ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-65

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -65
(09 सितंबर,
2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
अगरिया जनजाति का उत्पत्ति मिथक

आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, इस कथन को सही ठहराते हुए मानव ने समय-समय पर नई-नई खोजें कीं और अपनी समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया। प्रागैतिहासिक काल के दौरान, दैनिक जरूरतों को पूराकरने के लिए पत्थर के औजार और आग की खोज की गई थी। समय बीतने के साथ पहिया और धातु के औजारों के आविष्कार ने मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए और लोहे की खोज मील का पत्थर साबित हुई।

प्राचीन साहित्य में लोहा गलाने और इस पेशे से जुड़े लोगों का उल्लेख मिलता है। अगरिया जनजाति उन में से एक है जो पारंपरिक तरीके से लोहा पिघलाने का काम करते थे। यह जनजाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के मंडला, डिंडोरी, बालाघाट और सीधी जिले और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, राजगढ़ एवं कवर्धा जिलों के आसपास के क्षेत्र में निवास करती है। अगरिया मध्यप्रदेश की एकमात्र ऐसी जनजाति है, जिसने प्राचीन काल से पत्थर-लोहे के खनन का काम किया है तथा ये लोग लोहे के औजारों का निर्माण भी करते थे। लेकिन कुछ अगरिया लोग अभी भी लोहे को गलाने के अपने पारंपरिक व्यवसाय करते हैं शेष खेती के औजार बनाने का काम ही करते हैं। मैकाल पर्वत श्रृंखला से वे गहरे लाल रंग के पत्थर का चयन कर के लौह अयस्क प्राप्त करते हैं। अयस्क तथा कोयले को बराबर मात्रा में भट्टी में मिलाकर, पैर से चलने वाली धौंकनियो से जिसमे हवा पोले बांस से है, उसे गरम करते है। यह सिलसिला घंटों तक लगातार चलता रहता है। जैसे ही स्लैग (धातु-मैल) का प्रवाह बंद हो जाता है, यह माना जाता है कि प्रक्रिया समाप्त हो गई है। इसके बाद मिट्टी के जोड़ों को तोड़कर धौंकनी को हटादिया जाता है और पिघले हुए लोहे की जमा हुई गांठ को उठाया जाता है। इसे कुछ समय के लिए पीटा जाता है और फिर उससे विभिन्न प्रकार की वस्तुओं को तैयार किया जाता है। अगरिया दूल्हादेव, बूढ़ादेव की पूजाकरते हैं और उनके व्यवसाय की अध्यक्षता करने वाले देवता लोहासुर हैं जिसके विषय में माना जाता है कि वह लोहा गलाने की भट्टी में निवास करते है।

पहले यह माना जाता था कि अगरिया के लोगों के पास औजार नहीं होते थे। वे लोहे का सारा काम अपने हाथों से ही करते थे और इस प्रक्रिया में उनके हाथ-पैर हर-रोज़ जलकर खत्म हो जाते थे। यह बहुत कष्टकारी था, लेकिन अगली सुबह वापस उग आते थे। एक दिन, अगरिया अपनी परेशानियों के बारे में बताने भगवान के पास पहुंचे। भगवान की कृपा से और अपनी बुद्धि एवं कौशल का उपयोग कर के रास्ते में बैठे कुत्ते के पैरों को देख सँड़सी बनाने, कढ़फोड़वा की चोंच देख हथौड़ा बनाने की प्रेरणा मिली। उसी दिन से वे औजारों का प्रयोग करने लगे। अगरियाओं की उत्पत्ति, आग की उत्पत्ति, लकड़ी से कोयला बनाने की किंवदंतियां, लोहासुर के मिथक आदि से जुड़ी कई कहानियां हैं, लेकिन आज हम केवल उनकी उत्पत्ति से जुड़े मिथकों पर ध्यान केंद्रित करेंगे। अगरिया अपने मूल की कहानी को कुछ इस तरीके से बताते है।

पहले केवल ईश्वर था, मनुष्य नहीं था। ईश्वर के अंदर कलाकार जागा और उसने तरह-तरह के जीव-जन्तु झाड़-झरुखा और फिर कई तरह के आदमी-औरत बनाये। इन सबको उसने इन्द्रलोक में बनाया। जब इन्हें बसाने के लिए नीचे धरती की ओर देखा, तो वहाँ जल ही जल था। धरती का पता लगाना जरूरी था, क्यों कि बनाई हुई सृष्टि को पानी में छोड़ने से तो सब डूब जाता। कौए को धरती का पता लगाने का काम सौंपा गया। पानी की सतह पर अपना पन्जा निकाले बैठे ककरामल (केकड़े) ने कौए को बताया कि धरती तो पाताल में चली गई है और वहाँ उसे कीचकमल (केंचुआ) खाये जा रहा है। कीचकमल को आवाज दी गई तो वह ऊपर आया, पर धरती देने को तैयार नहीं हुआ। कौए ने ककरामल को पकड़ा और उसने कीचकमल को इस तरह तीनों इन्द्रलोक पहुँचे। ईश्वरने कीचकमल से वह मिट्टी लेली जो वह साथ लाया था। बढ़ई से एक बड़ी मथानी बनवाई और नल-नील नामक साँपों की रस्सी बनाकर मिट्टी को पानी में डाल कर मथा गया। ऐसा करने से धरती की पर्त मलाई की तरह पानी पर जम गई। ईश्वर ने उसे छूकर देखा तो वह सख्त तो हो गई थी किन्तु पानी पर डग-डिग करती हुई हिलती थी। ईश्वर गुणा भाग में लग गये और आखिर कार उन्होंने उस पर हर प्रकार की कील ठोक कर उसे स्थिर करने का उपाय किया। इस तरह बारह भाई अगरिया, तेरह भाई तमेसुर, चौदह भाई कन्सासुर ने लोहे, ताँबे और काँसे की कीलें बनाई। हेमा कलारिन ने महुए के फल से दारु बनाई, जिससे नागा बैगा ने कीलो को जगाया और तब धरती को कीलें ठोककर स्थिर कर लिया गया। बजरंगबली भीमसेन आदि वीरों को धरती पर दौड़ा कर देखा गया यह नहीं हिली। तब सबको ईश्वर ने धरती पर रख दिया और सबका नाम करण कर अलग-अलग काम सौंप दिये।

