ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-66

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -66
(16 सितंबर,
2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

हिमालाय ग्राम मुक्‍ताकाश प्रदर्शनी
चानसा- लद्दाख से पारम्परिक रसोई

भारत का सबसे ठंडा रेगिस्तान लद्दाख क्षेत्र है। इसे चट्टानी धरती अथवा अनेक दर्रों वाली भूमि भी कहते हैं। यह संसार का सबसे ऊंचा निर्जन पठार है। लद्दाख की ऊंचाई 2750 मीटर से लेकर 7,672 मीटर है। लद्दाख क्षेत्र में शीत ऋतु में कभी-कभी तापमान -45 डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर जाता है।

लद्दाख के निवासियों की पारंपरिक जीवन-शैली उनके भौगौलिक स्थिति के अनुरूप ढला हुआ है। यहां के स्थानीय निवासी भेड़ तथा याक पालने के साथ ग्रीष्म ऋतु में नदियों की तली में जौ की खेती करते हुए जीवनयापन करते हैं। यहां के लोग एक-दूसरे से काफ़ी जुड़े हुए हैं. जब भी खेती का समय आता है तो ये एक-दूसरे के साथ खेती में उनका हाथ बंटाते हैं| वैसे तो यहां के लोग आर्य सभ्यता से सम्बन्ध रखते हैं, लेकिन फिर भी यहां कि अधिकतर आबादी बौद्ध धर्म को मानती है । यहां का कोई घर ऐसा नहीं जहां प्रार्थना चक्र और स्तूप देखने को न मिले। प्रार्थना चक्र घुमाने से सभी पाप धुल जाते हैं, ऐसी इनकी धार्मिक मान्यता है ।

यहां के लोग बहुत ही ख़ुशमिज़ाज होते हैं. इन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास का जश्न मनाना पसंद है. शादी हो या फिर कोई त्योहार ये लोग उसे अपने पुराने रिवाज़ों के अनुसार ही मनाते हैं|

यहां के अधिकतर त्योहार फसलों और धर्म से संबंधित हैं, जिसमें लोसर उत्सव, सुरपुला तथा लद्दाख महोत्सव मुख्य है।15 दिन तक चलने वाले लद्दाख महोत्सव के दौरान लद्दाख क्षेत्र की सदियों पुरानी संस्कृति, सभ्यता, परंपराओं और जनजातीय जीवन शैली की अनुपम झलक देखने को मिलती है।स्थानीय लोग अधिकतर लद्दाखी भाषा में संवाद करना पसंद करते हैं।

इनका मुख्य भोजन थूकपा, मोमो,सोताजी, फेमर तथा मक्खन से निर्मित गुड गुड चाय जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं| यहां की पारंपरिक वेश-भूषा स्वतः ही ध्यानाकर्षित करती है।

लद्दाख में पुरुष सामान्य तौर पर गौचा नाम की एक लंबी ऊनी पोशाक पहनते हैं. महिलाएं भी एक लंबी ड्रेस पहनती हैं जिसे कूनतोप और बोक कहा जाता है. पिरक नाम की एक लंबी टोपी भी यहाँ के लोग पहनते है जो ठंड से तो बचाता ही है, साथ ही अब यह एक फैशनेबल परिधान का दर्जा पा चुका है।

किसी भी लद्दाखी परिवार में रसोई सबसे महत्वपूर्ण स्थान है| लद्दाखी रसोई एक सामुदायिक कमरे की तरह है जहाँ मेहमानों का स्वागत और मनोरंजन होता है, और परिवार आपस में मिलते हैं तथा साथ में बैठकर खाते हैं। चांसा में व्यवस्थित तरीके से सुसज्जित बर्तनों का प्रदर्शन इसकी भव्यता को दर्शाता है। इसके अंदर खुला चूल्हा या भट्टी जिसे आमतौर पर थप या थाप नाम से जाना जाता है। जो कि सर्दियों में कमरे को गर्म रखता है लकड़ी के टेबल (चोगपे) के साथ-साथ गद्देदार कालीन पर बैठने की व्यवस्था होती है पूरा स्थान बैठका या विश्राम स्थल समान होता है। जहां दिनभर के कार्य से थके मांदे लद्दाखी लोग अपनी थकान को दूर करते हैं।
परंपरागत रूप से यहां की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी लेकिन अब पर्यटन ने स्थान ले लिया है।इसकी स्थापना 2014 में हिमालय ग्राम मुक्ताकाश प्रदर्शनी में की गई है|

Online Exhibition Series-66
(16th September, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From Himalayan Village
open air exhibition of IGRMS
Chansa- A Traditional Kitchen from Ladakh

The coldest desert in India is the Ladakh region. It is also reckoned to be the rocky land or the land with many gaps. It is the highest uninhabited plateau in the world. The altitude of Ladakh ranges from 2750 meters to 7,672 meters. In the Ladakh region, the temperature sometimes dips down to -45°C in winters.

The traditional lifestyle of the residents of Ladakh has been adapted to their geographical location. The local residents make their living by raising sheep and yaks and cultivating Barley on the banks of rivers in summer. People here are very much connected to each other. During the period of cultivation, they share and co-operate one another in the farming activities. Although the people here are linked with the Aryan civilization, still, most of the population believes in the Buddhism. In the area, none of the house could be seen where Prayer Wheel and Stupas are not installed. According to their religious belief, rotation of the prayer wheel with chants will dispel all their sins.

The people here are joyous and they are akin to celebrate the events to commemorate their culture and history, either it may be a marriage or any festival, the celebration takes place according to their old customs.

Most of the festivals are linked to their religion and agricultural cycle of the crops where the Losar, Surpula and the Ladakh Festivals being the prime festive events. The 15-day long Ladakh Festival offers a unique glimpse of the age-old culture, civilization, traditions and tribal lifestyle of the Ladakh region. The localities mostly prefer to communicate in Ladakhi language.

Their staple food consists of the items like Thukpa, Momo, Sotaji, Femar and Gud-gud Tea made from butter. The traditional dress here automatically attracts attention.

Men in Ladakh generally wear a long woolen cloth called Gaucha. Women also wear long dresses called Kuntop and Bok. A traditional cap called Pirak is also worn by the people here as their traditional adornment that not only protects them from the extreme cold but also to express how it has become a fashionable garment in the region.

The kitchen is the most important place in any Ladakhi family. The Ladakhi kitchen appears like community room where guests are welcomed and entertained, and families meet and eat together. The display of utensils arranged in an orderly manner at Chansa reflects its grandeur presence. Inside, an open hearth or furnace which is commonly known as Thap or Thaap allows the room to keep warm in winters. Wooden tables (Chogpe) as well as padded carpet are neatly arranged to sit for dining purposes. The whole space provides an easeful resting place where the Ladakhi people enjoy to relax after their day’s toll of heavy work. Traditionally, their economy was based on agriculture but gradually the tourism industry has taken its place in the region. This exhibition was installed at the Himalayan Village Open Air Exhibition in the year 2014.

Introductory video on Himalayan Village open air exhibition of IGRMS-Chansa- A Traditional Kitchen from Ladakh