जनजातीय आवास -Tribal Habitat

जनजातीय आवास

घर विश्‍व व्‍यापी रूप में मनुष्‍य व बाकी की दुनिया के बीच मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाता हे, इस सीमा तक कि उसे ‘’एक शक्तिशाली भौतिक संस्‍कृति संस्‍थान’’ के रूप में पहचाना गया है। इसकी उतनी सशक्‍त अनुभूति और कहीं नहीं होती जितनी कि जनजातीय समुदायों के मध्‍य होती हैं।

      भारतीय जनजातीय जनसंख्‍या जीविकोपार्जन के भिन्‍न तरीके प्रदर्शित करती है। यदि कुछ जनसमूह आखेट और संग्रहण द्वारा जीवन-यापन करते है तो अन्‍य पशुपालन जिसमें यायावरी पशुपालन तथा पशुपालन हेतु मौसमी आव्रजन सम्मिलित है। दूसरे अन्‍य वन काट कर खेती तथा स्‍थायी खेती करते है। कुछ लोहारी जैसे व्‍यवसाय करते हैं। बाहरी पर्यावरण तथा जीविकोपार्जन ऐसे दो कारक हैं जनजातीय आवास की अपनी एक अंतर्निहित संचार महत्‍ता है। उसका निर्माण ‘’मानवीय मानदंड पर मानवीय दक्षता से मानव उपयोग के लिए होता है।

      ‘’जनजातीय आवास’’ में देश के भिन्‍न क्षेत्रो के कुछ जनजातीय घरों को प्रदर्शित किया गया है। इस हेतु जनसमुदायों का चयन, संबंधित जनसमुदाय द्वारा अपने पर्यावरण से जीवनयापन हेतु दोहन के लिए सक्रिय संबंधे की विशिष्‍टता को दर्शाने के आधार पर किया गया है। साथ-साथ कुछ अन्‍य सांस्‍कृतिक गुण एवं जनजातियों की अपनी कुछ विशेषताएँ भी कारक रही हैं। प्रदर्शनी का उद्देश्‍य जनजातियों द्वारा आसपास उपलब्‍ध देशज सामग्री का उपयोग करते हुए साधरण किन्‍तु अति उपयोगी एवम् कुशल आवास-संरचना के निर्माण की गाथा को भी दर्शाना है। ये घर मात्र आश्रय या भंडारण स्‍थल न होकर जीवंत सांस्‍कृतिक संस्‍थाएँ है जिसके इर्द-गिर्द मनुष्‍य के समूचे जीवन चक्र का ताना-बाना बुना हुआ है।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार का एक स्वायत्तशासी संस्थान है। यह संग्रहालय भारत के ह्रदय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित है। अपने आकार, समुदायों के प्रतिनिधित्व और संकलन के संदर्भ में यह अपनी तरह का सबसे विशाल मानव शास्त्रीय संग्रहालय है।

जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी इं गा रा मा स की प्रथम मुक्ताकाश प्रदर्शनी है जो भारत की पारंपरिक वास्तु विविधता पर आधारित है। इस सप्ताह इस श्रृंखला के अंतर्गत हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस मुक्ताकाश प्रदर्शनी में प्रदर्शित तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में निवास करने वाली टोडा जनजाति का पारंपरिक आवास प्रकार।

Tribal Habitat

The house, universally plays an intermediary role between the human beings and their world and as such is to be such is to be recognized as a powerfully material cultural institution. This is nowhere to be so strongly felt as in the case of tribal populations. The tribal dweiling has a communicative significance of built form. It is generally built “On a human scale by human skills for human needs”.

            The tribal populations of India have varied models of subsistence. Some are still in the hunting gathering and foraging state while others follow nomadic mode of life including nomadic pastoralism and transhumance, yet still others practice rudimentary agriculture, including swidden cultivation. The two factors, that of external environment and subsistence technology determine the character of tribal dwelling and the architecture.

            The tribal habitat represents some of the tribal dwellings from different part of the country. The selection of populations represented was based primarily upon to highlight the adaptive relationship of subsistence activity to its environment as well as some characteristic of the tribes. The exhibition also aims to highlight the simple but highly functional and efficient structures that the tribal populations construct using indigenously available material in the scarce resource situation. These dwelling unit are not simply shelters or storages but vital cultural institutions around which the entire life-cycle of the people is woven.

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya ( National Museum of Mankind), an autonomous organisation, Ministry of culture, Govt.of India. The Museum is located in the heart of India,the capital city of Bhopal in Madhya Pradesh. It is one of the largest anthropological/ethnographic museums in terms of its size, representation of communities and collection.

The ‘Tribal Habitat’ open air exhibition is the first open air exhibition of IGRMS focused on vernacular architecture diversity of India. This week we are presenting to you the traditional house type exhibit of Toda community of Nilgiri district in Tamilnadu exhibited in this open air exhibition.

मोरूंग-Morung

वारली आवास -Warli House

टोडा-Toda

बोड़ो कछारी-Bodo Kacharis

राठवा-Rathwa

कोटा-Kota

गदबा-Gadaba

सौवरा-Saora

जातापु-Jatapu

दशहरा रथ-Dussehara Rath

कोठा घर -Kotha Ghar

संथाल-Santhal

चौधरी-Choudhri

अगरिया-Agaria

भील-BHIL

मावली माता मंदिर-Maoli Mata temple

थारू-Tharu

वान्‍चो-Wanchoo

नामता (गालो आवास)-Namta

रेहांग की -Rehang-ki

नेकमोंग-Nokmong

कुनेमेची-KUNEMECHE


पारंपरिक टोडा आवास संकुल
जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी

Traditional Toda dwelling complex
Tribal Habitat Open Air Exhibition

टोडा दक्षिण भारत में तमिलनाडु के नीलगिरि जिले में बसा एक आदिवासी समुदाय है। इनके परिवार स्थायी गाँवों “मंड” या “माड” में रहते हैं। जिनके आस-पास ही एक चारागाह होता है, प्रत्येक “मंड” में आमतौर पर लगभग पाँच घर या झोपड़ियाँ होती हैं, जिनमें से तीन आवास के रूप में, एक डेयरी के रूप में और दूसरी रात में बछड़ों को आश्रय देने के लिए उपयोग की जाती है। प्रत्येक परिवार के हिस्से में एक घर “अर्श”, और गाँव की जमीन का एक हिस्सा होता है। टोडा खुद को “तोरा” कहना पसंद करते हैं। वे टोडा भाषा बोलते हैं जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है। पूजा के पवित्र स्थान को टोडा द्वारा “फो” कहा जाता है। “फो” को एक वृत्ताकार आधार पर बनाया जाता है और इसकी छत शंक्वाकार होती है जो सूखे सोला वन घास से बनायी जाती है। इनका आवास “अर्श” आधे बैरल के आकार का होता है। इनकी सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक प्रणाली लंबे सींगों वाली पहाड़ी भैंसों के बड़े झुंडों पर केंद्रित है। भैंस से प्राप्त उत्पादन (मुख्य रूप से दूध, मक्खन और घी) इनके आहार का अभिन्न अंग है। टोडा की न केवल अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पारंपरिक रूप से भैंस पर केंद्रित है वरन इनके धार्मिक व्यवहारों का एक बड़ा हिस्सा भी इस पशु और इसकी देखभाल पर केंद्रित है। आज भी जारी पारंपरिक रिवाजों में श्रम विभाजन भी शामिल है। पुरुष भैंसों की देखभाल करते हैं और महिलाएं अनुष्ठान के साथ-साथ व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल की जाने वाली शॉल पर कढ़ाई करती हैं। यह आवास संकुल टोडा जनजाति के जीवन और संस्कृति की पूरी समझ प्रदान करता है।

Todas are a pastoral tribal community inhabiting Nilgiri district of Tamilnadu in south India. Their families reside in permanent villages Mand or Madd  having each a certain tract of grazing ground surrounding it. Each Mand usually comprises about five houses or huts, three of which are used as dwellings, one as a dairy and the other for sheltering the calves at night. Each minor division of the family has a house Arsh in the Mand, and a share of the village land. The Todas prefer to call themselves Tora. They speak Toda, a language belonging to the Dravidian family of language. The sacred place of worship of Todas are called Pho. The pho is built on a circular base and its roof is conical in shape and is made of dry sola forest grass. There dwelling Arsh form a peculiar kind of oval pent shaped (half-barrel-shaped). Their social, economic and spiritual system centred on the large herds of long horned hill buffaloes. The produce derived from the buffalo (mainly milk, butter and ghee) is integral to their diet. It is not only economy and social life, traditionally centred on the buffalo, the greater part of the Toda religious observance is also focused on this animal and its care. Other traditional customs that continue today include the division of labour.  Men care for the buffaloes and women do embroidery on shawls used for ritual as well as for practical purposes. This dwelling complex provides a complete understanding of the life and culture of the Toda tribe.

Community: Toda Scheduled Tribe,  Area: Nilgiri District,    State: Tamil Nadu. Curated by: Dr. P. SANKARA RAO, Assistant Keeper.

A typical Toda Tribal settlement exhibited in IGRMS open air exhibition at Tribal Habitat.
“Pho”- Temple of the Toda tribe. It is an iconic cultural identity of Toda Tribe exhibited in IGRMS open air exhibition at Tribal Habitat.
Another view of Temple of the Toda tribe made of wood, Sola Forest dry grass, bamboo and cane etc.
“Arsh”- Traditional house of Toda tribe. Half barrel shaped structure covered with all sides except a small opening at front.
Buffalo Pen of the Toda tribe. Encircled with small stones for proper safety and security.
The Toda Man milking the buffalo.
The Toda women cooking food inside their traditional house.
Traditional embroidery work of Toda tribe is in good commercial demand in outside market.
The Toda women in their traditional dress “Putkuli”.
The Toda women performing a dance in traditional attire. Keeping the tradition alive.
Short video on IGRMS’s Traditional Toda dwelling complex:
Tribal Habitat- Open air exhibition

मोरुंग – कोन्यक नागा का युवागृह

नागा समुदायों में कोन्यक नागा एक प्रमुख समुदाय है जो मुख्यतः नागालैंड के मोन जिले में उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्र में संकेंद्रित है। राज्य की उत्तरी सीमा पर स्थित पर्वतीय इलाके और घने जंगलों से आच्छादित यह क्षेत्र पूर्व में म्यांमार और उत्तर में भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश के साथ अपनी सीमा को साझा करता है।