मंडला, मध्यप्रदेश के श्री रामजी राम अगरिया और श्री पंकूराम अगरिया द्वारा इस पूरी सृष्टि की कहानी को एक लोहे के फलक के रूप में दर्शाया गया है। इस विशाल लोहे के फलक की समग्र संरचना अगरिया द्वारा बनाए गए पारंपरिक लैंप के समान है, जहां दीयों के साथ ही वनस्पतियों और जीवों की एक विशाल विविधता को भी चित्रित किया गया है। हालाँ कि यह फलक दुनिया की उत्पत्ति के अगरिया मिथक और स्वयं अगरिया को भी दर्शाता है। इस लोहे के फलक की आकृतियाँ लोहे की चादर को पीटकर, काटकर और घुमाकर बनाई गई हैं जिसमें कोई जोड़ नहीं हैं।

Online Exhibition Series-65
(09th September, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Mythological Trail Open air exhibition
Origin Myth of Agaria Tribe

Necessity is the mother of invention, justifying this statement human made new discoveries from time to time and tried to overcome his problems. During prehistoric times stone tools and discovery of fire were made to meet their daily needs. With the passage of time the invention of wheel and metal tools brought revolutionary changes in human life. And the discovery of iron proved to be a milestone.

In ancient literature there is mentioned about the iron smelting and people associated with this profession. Agraia tribe is one of them who were traditional iron smelters. This tribe largely inhabited in Mandla, Dindori, Balaghat and Sidhi district of Madhya Pradesh and adjoining districts of Bilaspur, Rajgarh, Kawardha districts of Chhattisgarh. Agariya is the only tribe of Madhya Pradesh, which has worked in stone-iron mining since ancient times. The same Agariya people used to undertake the manufacture of iron tools also. But only a few Agariya are still following their traditional occupation of iron smelting and other few makes agricultural implements. They get iron ore from the Maikal range, by selecting stone of dark reddish colour. They mix ore with charcoal in equal quantities in the furnace, the blast being produced by a pair of bellows and conveyed to the furnace through bamboo tubes. This process is continued steadily for hours. Soon as the flow of slag ceases, it is supposed that the process is over. The bellows are then removed by breaking away the clay joints and deposited lump of molten iron is picked, beaten for some time and then ready into various kinds of objects. Agariya worship dulhadeo, budhadeo and the deity who presides over their profession is loha- sur, the iron demon, who is supposed to live in the smelting kilns.

Earlier it was believed that Agariya people did not have tools. They used to do all the iron work with their hands and would get burnt every day. It was very painful but everything grows back in the next morning. One day, Agariya reached out to God and aware about their troubles. With the grace of God and using their wisdom and skills they invent the tools like tongs by seeing the cross feet of a dog sitting on their way, a hammer by taking inspiration from the wood pecker’s beak. From that day onwards they started using tools. There are many stories associated with their origin, origin of fire, legends of charcoal, myths of Lohasur etc. But today we will only focus on the myth related to their origin. Agariya narrates the origin story in his own way.

In the beginning there was only God and no man. Once in a creative mood, he created all kinds of plants and trees, animals and birds, men and women. When he looked down to find a place to put them, there was water all around. The crow was then sent to find the earth. Kakramal the crab told him that earth had sunk to the netherworld where Keechakmal, that is the earthworm was nibbling away at it. Keechakmal was requested to give the earth back, but he refused. Then crab caught him by the neck and the crow in turn held Kakramal in his mouth and they reached God’s abode. God took the earth from him put it into the sea. The sea was then churned with the rope made from the entwined snakes-Nal and Neel. Like a layer of cream in milk, the earth got deposited on the surface of water. It began to solidify but remained unstable. After calculating the pros and cons, God thought of stabilizing it with nails.

The twelve Agariya brothers, the thirteen Tamasur brothers and the fourteen Kansasur brothers made the iron, copper and bronze nails respectively; HemaKalarin brewed wine from the Mahua fruit: Naga Baiga invoked the nails and only after that could the earth be fixed in place, Hanuman, Bhimsen and their likes others were asked to run on it, to test its strength and when its firmness was proved, God put all his figures on it, called them by different names, assigned them their respective jobs and thereafter left them to their new world.

This entire creation is depicted in the form of an iron panel made by Shri Ramji Ram Agariya and Shri Panku Ram Agariya of Mandla, Madhya Pradesh. The overall structure of this huge iron panel is akin to the traditional lamps made by the Agariyas where alone with the diyas an immense variety of flora and fauna also get depicted. This panel however also depicts the Agariya myth of origin of the world and Agariyas themselves. The figures in this iron panel are made by beating, cutting and twisting the iron sheet and are thus without a joint.

Shri Ramji Ram Agariya and Shri Panku Ram Agariya making the iron panel of Agariya origin myth
Depiction of Agariya with tools on the iron panel, mythological trail
Depiction of flora and fauna on the iron panel, Mythological Trail
The entire creation of Agariya origin myth depicted in the iron panel
Introductory video on Mythological Trail Open air exhibitionOrigin Myth of Agaria Tribe