ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-56

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -56
(08 जुलाई
, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
मेंढका बिहाव का अनुष्ठान

मानसून  के आगमन के साथ ही मानो जैसे धरती हरी चादर ओढ़कर फूल की तरह खिल उठती है एवं चारों ओर हरियाली लहलहाने लगती हैं । प्राचीन काल से ही सही समय पर अच्छी बारिश के लिए देवी-देवताओं की पूजा करने की परंपरा रही है। इसके लिए तरह-तरह के प्रसाद चढ़ाए जाते थे, वाद्य यंत्र बजाए जाते थे और भगवान को प्रसन्न करने के लिए गीत गाए जाते थे। आज भी देश के विभिन्न भागों में मानसून के संबंध में कई अनूठी प्रथाएं प्रचलित हैं। झारखंड के सरायकेला में जमीन में गमले गाड़कर बारिश की भविष्यवाणी हो या फिर तेलंगाना में गांवों को छोड़कर जंगल में दिन गुजारने की बात। कर्नाटक में कांटों से हवा में लटकने की प्रथा हो या छत्तीसगढ़ में तुम्बा खेलकर कीचड़ में स्नान कर वर्षा का आह्वान करने की प्रथा। ऐसी ही एक अनूठी प्रथा है मेंढक और मेंढकी (मेंढक युगल) का विवाह। असम, राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों में बारिश के अभाव में मेंढक-मेंढकी की शादी कराने की परंपरा रही है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मेंढक-मेंढकी की शादी की रस्म उत्सव के साथ मनाई जाती है।

यदि सावन का महीना पूरा सूखा चला जाय तो गाँव के लोग मिलकर जिमिदारिन माता से मेडको का ब्याह करने की अनुमति मांगते हैं। सारा गाँव इस व्याह के लिये चंदा करता है। चावल-दाल, तेल- हल्दी, सूत-सिंदूर, बॉस की टोकरी, पंखा, चूडा-गुड इकट्ठा किया जाता है। मरार और पनारा जाति के लोगों को ब्याह के लिये जरूरी खजूर के पत्रों का मुकुट बनाने का काम दिया जाता है। निश्चित दिन गाँयता (पुजारी) किसी नाले से मेंढक मेंढकी को पकड़ कर लाता है। लड़के-लड़कियाँ गाजे-बाजे के साथ महुए की डाल काट कर लाते हैं, उसे मण्डप में गाड़ते हैं तथा उस पर सात फेरे सूत के बाँधते हैं। दूल्हा-दुल्हिन को मुकुट पहनाकर कपड़ा उढ़ाकर हल्दी-तेल चढ़ाया जाता है। ब्याहता स्त्री सिर पर कलश उठाये मण्डप में सात फेरे लेती है और तब कपड़े में गाँठ बाँधकर ब्याह सम्पन्न होता है। सारा गाँव भोजन करता है और तब विदाई की रस्म यानी मेंढकों को पुनः उनकी पुरानी जगह पहुँचा देने का काम होता है। मान्यता है कि ब्याह से उल्लसित मेंढक टर्रायेंगे और उनकी इस टेर पर बादल निश्चित ही आयेंगे।

इस तरह के दिलचस्प अनुष्ठान को एक मृण्मय भित्ति में चित्रित कर एक प्रदर्शनी के रूप में प्रदर्शित किया गया है जिसमें मृण्मय मेंढक-मेंढकी की प्रतिमाओं को एक दूसरे के सामने रखा गया हैं। बस्तर क्षेत्र, छत्तीसगढ़ के कोंडागांव के मृण्मूति॔ कलाकार श्री सहदेव राणा ने इस भित्तिचित्र और प्रतिमाओं को खूबसूरती से बनाया है। वह एक बहुमुखी मृण्मय कलाकार है। लोक संस्कृति से संबंधित भारत के लगभग सभी कला केंद्रों और संग्रहालयों में अलंकृत हाथी और घोड़े रूप में उनकी कला को प्रदर्शित की गया हैं। वह मृण्मय कहानियों, मिथकों और लोककथाओं के अच्छे ज्ञाता भी हैं। वो एक लम्बे अरसे से इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय  से जुड़े हुए है एवं उनके द्वारा मिथक वीथी मुक्ताकाश प्रदर्शनी में बस्तर के आदिवासी देवी-देवताओं के अनुष्ठानों और मिथकों को बनाया गया है।


Online Exhibition Series-56
(08th July, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From The Mythological Trail
Open Air Exhibition
The Ritual of Mendhka Bihav

With the arrival of monsoon the earth blossoms like a flower. There is greenery all around, as if the earth is clad with a green blanket. Since ancient times, there has been a tradition of worshiping the gods and goddesses for good rain at the right time. For this various kinds of offerings were made, musical instruments were played and songs were sung to please the God. Even today, many unique practices regarding monsoon are prevalent in different parts of the country. Whether it is rain forecast by burying pots in the ground in Seraikela of Jharkhand or leaving the villages and spending the day in the forest in Telangana, or in Karnataka there was a practice of hanging in the air with thorns. Or the practice of bathing in mud or to invoke rain by playing Tumba in Chhattisgarh. One such practice is the marriage of mendhak and mendhaki (frog couple). In many states like Assam, Rajasthan, Madhya Pradesh, Karnataka and Chhattisgarh, there has been a tradition of getting the frog married in the absence of rain. In Bastar area of Chhattisgarh the marriage ritual of mendhak and mendhaki is celebrated with festivities.   

Whenever the first half of the monsoon go dry the villagers meet at the shrine of goddess Jimidarin mata to take her permission to conduct the ritual frog marriage. Jimidarin Mata is the leading Goddess among all the guardian deities of Bastar, and is supposed to protect the village from any evil, especially diseases. She is visualized standing with flowers and rice sheaves in her hands. The whole village contributes in cash and kind towards it. A person from Marar or Panara caste is given the job of making the marriage crown from palm leaf. On the appointed day the Gayeta or the priest brings two frogs from the nearby stream, young girls and boys fetch a branch of the Mahua tree and fix it in the marriage pavillion. The crowned frog couple are then placed under the branch and anointed with turmeric and oil. A married woman carrying the pitcher takes seven rounds of the couple before the knot is tied. The whole village then feasts and makes merry. Thereafter the frog couple is taken back to their original abode. It is believed that the happy couple will croak and this will lure the clouds to their parched fields and on the third day of the marriage the rain occurs.

Such interesting ritual is visualised in the form of an exhibition and depicted in a terracotta mural with two terracotta frogs sculptures placed facing each other. The terracotta artist Shri Sahadev Rana from Kondagaon, Bastar region of Chhattisgarh has beautifully created the mural and sculpture. He is a versatile potter. His art works the beautifully ornamented elephants and horses adorn almost all the art centres and museums related to folk culture in India. He is also a treasurer of stories, myths and folklores. He has a long association with IGRMS for creating some rituals and myths of Adivasi gods and goddesses of Bastar for the open air exhibition Mythological Trail.