नागा जनजाति की सबसे प्रमुख सांस्कृतिक पहचान युवागृह है, जो एक गाँव या एक समुदाय की समृद्धि के लिए आवश्यक सामाजिक मूल्यों, नैतिकता, वैवाहिक कानूनों और वीरोचित उपलब्धियों को सिखाने में सक्रिय भूमिका निभाता है। यद्यपि, नागा युवागृह को सामान्यत: मोरुंग कहा जाता है तथापि विशिष्ट सांस्कृतिक जनसमूह के आधार पर इसके कई अन्य स्थानीय नाम भी हैं। कोन्यक नागा अपने मोरुंग को “पान” कहना पसंद करते हैं। एक गाँव में रणनीतिक स्थिति और “खेल” कहलाने वाली गलियों में गाँव के भौगोलिक विभाजन के आधार पर एक से अधिक युवागृह हो सकते हैं तथा यह मुख्य रूप से सुरक्षा चौकी  के रूप में कार्य करते हैं। एक युवागृह के सदस्यों में एक से अधिक गोत्र के लोग शामिल हो सकते हैं और उनका प्रबंधन मोरुंग के वरिष्ठ सदस्यों और स्वयंसेवकों की एक परिषद द्वारा पूर्ण स्वायत्तता के साथ किया जाता है।

कोन्यक नागा मोरुंग दीर्घ गोलाकार होता है तथा इसका प्रवेश द्वार काफी खुला होता है। वास्तव में इसका ग्राउंड प्लान यू (U) आकार का होता है। मोरंग के आसपास का क्षेत्र अनुष्ठानिक क्रियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक केंद्र होता है, विशेष रूप से जहां यह मानशम नामक लॉग-ड्रम से संबंधित हो। मोरुंग का निर्माण बसाहट की सबसे ऊंची जगह पर आम तौर पर एक खड़ी ढलान के किनारे किया जाता है। यह सदस्यों को अपने गाँव को दुश्मनों के अचानक छापे और हमलों से बचाने के लिए निगरानी करने में सक्षम बनाता है। शिरोच्छेदन प्रथाओं, उर्वरता पंथ, वीरता, टोटम और बलिदानों के प्रतीकों आदि की अभिव्यक्तियों को मोरुंग के खंबे और क्रॉस बीम पर विस्तृत रूप से उकेरे गए रूपांकनों में देखा जा सकता है।

मोरुंग के निर्माण में लकड़ी के लट्ठो, बांस एवं “यीउह” के पत्ते (ताड़ के पत्ते) इस्तेमाल किए जाते हैं। ग्राउंड प्लान में पत्थरों के ब्लॉकों का उपयोग किया जाता है जहां से कम ऊंचाई की बांस की रेलिंग तथा चटाई की दीवाल खड़ी की जाती है। मोरुंग की छत में दो तरफा ढलान है जो सामने से दीर्घ वृत्ताकार है और इसे ताड़ के पत्तों से छाया गया है। ताड़ की मोड़ी गई पत्तियों की एक के ऊपर एक सतह बनाकर बांस या बेंत की रस्सी से छप्पर पर बांधा जाता है। यह मोटा छप्पर (नोकटोक) इस आश्रय का सबसे प्रभावी पहलू है जो बिना किसी बाधा के बारिश के पानी को बाहर निकाल देता है। बांस की चटाइयों की दीवारें मानसूनी वर्षा और वसंत की तेज हवाओं से सुरक्षा प्रदान करती हैं।

मोरूंग की सामने की दीर्घ गोलाकार दीवार अन्य तीन दीवारों की तुलना में आकर्षक होती है। यह पूरी तरह से छोटे बांस या लकड़ी के खंभों की बनी होती है, जिन्हें जमीन में गाड़ा जाता है और बाँस की रस्सियों से बांध दिया जाता है। इस खुले प्रवेश द्वार पर क्षैतिज रूप से एकल लकड़ी के एक बड़े लॉग को रखा जाता है, जिसे “खाओ” कहा जाता है। यह कोन्यक मोरुंग को एक आकर्षक रूप प्रदान करता है। 12 से 14 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही युवक मोरुंग में सोना शुरू कर देते हैं। जो युवा मोरुंग के प्रवेश द्वार से एक ही छलांग में “खाओ” पार कर सकते हैं उन्हें रात में मोरुंग में सोने की पात्रता मिल जाती है।

कोन्यक नागा मोरुंग की महत्वपूर्ण विशेषता सेंट्रल पोस्ट “अचुंग शॉन्ग” तथा उसके साथ की लकड़ी की नक्काशीदार संरचनाएं हैं। उनमें उर्वरता की  अवधारणा से संबंधित सार्थक रूपांकन हैं। इस सेंट्रल पोस्ट के ऊपर लकड़ी की नक्काशीदार क्रास-बीम “पान्गपाई” क्षैतिज रूप से रखी गई है और बगल के खंभों “ताथ्रम शॉन्ग” पर टिकी हुई है। सामने की ओर के अन्य खंभों को “अपोई शॉन्ग” के रूप में जाना जाता है।

मोरुंग के अंदर युवकों के लिए सोने का कमरा “ज़ोई” है। सदस्यों की संख्या के अनुसार कमरे का आकार भिन्न होता है। मोरुंग के सदस्यों से मिलने आने वाले लोगों के बैठने के लिए सामने की तरफ “वाकम” नामक संरचना बनाई जाती है। वृद्ध लोग आम तौर पर अवकाश के समय वाकम पर बैठ कर समूह गीत गाते हैं। चूल्हे के चारों ओर तथा “जोई” के अंदर चटाइयों से बने बिस्तर रात में सोने के लिए युवाओं को निजता प्रदान करते हैं।

लॉग ड्रम एक ही पेड़ से बना एक विशाल गोंग है। अंदर से खोखला किया गया यह वाद्य यंत्र दूर से एक नाव की तरह प्रतीत होता है और लगभग 26 फीट लंबा है। कोन्यक इस ड्रम को लकड़ी के मोटे डंडों  “शम्मो” से बजाते हैं। लॉग ड्रम को लकड़ी की डंडों से निरंतर बजा कर विभिन्न लयबद्ध ध्वनियाँ निकाली जाती हैं, जिनके विभिन्न अर्थ होते हैं जैसे शिरोच्छेदन में सफलता, ग्राम के मुखिया का अंतिम संस्कार, अओलिंग उत्सव के दौरान नृत्य, गाँव में आग लगने की घटना, सौर और चंद्र गृहण के समय  समारोह का आयोजन आदि की सूचना देने के लिए।

MORUNG- The Konyak Naga Youth Dormitory

The Konyak Naga is one of the dominant Naga communities largely concentrated in the tropical forest region in the Mon district of Nagaland. Situated in the extreme northern proximity of the state with a rugged mountainous terrain and thick forest cover; the region shares its international boundary with Myanmar to the east and the state of Arunachal Pradesh in the north.

One of the very dominant cultural identities of the Naga tribe is the institution of a Youth Dormitory that plays an active role to the preaching of social values, morals, marital laws and martial accomplishments required for the prosperity of a village or a community. Although, the common nomenclature of the Naga Youth Dormitory Morung, it also has its local terms and varients depending on the distinct cultural population. The Konyak Naga prefers to call their Morung as ‘Paan’. A village may consist of more than one youth dormitory depending upon strategic location and geographical distribution of the village into lanes called ‘Khel’ and it largely functions as a guardhouse of the warriors. The members of a dormitory may comprise of more than one clan and they are managed by a council of Morung elders and volunteers with full autonomy. 

The Morung of the Konyak Naga is a long elliptical form with a wide-open entrance. It can be more strictly said as U shaped in ground plan. The area around the Morung is a social center for the commencement of important rituals, especially where it is strongly associated with a log-drum called ‘Mansham’. The Morung is generally built on the edge of a steep slope to the highest altitude of the settlement area. It enables the members to watch and protect their village from sudden raids and attacks of the enemies. Expressions of their headhunting practices, fertility cult, the symbol of valour, totem and sacrifices, etc. could be noticed from the motifs elaborately carved on the poles and cross beams of the Morung.

The materials used in the construction of Morung are wooden logs, bamboos, ‘Yeauh’ leaves (palm leaves), and stone slabs. Stone blocks are used in the ground plan from which the low height bamboo matting is erected to touch the roof slopes. The roof of the Morung is sloped on the two sides and forms semi-circle in front and is thatched with palm leaves. Folded palm leaves are layered and secured with bamboo or cane-twisted cords to the ceiling framework. The thick and shaggy palm-thatched roof “noktok” is the most dominating aspect of the shelter. It easefully drains out the rainwater very quickly. The large overhangs and two-sided thatch protect the light; woven bamboo lattice walls help to protect from the constant monsoon and also restrain the strong early spring wind.

Traditionally, stone blocks are placed to a certain height for making the lower portions of the side and front wall. The circular front wall of the Morung is fancier than the other three walls. It is entirely made of bamboo or timber poles of low height embedded in the ground and tied with bamboo splits. This elliptical form of a wide-open entrance is horizontally placed with a magnificent piece of single wood log called Khao gives a fancy look to the Konyak Morung. The male youth, when attaining the age of 12-14 years, starts sleeping in the Morung. Those who can cross the Khao (a wooden log) from the entrance of the Morung in one jump get eligibility to sleep inside the Morung at night.

The important feature of the Konyak Naga Morung is the central post “Achung Shong” and it’s supporting wooden carved structures. They carry meaningful motifs related to their concept of fertility. Along this central post, profusely carved cross-beam of wooden plank “Pangpai” runs horizontally and rests on side post called “Tathram shong”. Other elementary posts erected to the front side are known as “Apoi shong”.

‘Zoi’ is the sleeping room for the Konyak youths, made inside the Morung having some bamboo made cot “Lakho” and wooden cot “Pinkho”  inside the room. The size of the room varies according to the number of members. “Wakam” is the sitting platform made in the vicinity for the people who visit them. Older people generally sit in the “Wakam” during the leisure period and sing in the chorus. Bamboo-matted sleeping beds around the fireplace the “Zoi” provides privacy to the youths for sleeping at night.

Log drum is a huge gong made out of a single tree. This hollowed out drum like instrument appears like a boat from the distance and it is about 26 ft. in length. The Konyak Naga people beat the drum with the help of wooden clubs known as “Shammo”. The continuous beating of the log drum yields various rhythmic sounds indicating the different purposes of its utilization. These rhythms give a symbolic representation of various significant events like the success in headhunting, observance of funeral rites of the village chief, dancing during the “Aoling” festival, to give alarm of fire incidence in the village and also for ceremonial conduct during the solar and lunar eclipse.

