ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-59

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -59
(29 जुलाई, 2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

अंतरंग संग्रहालय भवन वीथि संकुल से
दीर्घा क्रमांक 5
जातीय कलाएं गोदना परंपरा

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के अंतरंग संग्रहालय भवन वीथि संकुल की दीर्घा क्रमांक 5 में भारत के जनजातीय एवं लोक समुदायों में प्रचलित जातीय कलाओं से संबंधित 123 प्रादर्शों को प्रदर्शित किया गया है। यह प्रादर्श विभिन्न पर्यावरणिक एवं भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी  और लोक समुदायों के रीति-रिवाजों, त्यौहारों, सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों से संबंधित है।   

प्रदर्शित किये गये प्रादर्शों में तमिलनाडु के चेटिटयार समुदाय के नक्काशीदार दरवाजे, छत्तीसगढ़ के समुदाय रजवार की भित्ति कलाकृतियाँ, उड़ीसा के भोत्तडा जनजाति की धान से सृजित कलाकृतियाँ, मध्य प्रदेश की बैगा जनजाति की गोदना परंपरा, आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की चित्रकला, अगरिया जनजाति के विवाह दीप एवं मिथिला क्षेत्र की छठ पूजा से संबंधित प्रादर्शों को प्रदर्शित किया गया हैं। ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला के इस अंक में दर्शकों को इन विभिन्न कला रूपों में से बैगा जनजाति की गोदना परंपरा से रूबरू कराया जा रहा है।

बैगा जनजाति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं झारखंड में पायी जाती है। म. प्र. के मंडला, डिंडौरी, बालाघाट, शहडोल एवं अनूपपुर जिलों में बैगा समुदाय बड़ी संख्या में निवासरत हैं। मध्य प्रदेश में यह समुदाय विशेष रूप से संवेदनशील जनजाति समूह के अंतर्गत आते है। बैगा जनजाति की अपनी विशेषता, अपनी परंपरायें और अपनी कला है जो उनके क्षेत्र के वातावरण एवं प्राकृतिक संपदाओं और संसाधानों से प्रभावित है। बैगा जनजाति की विभिन्न कलाओं में से एक गोदना कला बेहद खास है इनकी तथा इससे सामाजिक- सांस्कृतिक एवं आर्थिक मान्यताओं से जुड़ी होती हैं। गुदना गुदवाने वाली महिलाओं की समाज में मान प्रतिष्टा ज्यादा होती है। इनका मानना है कि अधिक गुदनाधारी महिलाओं की ससुराल में विशेष सम्मान प्राप्त होता है।

महिला के शरीर में कम गोदना परिवार की निर्धनता का प्रतीक माना जाता है इसलिए इनमें गुदना गुदवाना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। गुदना इनके शरीर का आभूषण है। 8-12 साल की उम्र में लड़कियां गुदना गुदवाने लगती हैं और विवाह के बाद तक गुदवाती रहती है। बैगाओं में सारे गुदना एक साथ नहीं गुदवाये जाते। विभिन्न प्रकार के गोदना गुदवाने का समय और आयु अलग-अलग होती है। सबसे पहले शरीर के ऊपरी भाग कपाल, फिर हाथ, पीठ, जांघ, पछड़ी और अन्त में छाती पर गुदना गोदवाया जाता है। गोदना गुदवाने का कार्य बरसात को छोड़कर किसी भी मौसम में किया जा सकता है।

बैगा महिलाओं का गुदना बादी जाति की बदनिन महिलाओं के  द्वारा गोदा जाता है। यह लोग गांव- गांव घूमकर गोदना गोदने का कार्य करते है। बैगा जनजाति में गोदना गुदवाने के प्रति अनेकों सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं समाज में विद्यमान  हैं जो जातीय परक, सौंदर्य परक, आध्यात्मिक परक, उपचार परक होती है।

गोदना उपकरण : काजल के लेप, सुई, हींग, तेल, और रुई गोदना कला के अनिवार्य उपकरण है। कई जनजातियों में विशेष कर बैगा में काजल के लेप की जगह पेड़-पौधे की पत्तियों का रस, रमतिला का तेल एवं भिलवा बीज का उपयोग किया जाता है।

Online Exhibition Series-59
(29th July, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Veethi Sankul
the indoor museum building
Gallery No 5

Ethnic Art Tattoo tradition

Gallery number 5 of the Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya displays 123 exhibits related to the ethnic arts prevalent in tribal and folk communities of India. The exhibition focuses on the art objects that link to the traditional customs, festivals, socio-cultural and religious rituals of the native communities living in different environmental and geographical settings of the country.

The exhibits include intricately carved wooden doors of the Chettiar community of Tamil Nadu, lattice and mural exhibit of the Rajwar community of Chhattisgarh, Paddy craftwork of the Bhotada tribe of Orissa, tattoo tradition of Baiga tribe of Madhya Pradesh, paintings of the aboriginal tribe of Australia and Agaria tribe. In addition, exhibits related to the magnificent craft of iron marriage lamps and artworks related to Chhath puja of the Mithila region, Bihar, are showcased. Display in the gallery in this episode of the online exhibition series, the audience is introduced to the tattooing tradition of the Baiga tribe from various art forms.

Baiga tribe is mainly found in Madhya Pradesh, Chhattisgarh, and Jharkhand. Many Baiga people live in Mandla, Dindori, Balaghat, Shahdol, and the Anuppur districts of Madhya Pradesh. In this state, the community is recognized as the particularly vulnerable tribal group (PVTGs). The Baiga tribe has its own specialty of traditions and art, influenced by the surrounding environment and natural resources where they live. One of the important art forms of the Baiga tribe is tattoo art which is very special and deeply associated with their socio-cultural belief and economic activities. Women who bear tattoos attain high social prestige. They believe that heavily tattooed women get a special space of respect from their in-laws.

A woman with a meager tattooed body is considered to have reflected the family’s poverty, so it is necessary to get tattooed. The tattoo is regarded to be the ornament of a women’s body. At the age of 8-12 years, girls start tattooing their bodies and continue till after marriage. Among the Baiga women, all the tattoos are not prepared at once. There is appropriate age and timings for attaining different types of tattoos on their body. Initially, the upper part of the body is tattooed, especially on the forehead, then the hands, back, thighs, and finally on the chest. Tattooing can be done in any season except the rainy season.

The tattoos of Baiga women are prepared by the specialized Badnin women who belong to the Badi caste. They travel from one village to the other to perform the work of tattooing. In the Baiga society, many cultural beliefs concerning the practice of tattooing exist, and they are associated with their ethnic identity, aesthetic beauty, spirituality, and an act of healing. Items like Mascara paste, Needles, Asafoetida (Hing), Oil, and cotton are used as essential ingredients and tools used for tattooing. However, common to other tribes and the Baigas in particular, prefer to use the juice extracted from the leaves of a plant, oil of Ramtila, and Bhilwa seed as indelible material instead of Kajal paste.

Introductory video on Veethi Sankul : the indoor museum building – Gallery No 5 : Ethnic Art Tattoo tradition