the edge of this bowl-like device with the toe of the potter during pot-making endorse a great skill of craftsmanship. It sometimes appears to be a cognitive phase of transitional between the handmade and wheel pottery. The open courtyard of the house is mainly used for drying the pots under the sun. The dried pot is given pre-firing treatments and decoration with Ranga-mitti (a kind of red clay), which the potters obtain from the river banks of Dergaon Anchal, where deposits of this soil are abundantly available.

Preparing a ceremonial pot is given good care and follows appropriate social customs and practices. For a marriage ceremony, special pots called Avantekeli (a pot for sacred water) and Dahatekeli (a pot for the curd) are prepared by conducting rituals. When the marriage is fixed, Tamul-Paan (beetle-leafs and nuts) from the groom’s house is given to make these pots. The potter who prepares these will have to undergo fasting for one day—the next day, after taking a bath, ritual worship is conducted. At the time of preparation, certain things are observed, which is deeply linked to the marital relationship between the two. It is believed that if the pot breaks in the middle of the work, then the day of marriage will be extended. If water accumulates in the pot, it will rain on the wedding day. If the pot breaks repeatedly, it is a bad sign for the marriage. 

The villagers use a traditional kiln to fire their pots. It is a raised circular wall structure having a central furnace with four openings on it. The upper surface of the circular kiln is covered with wooden frames and layered with mud and straw. The front wall has a space set inwardly to provide a place for setting fire to the furnace. A person can enter inside this open space and control the fire as per the required temperature. Pots are assembled and arranged in a suitable way for firing. It is covered by using grass and layered with mud forming a dome-like structure. The fire is set from the furnace, which uniformly distributes to the entire dome structure. It takes about 3 to 4 hours to fire the pots, and they are removed only when the upper dome surface gets completely cool.

The pottery of Majuli island in Assam mirrors the glorious culture and tradition of this ancient practices. Although the potters started using wheel-thrown and mechanized pottery, the traditional belief system are still deeply embedded in the potters. This exhibition of the museum was curated in 2016 by inviting potters from the Salmora village of Majuli island, Assam.

Introductory video on the Kumhar Para  open air exhibitionThe Kumar Pottery of Salmora Village, Majuli, Assam