A Konyak Naga oldman
A view of the Konyak Naga habitat, Nagaland
Morung at the Lamtok village, Mon District, Nagaland
Log drum of Konyak Naga in Lamtok village, Mon District Nagaland
Morung installed as an exhibit in the open air exhibition of the IGRMS
Konyak Naga constructing Morung at IGRMS
Celebration after successful installation of Morung at IGRMS
Konyak Naga demonstrating the rhythmic beats of Log Drum in the Museum
A Konyak Naga man displaying the tools and possession in the Morung of IGRMS
Artist with museum officials after the installation of Morung at IGRMS
Video on MORUNG- The Konyak Naga Youth Dormitory

राठवा आवास
सौन्दर्य और देशज वास्तुकला का खूबसूरत उदाहरण

राठवा भारत के सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न जनजातीय समुदायों में से एक है जिनके नाम की उत्पत्ति “राठविस्तार” शब्द से हुई है जिसका अर्थ है जंगलों या पहाड़ों में रहने वाले। राठवा गुजरात के बडोदरा, छोटा उदेपुर, तथा पंचमहल जिले के कुछ भागों मे रहते हैं।

         राठवाओं की सांस्कृतिक समृद्धि उनकी बोली, भाषा, खान-पान, पहनावे और आभूषण, धार्मिक क्रिया-कलापों, रीति-रिवाजों और परम्पराओं के साथ-साथ कला और वास्तु में भी प्रतिबिम्बित होती हैं। एक कृषक जनजाति होने के नाते राठवा बस्तियाँ 40-50 आवास युक्त होती हैं जो ज्यादातर ताड़ कुंज से घिरे हुये एवं उनके खेतों से सटे होते हैं। ढलवा छत वाले राठवा आवास बाढ़ और पानी से घर और मवेशी जो कि उनकी आजीविका का भी अभिन्न अंग है को बचाने के उद्देश्य से उभरे हुये धरातल पर बनाये जाते हैं। पूरा घर दो मुख्य भागों में बंटा होता है, रसोई घर और क्रिया-कलाप क्षे़त्र। गतिविधि या कार्य-कलाप क्षेत्र अपेक्षाकृत बड़ा होता है क्योंकि दैनिक जीवन की अधिकांश गतिविधियां जैंसे खाना, सोना, मेल-मिलाप, चर्चा, अनुष्ठान इत्यादि एक ही स्थान पर होते हैं।

         एक मंजिला किन्तु दोहरी छत वाले ये आवास मकान मालिक की आर्थिक स्थिति के अनुसार ताड़ के पत्तों या टेराकोटा के कबेलुओं की छाजन युक्त होते है। मकान का आकार लगभग एक समान होता है किन्तु माप उसके स्वामी के आर्थिक स्थिति के अनुसार होते हैं। मुख्य निर्माण सामग्री के रूप में बांस की खपचियों, ताड़ के पत्तें, ताड़ वृक्ष के तने, मिट्टी और गोबर का उपयोग किया जाता है। घर में खासकर रसोई घर में हवा और रौशनी के आने-जाने के लिये कोई खिड़की नहीं होती लेकिन घर के ऊपरी हिस्से की दीवार पूरी नही उठी होती है। उसे आंशिक रूप से खुला रखा जाता है एवं ताड़ के लम्बे-लम्बे पत्ते दीवारों से लटकते हुये बांध दिये जाते हैं।

         पिथोरा चित्रांकन हेतु तीन दीवारें तैयार की जाती है। पिथोरा का चित्र लम्बी आयताकार केन्द्रीय या बीच वाली दीवार पर बनाया जाता है जो सामान्य कक्ष का ध्यान बटाती है तथा दोनों आजू-बाजू की दीवारे भी चित्रांकन के लिये इस्तेमाल होती हैं। पिथोरा चित्र वृहद रूप से लखारा कहलाने वाले जानकार व्यक्ति द्वारा ही बनाये जाते हैं। यह एक किस्म की लिखावट है, एक माध्यम है अपनी संस्कृति, विश्वाश और इतिहास की अभिव्यक्ति का। यह उनके ईष्ट देव बाबा पिथोरा के लिये की जाने वाली धार्मिक क्रियाओं का एक अनिवार्य भाग है। पिथोरा चित्रांकन वृहद रूप से गुजरात के छोटा उदेपुर और पंचमहल जिलों के राठवा समुदाय द्वारा किया जाता है। वाधवो मुख्य, धार्मिक अभिकर्ता (पुजारी) होता है। वह सभी धार्मिक गतिविधियों को निर्देशित करता है तथा सभी सामाजिक एवं आर्थिक मामलों में प्रभावी स्थिति रखता है। घर के किसी सदस्य के बीमारी या तबियत खराब होने पर, मवेशियों संबंधी कोई भी समस्या पारिवारिक मामला, वारिश के न होने अथवा प्राकृतिक आपदाओं में वाधवों से सलाह ली जाती है। उसमें आये देवता को प्रसन्न करने या कोई मनौती या इच्छित वस्तु प्राप्त होने पर धन्यवाद देने हेतु पिथोरा चित्रकारी और संबंधित अनुष्ठान किये जाते हैं। मुश्किलों से निजात पाने और बाबा पिथोरा से मनौतियों के लिये वे केवल रेखायें बनाते हैं और पूरा होने पर अपने घर में चित्र बनाते हैं।

         चूंकि पिथोरा चित्र पवित्र होते हैं अतः चित्रांकन के पूर्व दीवार को अविवाहित लड़कियों द्वारा गोबर, पानी और चूने से ढक दिया जाता है, इसे लिपाई कहते हैं। चित्र तीन भागों में विभक्त होता है। ऊपरी भाग में सूरज और चंद्रमा का चित्र होता है। दूसरे भाग में बाबा पिथोरा के साथ देवी-देवताओं के चित्र बने होते है। पिथोरा और पिथोरी का विवाह चित्र का महत्वपूर्ण प़क्ष होता है। बारात का दृश्य बांये से दाहिने ओर होता है यह लहरियेदार, रंगीन और त्रिकोण और पंक्तिबद्ध घोंड़ों के साथ, ध्वज वाहक, ढोल वादक और अन्य देवताओं को दर्शाया जाता है। तीसरे भाग में पशु-पक्षियों के साथ सभी दैनिक गतिविधियाँ जैसे गांव, दुकानदार, शराब बनाना, छाछ बिलोना, कुँए से पानी निकालती स्त्री, नृत्य आदि दर्शाये जाते हैं। ये चित्र घर की तीनों भीतरी दीवारों पर बनाये जाते है। इन चित्रों का महत्व घर में शांति, समृद्वि और खुशहाली लाने के लिये होता है। इन चित्रों में मुख्य आकृतियां हैं बाबा गणेश (गणेश भगवान), बाबा पिथौरा (पिथोरा देव), रानी पिथोरी (बाबा पिथोरा की पत्नी), बाबा इन्द (इन्द्र सभी देवताओं के राजा), हुडोल (परोपकारी स्त्रीय आत्मा), रानी काजल (बाबा पिथोरा की धाय माँ) जिनकी व पूजा करते हैं और उनके दैनिक जीवन उनके विश्वास मिथकों और इतिहास के विभिन्न दृश्य।

         इन चित्रों में प्राथमिक या मुख्य प्रतिमान अश्व देवी-देवता और पूर्वजों के सांकेतिक प्रतिनिधित्व है। चित्र में प्रतिमानों की विस्तृतत्ता उनके दैनिक जीवन, विश्वास, मिथक और इतिहास को दर्शाती है। इन चित्रों में लाल, हरे, नीले, नारंगी, पीले, जामुनी, सफ़ेद, काले और चमकीले रंगों को दूध और महुए की शराब के साथ मिला कर इस्तेमाल किया जाता है। जिससे रंग लम्बे समय तक बने रहते हैं।

Rathawa Dwelling
A splendid example of aesthetic
an indigenous architecture

Rathawa – one amongst the culturally rich tribal communities of India, derives its name from the word “Rathbistar” which means inhabitant of a forest or hilly region. They are mostly settled in some Talukas of Vadodra, Chhota Udaipur and Panchmahal districts of Gujarat.

The cultural prosperity of Rathawas reflects in their language, food habits, dressing and ornaments, religious practices, customs and tradition and also in their art and architecture. Being an agricultural tribe, Rathawa settlement are usually comprising of 40-50 houses mostly surrounded by palm groves close to their agricultural fields. Sloppy roofed Rathawa house is build on an elevated ground to prevent the house and livestock which is an integral part of their livelihood, from over flow or flood. Entire house is divided into two major portions, the kitchen and the activity area. The activity area is relatively larger as most of the activities of daily life like eating, bedding, meeting, rituals etc. held at same place.

Single storied but sloppy roofed these houses are covered with terracotta tiles or palm leaves as per the economic status of the owner. The shape of the houses is almost similar but size differs depending upon the financial status of the owner. Bamboo splits, palm leaf, trunk of palm tree, mud and cowdung are used as the main material for construction. There is no window for ventilation or light in the house especially in kitchen but the walls above the attic have small opening for letting light and air in. The palm fronds are tied to the walls for preventing rain & splashes.

Three walls are prepared for the painting Pithora. The pithora is painted on the long rectangular central wall that overlooks the living room and the two outer walls on both sides are also used for the painting. Pithora painting is extensively done by the persons known as Lakharas. It is a form of writing, a means to express their culture, faith and history. It is an essential part of religious practice for their chief deity Baba Pithora.

Badhvo is the chief religious practitioner who directs all the religious activities and holds formidable influence over all social and economic matters. In the case of diseases, problems related to the livestock and also for their domestic issues, failure of monsoon or calamity the Badhvo is consulted. Pithora painting and related rituals are performed to thank god, appease him or for a wish or a boon to be granted. Multiple times to gain various boons from Baba Pithora to free themselves from problem they accept vows and on completion they create this painting in their house. As Pithora painting is sacred therefore, before painting the walls are plastered with clay and cowdung, then a coating of water and chuna known as Lepai by the unmarried girls. Painting is divided into 3 parts. In the upper part consists images of sun and moon. The second part is painted with images of gods and goddess along with Baba Pithora. The marriage of Baba Pithora with Pithori is one of the important aspects of the painting. The marriage procession is shown where there are horses in a line may be wavy, colourful triangles from left to right with flag carriers, drummers and the deities riding on horses. In the third part along with birds, animals all the daily activities, village traders, agricultural activities, churning, women drawing water from well dancing are shown. These paintings are done on the three inner walls of the house and it holds its significance by bringing peace, prosperity and happiness in their houses. The primary motifs of these paintings are Baba Ganeh (Lord Ganesha), Baba Pithoro (Pithora Dev), Rani Pithori (Wife of Baba Pithora), Baba Ind (Indra, The King of all gods), Hudol (The benevolent female spirit), Rani Kajol (The foster mother of Baba Pithora) whom they worship and varied scenes of their daily life, their belief, mythology and histories. Red green, blue, orange, yellow, indigo, white, black and silver colours are used in this painting mixing with milk and alcohol made from Mahuda which remain the colour for longer duration. The two side walls of the veranda are also painted with the figures of horses, the symbolic representation of gods and goddess, figures of minor deities, ghosts and ancestors.


