ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-58

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -58
(22 जुलाई
, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

पारंपरिक तकनीक उद्यान मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
सुन्नापुगनुगु –निर्माण कार्य में जुड़ाई हेतु मिश्रण तैयार करने का एक पारंपरिक यांत्रिक उपकरण

“सुन्नापुगनुगु” चूना पत्थर को पीसने एवं निर्माण कार्यों में ईंट व पत्थर की जुड़ाई करने के लिये मिश्रण तैयार करने का एक पारंपरिक उपकरण है। इसमे खोंडालाइट पत्थरों के द्वारा निर्मित एक वृत्ताकार नालीनुमा मार्ग होता है जो अधिक भार वहन करने के लिये उपयुक्त होता है। यह वृत्ताकार नालीनुमा मार्ग 1 फीट गहरा व 1 फीट चौड़ा एवं इसका अर्धव्यास 11 फीट का होता है। इसका मुख्य भाग पिसाई का पहिया “सुन्नापुराई” होता है जो बलुआ पत्थर से बना होता है। इसका वजन लगभग 350 से 400 किलो होता है। पिसाई के पत्थर के पहिये में लकड़ी की बेलनकार धुरी “पोलुकर्रा” को स्थापित करने के लिए मध्य में एक आयताकार छिद्र होता है।

जुड़ाई हेतु इस मिश्रण को तैयार करने के लिए आवश्यक सामग्रियों में मुख्य रूप से चूना पाऊडर, रेत, गुड़, बेल का फल (एगल मारमेलोस), वृक्ष की गाद, एलोवेरा (एलो बारबाड़ेसिस मिलर),  हर्रा (टर्मिनेलिया चेबुला) इत्यादि की आवश्यकता होती है । मिश्रण बनाने की यह प्रक्रिया दो चरणों मे पूर्ण होती है । इसके पहले चरण में पाऊडर तैयार करने के लिये चूना पत्थर को “सुन्नपुबत्ती” (चूना पत्थर को गर्म करने की भट्टी) द्वारा गर्म किया जाता है । इस भट्टी में कोयले की ऊर्जा से चूना पत्थर पाऊडर में परिवर्तित हो जाता है ।

दूसरे चरण में “सुन्नपुगनुगु ” के द्वारा चूना पाऊडर व रेत को 1:3 के अनुपात में लेकर इसके साथ अन्य आवश्यक सामग्रियों जैसे गुड़ का पानी, एलोवेरा, बेल का फल, खमीरीकृत हर्रा का पानी एवं वृक्षों से प्राप्त गाद को मिलाया जाता है। बैल या भैसें की सहायता से लकड़ी की धुरी को खींचकर “सुन्नापुराई” को चलाया जाता है। पहिये के भार के कारण वृत्ताकार नालीनुमा मार्ग मे डाली गई सामग्री पिस जाती है। प्रत्येक10 चक्कर पूर्ण होने पर मिश्रण में गुड़ का पानी व खमीरीकृत हर्रा मिलाते हैं। इस मिश्रण से जुड़ाई कर तैयार की गई संरचनाऐं गर्मी के दिनों में शीतलता प्रदान करती हैं। ऐतिहासिक काल में अनेकों किलों, कुओं, बावड़ियों, पुलों, स्मृति स्तंभों, धार्मिक स्थलों इत्यादि में जुड़ाई के लिये इस  मिश्रण का उपयोग किया गया है। इस पारंपरिक तकनीक का उपयोग आज भी भारत की विभिन्न पुरातात्विक धरोहरों के जीर्णोद्धार कार्य में किया जाता है।


Online Exhibition Series-58
(22nd July, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From open air exhibition –
Traditional Technology Park
Sunnapuganugu – A traditional mechanical device for preparing binding mixture for construction work

Sunnapuganugu is a traditional mechanical device for grinding limestone and preparing a lime binding mixture used for joining bricks and stone in construction works. It is a circular stone track pit built by khondalite stone pieces which is considered to be most suitable for this track pit having heavy weight resistance. This circular track is 1 feet deep and 1 feet wide and 11 feet in diameter. The main crushing roller sunnapuraiis made of sand stone and weight around 350 to 400 kilograms. This roller has a square shaped hole at the centre for fixing of wooden axle Polukarra.

The ingredients required to make this binding mixture are mainly lime powder, sand, sugarcane jaggery, bael fruit (Aegle marmelos), tree silt, Aloe Vera (Aloe barbadensis miller),  Harra (Terminelia chebula) etc. The process of mixing the ingredients is completed in two stages. In the first stage, lime powder is prepared in Sunnapubatti furnace for heating limestone. In this furnace, limestone is heated with coal in the ratio of 1:3. Limestone is converted into powder by the energy of coal in the furnace.

In the second stage, lime powder and sand are mixed in the ratio of 1:3 by Sunnapuganugu and mixed with other essential ingredients like jaggery water, aloe Vera, fermented Harra and silt obtained from trees. By pulling the wooden axle with the help of bull or male buffalo, Sunnapurai is driven. The material gets crushed due to the weight of the wheel. Jaggery water and fermented Harra are added in the mixture after completion of every 10 round. The structures made from this mixture remain cool during the summer. In the historical period this binding mixture has been used for constructing many forts, wells, step wells, bridges, memory pillars and religious places etc. This traditional technique is still used in the renovation work of various archaeological heritage of India.

Introductory video on open air exhibition -Traditional Technology Park: Sunnapuganugu – A traditional mechanical device for preparing binding mixture for construction work