वांचो

वांचो नागा जनजाति के रूप में जाने जाते हैं। वे उत्तरी नागालैंड सीमा पर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के लोंगडिंग, कानुबारी, पोंचाउ और वाक्का क्षेत्र में लगभग 50 गांवों में फैले हुए हैं और म्यानमार के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि वे नागालैंड से इस स्थान पर आए हैं। यह क्षेत्र पहाड़ियों, घने जंगलों, वनस्पतियों और जीवों से समृद्ध है। गाँव सघन आबादी वाले हैं, पहाड़ियों के ऊपर और ढलानों पर स्थित हैं। गांवों को दो या दो से अधिक भागों में विभाजित किया जाता है, जिसे खेल कहा जाता है, जिनमें सामान्य लोग, मुखिया के घर और युवागृह होते हैं।

मकान की एक छोर पर अर्ध-वृत्ताकार के साथ आयताकार आकार में बने होते हैं। आधी संरचना जमीन पर और आधा मचान पर बना होता है। कुछ क्षेत्रों में भौगोलिक संरचना के आधार पर यह पूर्ण रूप से जमीन पर बनाया जाता है। घर में एक प्रवेश कक्ष होता है जिसमें धन कूटने की जगह\, लॉग ड्रम, एक पक्ष और खाना पकाने के लिए चूल्हा होता है। मकान का वह हिस्सा जो मचान पर बना होता है उसमें पुरुषों का एक कमरा, एक या दो चूल्हे और शिकार की ट्राफियां, कपाल और ढाल रखने की जगह होती है। यह हिस्सा सामान्यतः छत व एक बरामदे में समाप्त होता है। पेड़ का तने से बनी सीढ़ी बरामदे को गांग से जोड़ती है।  

प्रत्येक घर में मध्य के स्तंभ में एक अनुष्ठान स्थान होता है। वांचो कई देवी-देवताओं में विश्वास करते हैं। उन्हें अपकारी और परोपकारी आत्माओं में दृढ़ विश्वास है। वांचो में से कुछ ने ईसाई धर्म अपना लिया है और कई गांवों में चर्च देखने को मिलते वांचो लोगों का जीवन त्यौहारों से भरा है और उनका मुख्य त्यौहार ओरिया है। इसे अच्छी फसल की कामना से मनाया जाता है।

निर्माण सामग्री में मुख्य रूप से लकड़ी, बल्ली और खंभे, छत के लिए बांस और उठाए गए फर्श के लिए बांस की चटाइयाँ और छत के लिए ताड़ के पत्ते का उपयोग किया जाता है। मकान के मध्य के स्तंभ छत से ऊपर तक निकले होते है। अधिकांश सामग्री जैसे बड़े लॉग ड्रम, राइस पाउंडिंग टेबल, चावल सुखाने की मेज, बिस्तर और स्टूल लकड़ी के एक ही टुकड़े से बनाया जाता है। एक मुखिया का घर अधिक बड़ा होता है तथा केन्द्रीय स्तंभ पर नक्काशी होती है।

वांचो झूम खेती करते हैं। वे लकड़ी की नक्काशी के विशेषज्ञ हैं और टोकरी, मिट्टी के बर्तन बनाने और बुनाई में भी कुशल हैं। वे एक स्थानीय वनस्पति की मदद से बकरी के बालों को रंगते हैं और इन्हें विभिन्न वस्तुओं से जोड़कर सुंदर रूप प्रदान करते हैं।

The Wanchos

The Wanchos are Popularly Known as a Naga Tribe. They are spread in nearly 50 Villages in Longding, Kanubari, Pongchau and Wakka area of eastern Arunachal Pradesh bordering Northern Nagaland and sharing international boundary with Myanmar. It is believed that they migrated to this place from Nagaland. The area is mountainous and covered with dense forests and rich in flora and fauna. The villages are thickly populated and situated on the top of the hills and sometimes on a slope. Villages are divided in two or more divisions known as khel having houses for general people, chief and dormitories.

Houses are made in rectangular shape with one end semi-circular. Half of the structure is built on the ground and half on raised platform on piles. Depending on the geographical structure in some areas it is entirely built on the ground. The house consists of an entrance room with a place for pounding rice, log drum, a central women’s compartment with sleeping rooms and a fire place for cooking food. The structure which is made on the raised platform has a common men’s room with sleeping rooms, one or two fireplaces and a place for keeping hunting trophies, skulls, gongs and shields.. This raised structure finally ends in a veranda continuing as terrace. A tree trunk staircase connects the veranda with the yard

In every house there is a ritual place in one of the central pillars of the house. The Wanchos believe in many gods and goddesses. They have a strong faith in malevolent and benevolent spirits.  Some of the Wanchos have adopted Christianity and the Church has been constructed in many Villages. The life of the Wanchos is full of festivals and their main festival is Oriya. It is celebrated for a good harvest.   

The building materials are wood mainly used as balli and pillars, bamboo for roof and woven flattened bamboo for the floor of the raised platform, and palm leaves for the thatched roof. The central posts reach above the ridge. Most of the articles like large log drum, rice pounding table, rice drying table, beds and stools are made from single piece of wood. A chief’s house is larger and has wood-carvings on the central posts in the common room.

The Wanchos practice Jhum cultivation. They specialise in wood carving and are also skilled in basketry, pottery and weaving. They dye goat’s hair with the help of a local herb and attach it to various objects to give it a beautiful look.

Introductory Video on the making of the Trasitional Wancho House at IGRMS Bhopal ,
in Tribal Habitat Open Air Exhibition under the North East India segment

जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
ओडिशा की गदबा जनजाति का पारंपरिक आवास संकुल

गदबा ओडिशा राज्य के दक्षिणी जिले कोरापुट के पर्वतों पर का निवासरत है । साथ ही वे सीमा से लगते हुए आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम और छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में भी पाये जाते है । यह पर्वतीय क्षेत्र समुद्री सतह से 1000 फीट से 3000 फीट के ऊंचाई पर है । इनके गांव एक या दो मोहल्लों से मिलकर बने होते है, साथ ही इनके चारागाह चारों ओर जंगलों से घिरे रहते है । सभा हेतु ‘सदर’ और ग्राम देवता ‘हुंडी’ गांवों मे दो प्रमुख स्थान होते है । गदबा गांवों में तीन भिन्न प्रकार के आवास प्रकार पाये जाते है । प्रथम और सर्वाधिक पारंपरिक आवास प्रकार, जिसकी विशेषता उसका वृत्ताकार आकार एवं शंक्वाकार छप्पर होती है, ‘चेंडिडियन’ के नाम से जाना जाता है । द्वितीय आवास प्रकार जो कि चौकोर आकार तथा जिसके चारों ओर छप्पर से बने होते है, को ‘मोरडियन’ कहा जाता है । इस आवास प्रकार में एक दूसरे से लगे हुए दो से तीन कक्ष होते हैं । तीसरे प्रकार के आवास की छप्पर केवल दो ओर से ही होती है तथा इनमें दो ही कमरे होते है, जो की गौशाला से युक्त अथवा गौशाला रहित हो सकते है , इसे ‘डेंड्लडियन’ के नाम से जाना जाता है ।

गदबा ओडिशा के उन आदिवासी समुदायों में से एक हैं, जिन्हें मुंडारी या कोलरियन भाषा समूह में वर्गीकृत किया गया है। मिशेल के अनुसार गदबा शब्द का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो अपने कंधो पर बोझा ढोने का कार्य करता है । गदबा लोगों को पहाड़ी क्षेत्रों मे पालकी वाहक के रूप में भी जाना जाता है । ऐसा कहा जाता है कि इनके पूर्वज गोदावरी नदी क्षेत्र से नंदपुर में आकार बस गए, जो कि जेपोर के राजा की पूर्व राजधानी थी । गदबाओं की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित है इसके साथ ही वे लघु वनोपजों के संग्रह, शिकार, मछली पकड़ने और मजदूरी संबंधी कार्य भी करते है। महिलाएं कपड़े की लंबी पट्टी पहनती हैं, जिसे आमतौर पर ‘केरांग’ (केरांग के रेशों से तैयार) के रूप में जाना जाता है, जो कमर से बंधी होती है और इसी कपड़े का एक भाग शरीर के ऊपरी हिस्से तक पहना जाता है। बंदापामा परब, दसरा परब, पूशा परब और चैता परब इनके महत्वपूर्ण त्यौहार हैं । गदबा लोग इन त्योहारों को सावधानी पूर्वक, लगन से, भक्ति और भय के साथ मनाते है। गदबा अपने संगीत, नृत्य और पारंपरिक भोजन के शौकीन है । ये ‘ढेम्सा’ नृत्य के लिए प्रसिद्ध हैं जो महिलाओं द्वारा अपनी प्रसिद्ध ‘केरांग’ साड़ी पहन कर किया जाता है, इस दौरान पुरुष संगीत वाद्ययंत्र बजाते हैं । इनके संगीत वाद्ययंत्रों में बड़े ड्रम, ताल मुडीबाजा, मदाल, बांसुरी, तमक और माहुरी शामिल हैं । साल भर मनाए जाने वाले गीतों, नृत्य, संगीत, रीति-रिवाजों और त्योहारों की समृद्ध लोक परंपराओं के माध्यम से प्रतिबिंबित गदबाओ का धार्मिक जीवन उनके अस्तित्व के लिए रंगीन आयाम जोड़ता है।

From the Tribal Habitat Open air exhibition
THE TRADITIONAL DWELLING COMPLEX
OF GADABA TRIBE OF ODISHA

The Gadaba’s are inhabiting on the Mountains of Southern district of Koraput in the State of Odisha. They are also found in the adjoining district of Visakhapatnam (Andhra Pradesh) and Bastar in Chhattisgarh. The hill ranges of this region vary its height from 1000 ft. to 3000 ft. above the sea level. Their villages consist of one or two hamlets and pastures surrounded by forest towards the periphery. A meeting place called Sadar and a village god called Hundi are the two important places in the villages. There are three different house types found among the villages of Gadabas. The first house type called Chhendidien is the most traditional house type having a circular plan with the conical. The second house type called Mordien is having rectangular plan with four slopped roof. The house consist of two to three adjacent rooms. The third type is a two-slopped house called Dendidien having two rooms with or without separate cow shed.

The Gadabas are one of the tribal communities of Odisha classified as speakers of Mundari or Kolarian. According to Mitchell, the word Gadaba signifies a person who carries loads on his shoulders. The Gadabas were also employed as a palanquin bearers in the hills. It is said that their ancestors emigrated from the banks of Godavari River and settled in Nandapur, the former capital of the Raja of Jeypore. The economy of Gadabas is agriculture based which is supplemented by collection of minor forest produce, hunting, fishing and wage earning. The women fold wear long strip of cloth commonly known as Kerang (prepared from Kerang fiber) tied round the waist and a second piece of cloth is worn across the upper portion of the body. The important festivals are Bandapama Parab, Dasara Parab, Pusha Parab and Chaita Parab. Gadabas celebrates this festival with care, sincerity, devotion and fear. Gadaba are fond of dance, music and ethnic food. They are famous for Dhemsha dance which is performed by women wearing their famous Kerang saris, the menfolk play musical instruments while women dance. Their musical instruments consist of big drums, Tal mudibaja, madal, flutes, tamak and mahuri. Gadabas religious life reflected through rich folk traditions of songs, dance, music, rituals and festivals celebrated round the year adds colorful dimensions to their existence.


इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
पारंपरिक गालो आवास

गालो,  अरुणाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण जनजातियों में से एक है, जो राज्य के पश्चिम सियांग जिला में बड़े पैमाने पर केंद्रित है। यह जनजाति तानी जनजाति के पूर्वज-अबोतानी के वंशज है। ये राज्य के अन्य जिलों में भी फैले हुये हैं। 

गालो गाँव अक्सर नदी के समीप स्थित होते हैं और साथ ही ये अपनी बसाहट के लिये पहाड़ियों के किनारे पर काफी ऊँचाई वाले स्थान का चयन करते है। ये उस क्षेत्र को पसंद करते हैं, जहां पानी और खेती योग्य भूमि सुगमता से उपलब्ध हो सके। पारंपरिक गालो आवास एक विशाल संरचना है जो स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्रियों जैसे- लकड़ी, बांस, बेंत और छप्पर में लगाने वाली ताड़ के पत्तों से बनाया जाता है। यह आयताकार और लकड़ी, बांस के सीढ़ीनुमा खंभों पर स्थित है  जिसकी ऊँचाई भूमि की ढाल पर निर्भर करती है। फर्श या समतल सतह बांस की बीम की एक के ऊपर एक स्थित अनेक पंक्तियों की व्यवस्था के बाद निर्मित किया जाता है। समतल तल के नीचे के खंभों में लकड़ी की सुदृढीकरण व वास्तुशिल्प स्थानीय वास्तुकला को विशिष्टिता प्रदान करते है ।

निर्माण से काफी पहले ही कच्चे माल की व्यवस्था कर ली जाती है। जरूरत के अनुसार वृक्ष, बांस और छप्पर छाने के पत्तों को जंगल से पर्याप्त मात्रा में एकत्र और लम्बी अवधि के लिए तैयार संरक्षित कर लिया जाता है । वे चंद्र चक्र गणना की अपनी पारंपरिक विधि के आधार पर निर्माण सामग्री से कार्य प्रारम्भ करते हैं। गालो जनजाति में आवास निर्माण एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से सफल होता है। आवश्यक समग्रियों की पूर्ति मिलजुल कर आपसी सहयोग से की जाती है। निर्माण के दौरान, एक कुशल बुजुर्ग के द्वारा निर्माण कार्य का नेतृत्व किया जाता है। आवास निर्माण पूर्ण होने के बाद, परिवार और वन देवताओं के सम्मान में अनुष्ठान किए जाते हैं।

गालो आवास में परिवार के पुरुष और महिला सदस्यों के लिए स्पष्ट रूप से अलग-अलग स्थान चिन्हित होते हैं। इस पारंपरिक प्रथा को पवित्रता की अवधारणा से जुड़ा माना जाता है। आवास  में महिलाओं एवं पुरुषों हेतु दो अलग-अलग प्रवेश द्वार हैं जिसकी अपनी अलग सीढ़ी और दरवाजें  है । मुख्य हॉल के अंदर दो चिमनियां बहुत ही खास हैं। यह घर में देवताओं व आत्माओं के लिए आरक्षित स्थानों की पवित्रता बनाए रखने के लिए उनके पूर्वजों द्वारा निर्धारित नियमों और पारंपरिक रीति-रिवाजों को संदर्भित करता है। परिवार के मुखिया की बैठने के स्थान के पीछे एक पवित्र स्थान आरक्षित होता है, जहां जबड़े, खोपड़ी और अनेक प्रतीक चिन्ह और शिकार के उपकरण सजाए जाते हैं। महिला सदस्यों के लिए इस पवित्र स्थान में प्रवेश करना वर्जित है। आवास में सबसे कोने का स्थान परिवार के देवता, न्योदे हरे के लिए होता है।

पिछले कुछ दशकों में उनके वास्तुशिल्प रूपों, सदियों पुराने पारंपरिक प्रथाओं में अनेक परिवर्तन हुए हैं। आधुनिक साधनों और जीवन के स्तर ने धीरे-धीरे गालो जीवनशैली के तरीके को एक नई जगह में रूपांतरित करना शुरू कर दिया है।

From the Open Air Exhibition of IGRMS
THE TRADITIONAL GALO HOUSE

The Galo is one of the important tribes, largely concentrated in the West Siang district of Arunachal Pradesh. The tribe is among the descendants of the great ancestor of the Tani tribe – the Abotani. They are also distributed in other districts of the state.

Galo villages are often situated near the river, and the site with considerable height on the spur of hills is generally chosen for habitation. They prefer the area where there is easy access to water and suitable land for cultivation. The traditional Galo house is a massive structure built with locally available materials like wood, bamboo, cane, and palm leaves as thatching material. It is rectangular in plan and stands on stilts of wooden and bamboo poles, the height of which depends on the gradient of an undulating terrain of the land. The floor or plain surface is obtained after the arrangement of several rows of bamboo beams rested one upon the other. The pillars below the plain floor consists of wooden reinforcements that provide a unique appearance in this vernacular architecture.

Arrangement of raw materials is made well in advance before the construction takes place. The required quantity of tree, bamboo, and thatching leaves is adequately collected from the jungle and seasoned for its longevity. They adopt traditional methods of felling construction materials based on their age-old practices of reading the lunar cycle. Construction of a house among the Galo tribe is not an individual affair. It needs a collective effort of the villagers. Material requirements are fulfilled by the mutual co-operation of borrowing and sharing. During the construction, a skillful elder takes the lead to guide the work. After completion of the house, appropriate rituals are conducted to appease the family and forest deities.

The Galo house is well designated into spaces for the male and female members of the family. This traditional practice is believed to be associated with their concept of sanctity and purity. The house has two different entrances approached by staircases and doors separately meant for men and women. The two fireplaces inside the main hall are very special. It determines the rules and traditional customs set by their ancestors to maintain the sanctity of spaces reserved for the deities and spirits in the house. A sacred area is reserved behind the family head’s sitting place where jaws, skulls, and many insignias and hunting tools are decorated. It is taboo for the female members to enter this sacred place. The extreme corner of the sidewall is the abode Nyode Hare, the family deity.

In the last few decades, many changes happened in their architectural forms, age-old traditional practices. Modern means and living standards have gradually started transforming a new space of Galo’s way of life.


जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
वारली आवास
वारली एक जनजाति, जिनकी चित्रकला प्रकृति की गाथा को दर्शाती है।

वारली महराष्ट्र के ठाणे जिले के दहानु, तलसारी, जवाहर, पाल घर और मोखाडा तालुका, नासिक तथा धुले जिले के कुछ भागों में निवासरत तथा गुजरात के वलसाड़ जिले ओर केन्द्र शासित प्रांतों दादर और नगर हवेली तक विस्तृत एक जनजातीय समूह है। वारली शब्द ‘वारूल’ से लिया गया है जिसका अर्थ है भूमि का टुकड़ा। वारली मुख्यतः कृषक है, मछली व मुर्गी पालन उनका द्वितीयक व्यवसाय है।

        वारली प्रथाओं और परम्पराओं का ताना-बाना प्रकृति के इर्द-गिर्द बुना है। वे वन्य जीवन और प्रकृति के प्रति असीम आदर दर्शाते हैं। वारली आवास हमेशा ही वर्गाकार और मिट्टी के आधार युक्त होता है। निर्माण के पूर्व शामन स्थल का चयन और परीक्षण करता है तथा अनिष्टकारी तत्वों को जानने के लिये अनुष्ठान और पूजा करता है। जब वह सकारात्मक संकेत देता है तब निर्माण शुरू होता है। वारली आवास बांस और कारवी की बनी तथा मिट्टी पुती दीवार से बनते हैं। घर का फर्श गाय के गोबर से लिपा होती है। नींव, फर्श और दीवारों में प्रयुक्त प्रमुख सामग्री मिट्टी होती है। आम तौर पर वे छप्पर में ताड़ के पत्ते एवं धान की पुआल का इस्तेमाल करते हें किन्तु बांस पर टीक (सागौन) के पत्तों की परत होती है जिस पर छाजन की जाती है जो घर को गर्मियों में भी ठंडा रखता है और भारी बारिश में भी छत टपकती नहीं है। वारली आवास केवल आश्रय स्थल ही नही बल्कि एक सुरक्षित रहवास का प्रतीक हैं। केन्द्र में लकड़ी का खम्भा सूर्य और धरती के अनंत या चिर कालिक संबंध का संकेत है। ऊपर की तरफ़ भंडारण हेतु एक अटारी (परछत्ती) होती है। प्रमुखतः घर पूर्वोन्मुखी होते है। घर में एक ही दरवाजा, जो कि मुख्य द्वार है, होता है। चूंकि वे अपने पशुओं की उचित देखभाल हेतु उन्हें घर के भीतर ही रखते है अतः एक अतिरिक्त दरवाजा होता है किन्तु कोई खिड़की नहीं होती है।

        बोनी (बुआई) के मौसम में वर्षा के देवता नारान देव, हिमाई देवी तथा घरेलू देवता हिरवा की पूजा की जाती है। फसलों की कटाई के पहले खेतों की देवी ‘सावरी’ तथा अनाज की देवी ‘कंसारी देवी’ की भी पूजा-अर्चना की जाती है। कटाई के मौसम, बाघ देवता/बाघया के प्रति उत्सव और कृतज्ञता का संदेश होता है। हर वारली ग्राम का एक ग्राम देवता होता है। जिसके प्रति मान्यता है कि वह गांव और पशुओं की रक्षा करता है। कुछ चित्रों में मंदिर को भी दर्शाया जाता है। विवाह के समय प्रजनन (उर्वरा) की देवी ‘पालघाट’ की पूजा की जाती है।

        वारली जनजाति अपनी चित्रकला के लिये प्रसि़द्ध है और भारतीय कला में विशेष स्थान रखती हैं। उनकी जीवन शैली, संस्कृति, कृषकीय गतिविधियाँ जैसे बुआई और कटाई, उत्सव वारली चित्रों के रूप में जीवंत रहते हैं। वारली आवास की दीवारें खूबसूरत चित्रों से सजी होती हैं, वारली चित्रों की विषय वस्तु उनका दैनिक जीवन कृषि गतिविधियाँ (प्रत्यारोपण, पहली बारिश, कटाई, निहाई), शिकार दृश्य, गाओरी नृत्य, सृजन के मिथक, पशु-पक्षियों युक्त घास के मैदान, नागपूजा, कंसारी देवी की पूजा महालक्ष्मी पूजा, वट वृक्ष पूजन, उनके द्वारा मनाये जाने वाले विभिन्न पर्व और उत्सव, भांति-भांति के पशु और वनस्पतियाँ, उनके द्वारा बजाये जाने वाले विभिन्न संगीत वाद्ययंत्र होते हैं।

        चित्रांकन वारली समुदाय द्वारा पूजे जाने वाले देव सूर्य और चंद्रमा से युक्त होता है। वैविध्य पूर्ण मनःस्थिति और सोच के साथ सभी कहानियाँ चावल के गाढ़े घोल से बने सफ़ेद रंग से अभिव्यक्त होती है। सभी चित्र लाल गेरू से पुती हुई दीवारों पर बनते हैं। वारली चित्रों में वृत्त, त्रिकोण और वर्ग जैसे विभिन्न ज्यामित्तीय आकार मिलते हैं जिनमें वृत्त सूर्य और चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करते हैं, त्रिकोण पर्वत और वृक्ष के शीर्ष का, वर्गभूमि जमीन के टुकड़े का प्रतिनिधित्व करता है। जहाँ दो त्रिकोण हैं वहां ऊपर वाला धड़ को तथा नीचे वाला शरीर के निचले हिस्से को दर्शाता है। जहां त्रिकोण आपस में मिलते हैं वह बिन्दु ब्रम्हाण्ड के संतुलन का संकेत हैं।

        वारली चित्रों में सर्वाधिक विख्यात और अनूठी ‘चौक’ परिवार की सभी सौभाग्यवती स्त्रियों, जिन्हें सुहासिनी कहते हैं, के द्वारा बनायी जाती है। चौक में उर्वरता की देवी पालघाट देवी अनिवार्यतः होती है। इस कार्य हेतु वैवाहिक अवसरों पर सुहागिन स्त्रियाँ चावल को पीस कर सफ़ेद लेप तैयार करती हैं। दीवार को गाय के गोबर से लीपकर एकसार और चिकना किया जाता है जिस पर गेरू पोता जाता है। गेरू पोतने के उपरांत वर्गाकार ‘चौकट’ बनायी जाती है। चौक के चित्रण के बिना विवाह सम्पन्न नहीं होता। चौक वर और वधु दोनों के ही घरों में बनाया जाता है। चौक के सभी तत्व प्रतीकात्मकता से भरे होते हैं, यह एक बड़े वर्गाकार रूप में आकल्पित होते है तथा गूढ़ प्रतिमानों को विस्तार देते हैं, तथा एक कोने में बारात को दृश्यांकित किया जाता है। पतली पट्टी के साथ त्रिकोण-मंजीरे एक वाद्ययंत्र का प्रतीक है जिस का उपयोग पुजारी द्वारा उर्वरता की देवी को प्रसन्न करने के लिये किया जाता है। एक दूसरा खाका ‘बासिंगा’ शिराभूषण कहलाता है। तस्वीर के भीतर थोड़े-थोड़े अंतराल पर पंक्तिबद्ध त्रिकोण तालवाद्य ‘‘ढाक’’ का प्रतीक है एक अन्य जंजीर नुमा रेखा ‘साकड़ी’ कमरबन्द का प्रतीक है। एक रेखा ‘आखरी’ खजूर की चटाई का प्रतीक है। वर्ग की पट्टियाँ कुमकुम (विवाहित महिलाओं द्वारा मांग में डाला जाने वाला लाल रंग/सिंदूर) का प्रतीक हैं। दो सीधी वर्गाकार आकृतियाँ चादर का प्रतीक हैं जिसे चौक के चित्र बनी दीवार के सम्मुख शादी के दौरान वर-वधु के बैठने के लिये बिछाया जाता है।

        पालघाट की मुख्य आकृति केन्द्र में बाहर की ओर फैले हाथ और पैरों के साथ प्रसव की मुद्रा में अंकित होती है। दोनों कोनों पर सूर्य और चंद्रमा चित्रित किये जाते है। कंघा, सीढ़ी, ताड़पा-बांस का बना वाद्ययंत्र तथा घांगली- एक तंतुवाद्य भी चौक चित्र के केन्द्र में बनाये जाते हैं। ताड़पा और घांगली पवित्र वाद्य माने जाते हैं, कंघा सगाई का प्रतीक है, सीढ़ी घर की अटारी पर रखे खाद्यान्न के साथ वारली लोगों की सम्बद्धता को इंगित करता है। सूर्य, चंद्रमा और पालघाट सर्वोच्च शक्तियाँ माने जाते हैं जिनकी उपस्थिति विवाह के दौरान नवयुगल को प्रजनन के आशीर्वाद हेतु आवश्यक होती है। देव चौक चित्र की तरह ही सुहासिनियाँ देव चौक के बगल में ही एक अन्य चौक लग्न चौक भी बनाती हैं। इस चित्र में एक अलंकृत वर्ग बनाया जाता है। जिसके केन्द्र में सुहासिनियाँ घोड़ा बनाती हैं जिसकी पीठ पर वर-वधु बैठे दृश्यांकित होते है घोड़े के आस-पास नर्तक, संगीत कार (बाजे वाले) और विवाह कराने वाली औरतों का चित्रण किया जाता है।

From the Open Air Exhibition of Tribal Habitat
Warli House
Warli, a tribe whose painting depicts the story of nature

The warli tribe lives in the regions like Dahanu, Talsari, Jawahar, Palghar and Mokhada talukas of Thane district, some parts of Nasik & Dhule districts of Maharashtra, and spread up to Valsad districts of Gujarat and in the union territories of Dadra, Nagar Haveli. The word ‘Warli’ is derived from the word ‘warul’ means ‘Piece of Land’. Warlis are mostly agriculturists. Fishing and poultry farming are their secondary occupation.

The warli customs and traditions are weaved around Mother Nature. They show immense respect towards the nature and wild life. The warli hut consists of a simple earthen foundation and always square in shape. Before construction the Shaman select and examine the place for construction and perform rituals to detect evil elements, then worship. When he gives positive sign, the construction starts. Warli houses are built with plastered mud wall made of Karvi and supple bamboo. The floor of the house is plastered with cow dung. Mud is a major material used for plinth, flooring and grinding. They commonly use palm leaves and paddy straw for thatching which keeps the houses considerably cool during summer, and the roof never leaks in spite of heavy monsoon. Warli houses are not just a shelter but a symbol of protective living. A central wooden pillar symbolizes the eternal connection of the sun and the earth. It is also associated with a belief in the formation of a family. On the top there is an attic used for storage purposes. The orientation of the house is preferably made east facing. There is only one door which serves as the main door for entrance. As they keep animals inside the house for good care, there is an additional door, but there is no window.

During the sowing season God of rains ‘Naran Dev’, ‘Himai Devi’ and ‘Hirva’ the domestic gods are worshipped. Before harvesting, the goddess of fields ‘Savari’ and the goddess of Corn known as Kansari Devi are also offered prayers and worshipped. The reaping season calls for celebration and glorification of the tiger god (Vaghadev/Waghya). Every warli village has a village god who believed to be the god who protects their cattle and the village. In some paintings the shrine of the god is shown. At the time of marriage “Palaghata” the goddess of fertility is worshipped.

The warli tribe is famous for their painting and holds a special place in Indian art. Their lifestyle, culture, agricultural activities like sowing and reaping and celebrations are kept alive in the form of warli painting. The walls of the warli houses (huts) are embellished with the beautiful painting. Different activities related to their everyday life, agricultural activities (transplanting, first rain, harvesting, threshing), hunting scenes, preparing drinks from toddy, wedding ceremony, different dance forms like Dhuma dance, Kambdi dance, Gauri dance, Tarpa and Dhol dance are some of the dance forms that flaunt their tradition, creation myth, grassland with creatures, cobra worship, worship of goddess Kansari, worship of goddess Maha Laxmi, worship of Banyan trees, different celebrations which they observe, different kind of flora and fauna around them, different kind of musical instruments played by them are the themes depicted in warli painting.

The painting consists of the Sun and Moon who are the deities worshipped by the warli Communities. With its various moods and views, all their stories are expressed with the white colour made of rice paste. All paintings are painted on the red mud walls. Different geometrical motifs like the circle, triangle and square are found in warli painting where the circle represent the Sun and Moon; triangle represents the hills and tree tops, square as the piece of land where two triangles found the upper part shows the torso and lower part stands for the lower body. Where the triangles meet together at a point symbolize the balance of the universe.

Most famous and unique form a warli painting is the chouk: all the married women of the family called Suhasinis make the chouk painting, essentially consists of ‘Palgahat Devi’- the Goddess of fertility. On the occasions of marriage the married women prepare the white paste for this purpose by grinding the rice. The wall is made fine and smooth with cow dung over which geru (red mud) is smeared. After smearing ‘Chaukat’ the square is made. Without the painting, the wedding cannot occur. The chouk is executed in both houses of the bride and groom. All the elements in the chouk are replete with symbolisms. These are designed around large ornate Squares with elaborate concentric patterns & the grooms’ procession is depicted in a corner. The strip consists of triangles that symbolize cymbals, a musical instrument by the Shaman (priest) to please the goddess of fertility. The other frame is known as “Basinga” – a head decoration. Inside the painting, a row of triangles are drawn with small gaps symbolizing drums called “Dhaks”, another chain like lines symbolizes “Sakli”, a waist band. One line represents the “Aakhri”, a date palm leaf mat. The strip of squares representing the containers of Kunku (red powder/vermillion used to put in the hair parting of married women), the two straight square lines represent the bed sheet, which is kept in front of the chouk wall for the bride and groom to seat during the wedding ceremony. The main figure of Palaghat is drawn in the center, in the both corners, the figure of Moon, Sun are painted. Comb, Ladders, Tarpa – a bamboo made musical instrument and Ghangli – a string instrument are also painted in the centre of the chouk painting. The Tarpa and Ghangli are considered sacred; the comb is a symbol of engagement where the ladder connects the link of warlis with food grains stored on the house loft. The Sun and the Moon and Palaghat are believed to be the most supreme forces, who’s presence are required during the wedding ceremonies, to bless the new couple to be fertile. Like the painting Dev chouk, the Suhasinis also draw another chouk painting known as lagna chouk, towards the side of the main Dev chouk. In this painting a decorative square is drawn where in the center the Suhasinis draw a horse on which the bride and groom are shown sitting. Around the horse the dancers, musicians and women who perform the wedding are also drawn.

Introductory video on the Open Air Exhibition of Tribal Habitat : Warli HouseWarli, a tribe whose painting depicts the story of nature

जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
रहांकी: मराम नागा जनजाति का युवा गृह

From the Tribal Habitat open air exhibition
Rahanki : the Boy’s Dormitory of the Maram Naga Tribe

The Tribe

The Maram Naga is largely distributed in the Senapati District of Manipur. According to the 2001 census their population in the state was 37340 (Manorama Yearbook 2012). Out of the many villages inhabited by the Maram tribe, the Willong Khullen village is considered to be the second-largest village. Traditionally, each village was ruled by their respective chieftains and the post of a village chief was purely hereditary and is chosen by the rule of primogeniture i.e. the eldest son successively inherits the post of the father. In the olden days, taxes were levied to the revered chief in the form of Mpak Pai (shawl), paddy, etc. but these systems are no more in practice today. Thus the present-day chief is just a nominal head of the village but the village council/ elders decide whom to give tax. However, as a traditional chief, he still holds authority over religious rights and it is under his permission that the traditional religious observances are commenced.

Willong Khullen Village

The Willong Khullen village is approximately 116 northwest of Imphal and it is reached via NH 39 turning to the west from the Maram Khullen Lamkhai (Junction). The Barak River meanders the route on its northwesterly and provides a breathtaking view of its scenic river basin. The village is located spur of a hill giving an enchanting view of the village from a distance. It is said that the name of the village is derived from an indigenous flowering tree called Maguilongi which were abundantly available on the hill slopes around the village. Later, it became connoted with a corrupt word as Uilong or Willong. The village is well known for its large assemblage of more than a hundred megalithic monuments in the village land. It serves as an important center for traditional sport, and also links with the institutional practices of the boy’s dormitory.

The Dormitories

Maram villages used to have dormitories separately for the boys and girls. In these dormitories, boys and girls spend a certain period of their lives, after attaining puberty, learning ethics and the lessons of life from informal teachers or the in-charge of the respective dormitories. The dormitories are learning centers for both the boys and girls who voluntarily participate and give service to the various social, religious, and economic activities of the village. Traditionally, boys are skillfully trained to become vigilant and watchful for protecting the village from enemy attacks or raids.

Rahanki- the Boy’s Dormitory

Rahanki is the boy’s dormitory and a Maram Naga village may have one or more dormitories depending upon the size and population of the village. A married man with family is appointed as caretaker of the boy’s dormitory. No women except the wife of the caretaker are allowed to enter the boys’ dormitory. If such rules are breached, a heavy fine is imposed. The distinguishable feature of Rahanki is the presence of a triangular frieze of the front gable that reaches the ground. It is painted with black and white geometric motif that comes into the first sight of the house. The two massive structures hewed out of the single tree as the gable is uniquely twined with jungle vine and locked by a decorative piece of wooden motif representing the beak of a hornbill. Another feature is the presence of two entrance doors, one meant for the caretaker and his family, while the other is exclusively used by the boys who live in the dormitory. In a family, after the birth of a child, until he/she attains three years; the family has to offer wine (rice beer) to the respective clan of that particular Rahanki, on two occasions i.e. Lamsham (road cleaning day) and Rakak (observance for the dead). It was performed to give gratitude to the elders and seeking blessings for the baby. Once the child grew up, boys of the same age will from their parents. Boys will be taught benevolent service for the society.

Division of space in the dormitory

The dormitory has a big hall inside with a central fireplace. The rear extension of the hall separated by a wall is devoted to the Caretaker, his wife, and small children. A space to the side of the right side wall is reserved as the sleeping place for the boys. Traditionally, a huge Bedstead of big trees with wheels is installed in this space as a symbol of pride and valor. The space along the left side of the wall is a pounding place. It has a front verandah where craftwork is employed to the members in their leisure hours.

Carved Motifs and their meanings

The front wall décor of wooden panels are filled with details of carvings having elaborate meanings. The main pillar which is supported by two identical sub-ordinate pillars has carved on high relief with colorful paintings on it. Besides, the massive vertical planks used as filling elements of the front wall also bear engraved motifs with elaborate meanings.

Symbol of warriors on the pillars

The main pillar is called Shingdhi while the other two supporting pillars are called Shingpah. The central space of these three pillars displays three motifs of warriors in their traditional attire and headgears holding their weapons, insignias, and human head and shield in their hands. They are shown standing above the Mithun head, symbolizing victory over warfare, bravery status, and achievement of the warriors.

Chinka Ki & Abuika Peak (Head of the Pillar)

The top portions of the pillars have the representation of human-head motif called Chinka Ki. It is followed by the symbolic presentation of a pair of Mithun’s horns called Abuika Peak which is traditionally used for drinking wine for joy in their festive mood. A projected motif in between these two symbols represents the beak of a hornbill (Kok tzii Mui) which is regarded as the symbol of valour among the Naga tribe.

Kadat (Decorative Horizontal Plank)

On the top of the entrance door and in between the main pillar (Chingdi) and two sub-ordinate pillars (Chingpa), horizontal planks are bridged with intricate carvings of the human head. It is called Kadat in their language. It expresses their spirit of unity and bravery to stand ready for warfare with enemies and bring their heads in the feuds.

Kahang (An indication of the rule of Rahanki)

Above the horizontal plank (Kahang), the motif of a Kahang (wild deer) is carved. It signifies that any wild animal hunted from the forest is dedicated to the male of his clan in the Rahanki. This head meat is permitted to be eaten by the males only. The meat is cooked in a particular clan’s pot and hangs from the attic of the Rahanki. It is taboo for the girls to touch these pots. In a group hunting game, apart from the hunter, one who touches the animal first is entitled to slain the animal, the head will be taken to his respective Rahanki.

Bamrak (Seat of the protective spirits)

All these three pillars endorse a common motif called Bamrak, a geometrical structure, metaphorically represented to be the thorax and legs of the pillar. It symbolizes their traditional resting/ meeting place called Sakyii Nat. On the hilly terrain, the Maram Naga tribe used to construct resting places by erecting stones on the hilltop. It is used by them as the resting place in their long journey. It is also believed that Sakyii Nat has watchful eyes of their ancestral spirit who protect them from any kind of unwanted incidences. This motif on the pillar is regarded as the seat of the protective spirit who safeguards their house from the evil forces.

Engraved figures on the planks Maga Kafii Shing (Trophies of achievements and rule of punishment)

It is a vertical panel consisting of four symbolic motifs. The lower portion of this panel is represented by a symbol of the star with seven spikes in a circle. It is called Sang Gai Thi, and deeply associated with the customary laws of punishment. Any crime of a person is punished within the prescribed seven laws of the tribe. The others are the trophies a person can achieve with his skillful act of warfare.

The prize of hunting ability and the rule of adornment in the dormitory

This panel also has four motifs signifying the rule of what is to be adorned in the dormitory. The symbol of deer specifies the rule of bringing the head of a hunted animal. Below this, a hand of the land-lady of Rahanki is shown serving wine. It is an indication of the prize for successful hunting. The third motif shows a person holding a bowl. It relates to the wealth of a person who hunted wild boar. The last motif of the panel indicates the symbol of a wild boar. The one who has hunted wild boar must decorate the head in the dormitory as an inscription of his hunting ability.

The figure of a male instructor

The figure of a male instructor is portrayed with his attire and belonging. He is regarded as the moral instructor that could inspire the dormitory members to know about the way of adorning pride possessions and achievements.

The figure of a Lady with her carrying basket

A lady carrying a scepter on one hand and a basket with a container behind are shown to exhibit the beauty of Maram lady in her traditional attire and ornaments.

Sangaiti & Sakii (Symbol of Sun, Moon and Constellation)

The heavenly symbols of Sun and Moon and Constellation on either side of the wall reveals their traditional wisdom of calculating the appropriate time of agricultural activities and celebration of festivals.

Rahanki mirrors the past traditions and values of the Maram Naga tribe. Although this traditional institution of the past legacies still exists among the tribe, it started gradually transforming to tune with the modern livelihood.

Introductory video on the Tribal Habitat open air exhibition– Rahanki : the Boy’s Dormitory of the Maram Naga Tribe

जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
पुरिल्लू: आंध्र प्रदेश की जतापू जनजाति का पारंपरिक आवास प्रकार

जतापू जनजाति आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के पूर्वी घाटी क्षेत्र के पहाड़ी एवं समतल भूभागों पर निवास करती है | जतापू समुदाय खोंड जनजाति का ही रूप है जो पहाड़ी क्षेत्रों में कोंद एवं समतल में तेलुगु भाषा बोलते  हैं | उन्हें खोंड एवं समंथुलू भी कहा जाता है | तेलुगु में समंथुलू का अर्थ जागीदार से होता है | उनकी मातृभाषा “कुवि” है जो द्रविड़ भाषा परिवार से सम्बद्ध है | जतापू समुदाय में शुभ कार्यों हेतु समय निश्चित करने वाला व्यक्ति “दिसारी ” कहलाता है | उसे ‘मुहुर्थागादु’  अथवा ‘चुक्का मुहुर्थागादु’ के नांम से भी जाना जाता है | कोई भी शुभ कार्य जैसे गृह निर्माण, विवाह इत्यादि से पहले शुभ मुहूर्त हेतु उनसे परामर्श लिया जाता है | वह उत्सव मनाने एवं देवी देवताओं के पूजन हेतु भी शुभ दिन एवं शुभ मुहूर्त निश्चित करता हैं |

       जतापू भौतिक संस्कृति बहुत ही सम्पन्न है, विशेषतः उनके पारंपरिक आवास प्रकार-  छप्पर निर्मित आयताकार आवास पुरिल्लू बहुत रोचक हैं | यह आवास मुख्यतः तीन भागों – मुख्य हॉल मध्य भाग (इन्लिस), अग्र भाग (गद्पा) एवं पश्च भाग रसोईघर (वेंतागडी) से मिलकर बना है | घर का मध्य भाग काफी महत्त्व रखता है क्योंकि इसी में बहुमूल्य वस्तुएं जैसे अनाज, वस्त्र, रुपया, जेवरात इत्यादि संग्रह किया जाता है | मध्य भाग में एक अतिरिक्त स्थान (मचान) भण्डारण इत्यादि के लिए होता है बांस से निर्मित ये स्थान ‘अटूकू’ कहलाता है | मध्य भाग में पारंपरिक अनाज कुटाई हेतु सतह में ओखलीनुमा छिद्र भी तैयार किया जाता है | जतापू समुदाय में आवास का मध्य भाग विशेषतः पारम्परिक अनाज कुटाई का यह स्थान काफी पवित्र माना जाता है और विवाह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | अधिकतर जतापू परिवार में उनके विवाहित पुत्रों हेतु बगल में अतिरिक्त कमरों के बनवाने का प्रचलन है |

       इन घरों को चार दिवारी (इलुगु) द्वारा सुरक्षा प्रदान की जाती है एवं इनका निर्माण मुख्यतः मिटटी अथवा मिटटी/पत्थर अथवा मिटटी ईंट की सहायता से किया जाता है | छत का निर्माण बॉस के बने ढांचे एवं क्षेत्रीय सूखी घास (डब्बा गड्डी) जो कि ढांचे के ऊपर फैलाई जाती है, से किया जाता है | इसके नीचे बीच में दो लम्बे खम्बे जबकि एक एक खम्बा किनारों पर उसे ढलुआ आकृति प्रदान करने हेतु लगे होते है | एक मजबूत काष्ठ बीम बीच के दो खम्बो पर क्षैतिज रखी होती है जबकि किनारों वाले खम्बो से मध्यथता करते काष्ठ के कई खम्बे संयोजित किये जाते हैं | निचली एवं ढलायु छत होने से ठंडी एवं गर्म हवा अन्दर प्रवेश नहीं कर पाती एवं घास की मोटी परत ठण्ड में गर्मी एवं गर्मी में ठण्डकता प्रदान करती है | ये हमेशा अपने घर मुख्य ग्राम से एक या दो किमी दूर जंगल/ जलस्थान अथवा खेतों तथा गावों के बीच स्थापित करते हैं जिससे उन्हें खेती में आसानी होती है | इन आवास प्रकारों का पर्यावरण से गहरा सम्बन्ध होता है जो अन्य समाजों को भी इसकी विविध सांस्कृतिक दस्तूरों की वजह से प्रभावित करता है | विजयनगरम जिले के सुलुरु मण्डल में  जतापुओं के घर पंक्तिबद्ध हैं| समान्यतः इस क्षेत्र के जनजातीय गाँवों में सजातीय लोग निवास करते है | एक दूसरे के सहयोग से बनाये इन घरों को ये कभी अपनी संपत्ति नहीं समझते | प्रत्येक तीन- चार वर्ष में ये इन घरों की छत एवं घास बदलते हैं | इन्हें अपने घरों के अगले एवं पिछले भाग में बागवानी करने का भी शौक होता है | आगे के भाग में मुख्यतः ये फूलों की प्रजातियाँ जैसे गुलाली, मंडरा, कनाकमबोरम, बंथी इत्यादि रोपते है तो पिछले भाग में फलों जैसे आम, कटहल इत्यादि के साथ कुछ सब्जियां जैसे सफ़ेद एवं जंगली कद्दू लगाना पसंद करते है |

       सौन्दर्य की दृष्टि से भी ये अपने घरों को हमेशा साफ-सुथरा रखते हैं | गोबर(एवुपेडा) की लिपाई कर काले एवं लाल रंग की पट्टिकाओं से अपने घरों को सुन्दर रूप प्रदान करते हैं | उन्हें साफ-सफाई का भी अत्यंत ध्यान रहता है इस हेतु ये अपने घरों से 20-25 मीटर दूरी पर गड्डा खोदते है जहाँ प्रतिदिन का कचरा इकठ्ठा कर प्रत्येक छ : महीने अथवा आसपास के समय में इसे डिकंपोज्ड कर खाद तैयार करते हैं | प्राप्त खाद का उपयोग वह अपनी शुष्क अथवा गीली खेती में करते हैं जो उनके  द्वारा एक उत्कृष्ट उदहारण है | वे गोशालाओं को या तो घरों के पास या थोड़ी दूरी पर बनाते हैं| उनका चूल्हा दो या तीन भागों में विकसित होता है ताकि एक समय पर कई भोजन तैयार किये जा सकें | जंगल से लाये सुखी लकड़ियों को ये टुकड़ो में काटने के बजाये सीधे ही चूल्हे में लगाना पसंद करते हैं | जतापू घर केवल आराम प्रदान करने के लिए ही नहीं अपितु ये विविध सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भी महत्वपूर्ण भूमिका निभते हैं | वर्ष 2011 के जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 1,26,659 है |

From Tribal Habitat open air exhibition
Purillu: Traditional Jatapu

Tribal House type of Andhra Pradesh

The Jatapu tribe resides in the hilly terrain and foot hills of the viziangaram district of the Eastern ghats region in Andhra Pradesh. The Jatapu community is a section of the Khonds, who speak kond on the hills and teluges in the plains. They have various synonyms like khond and Samanthulu. In Telegu, samanthulu means feudatories. Their mother tongue is “Kuvi” belonging to the Dravidian family of languages.     Among the Jatapus, the person who fixes auspicious times is called the Disari. He is also known as “Muhoorthagadu or Chukka Muhoorthagadu. He is consulted to fix up the time (Muhoorthamis) before undertaking any important work such as construction of houses, marriage alliances etc. He also fixes the time and day for the celebration of festivals and workship of deities.

            The Jatapu material culture is very rich, particularly their traditional house type is very interesting i.e. purilllu is a thatched house having rectangular type. The house mainly consists of three portions i.e. main hall, central portion of the house (Inilles) front portion of the house is (Gadapa) back portion of the house is kitchen(Vantagadi). The central portion of the house got prime importance for keeping all valuable things including food grains, cloths, cash, jewellery etc. The central hall also serves as an extras ceiling, for storage keeping facility that is called “Atuku” is completely made of bamboos and also having a provision for pounding hole on the surface of the floor for pounding flour of their traditional food grains. Among the Jatapus the central hall particularly pounding hole (Rotigunta) plays a pivotal role in dealing with marriage fixations winds is a very auspicious spot of the Jatapus. Majority of the Jatapus houses have an extra side hall particularly in the extended families for the purpose of their married son.

            The entire house has fencing (Elugu) for the protection of the house. The construction of the materials of the house is generally built with either mud alone or mud and stone or mud and brick or mud and wattle. The roof is covered with a thick bamboo frame and the dried local grass called ‘Dabbagaddi’ is systematically spread on that frame. They erect two long poles in the centre and shorter one in the corner to get sloping on both sides. Another strong wooden beam is horizontally placed over the two central poles (Vennupatti) on the central horizontal beam several wooden poles placed connecting the corner poles. The low roofs also prevent cold waves and heat waves from directly entering the house. the thick grass roof keeps the house warm in winter and cool in summer season. They always build their dwelling one or two kilometers away from the main villages, with either forests or streams or fields inter posed between the main village which help in easy access to podu cultivation in bringing fire wood and collection of roots and tubers etc. The dwelling styles have some relation to the environment and at the sametime different societies may react in different ways in the same situation due to diverse cultural practices. The housing pattern of Jatapu of Saluru mandal in Viziangaram district of the linear type. Generally, the tribal villages in their region are exclusively inhabited by a single tribe, the Jatapus never treated house as a property their house is very simple easy to be built with the cooperation of their relatives. Every three to four years they change their roof and rethatched the grass. Jatapus are very fond of raising horticultural plants both front and backyward of their houses. In front yard usually they plant flowering spices i.e. Gulali, Mandara, Kanakamboram, Banthi etc. In back yard they raise fruit bearing species i.e. mango, jackfruit, citras, Jeelugu (Caryota) and apart from few vegetables including white pumpkin and wild pumpkin.

                        With an aesthetic sense the Jatapus keep their homes neat and clean, plaster the floor with cow dung (Avupeda) and decorate the home with black and red borders of earthen colours. They have good sense of hygiene a pit (Penta) with the radius of 3 meters and depth of 3-4 meters about 20-25 meters away from the home. They collect every day waste and dumped into then pit, every six months or some times once in a year, the waste decomposed and converted into compost. They use manure for their dry and wet land cultivation, which is an excellent indigenous practice among the Jatapus, the cattle sheds are constructed either adjacent to the dwelling houses or a little apart form them the hearth is divided into two or three parts to enable them to cook two or three items at a time. The fire wood of the dried three branches brought from the forest are not cut into small pieces, but are placed into the hearth straight away. The Jatapu house not only provides a merely resting place, it offers, facilitates and fulfils a variety of social, cultural and economic needs among the Jatapu. Their population of 1,26,659 according to (2011 census).

Introductory video on Tribal Habitat open air exhibition Purillu: Traditional JatapuTribal House type of Andhra Pradesh

जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
पश्चिम बंगाल, बांकुरा से भूमिज का एक पारंपरिक घर

भूमिज मुख्यतः पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, असम और त्रिपुरा में वितरित सबसे बड़े जनजातीय समुदायों में से एक है। व्युत्पत्ति के अनुसार, भूमिज शब्द ‘भू’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है ‘पृथ्वी’, वे स्वयं को धरती का पुत्र कहते हैं। पश्चिम बंगाल में वे बांकुरा, पुरूलिया, मिदनापुर और 24 परगना जिलों में केन्द्रित हैं, वे भूमिज भाषी हैं, लेकिन उनकी मातृभाषा पूरी तरह से बंगाली से प्रभावित है। उनका मुख्य व्यवसाय कृषि है और मछली पकड़ने तथा शिकार उनके द्वितीयक व सहायक व्यवसाय हैं। ये लोग वन आच्छादित क्षेत्रों या बीहड़ों में रहना पसंद करते हैं।

एक खास भूमिज घर की अधोसंरचना आयताकार होती है जोकि भीतर से ठंडा रखने के लिये मिट्टी की मोटी परतों वाली दीवार पर खड़ी होती है। घर की संरचना मुख्य रूप से दो मंजिला हैं, जो चार ढलानों वाली छत पर ताड़ की लकड़ी और मोटे बांस के फ्रेम से बना है। मकान का आधार जमीन से डेढ फुट ऊंचा है। घर के ऊपरी ढांचे को लकड़ी के तख्तों से बनाया जाता है, जो बीम के आर-पार समान्तर है, जिससे ऊपरी कक्ष के फर्श को मजबूत किया जा सके। घर में एक खुला प्रांगण है, जिसे उठान कहा जाता है जो मिट्टी की मोटी मगर कम ऊंचाई की उठी हुई चार दीवारी से घिरा हुआ है। चार दीवारी के ऊपरी हिससे को बारिश व सूरज के प्रत्यक्ष प्रदर्शन को रोकने के लिये दोनों तरफ से छप्पर से ढक दिया गया है। इसमें पूर्व की ओर मुख करके सदर नामक एक प्रवेश द्वार है। घर में दो कमरे हैं, एक जमीन पर एवं दूसरा उसके ऊपर। ऊपर वाले कमरे के लिये मिट्टी से निर्मित सीढियां हैं। इसमें घर के सामने एक छोटा ढका हुआ बरामदा है जिसे कभी-कभी रसोई के रूप में भी उपयोग किया जाता है। रसोई को रान्नाघर के रूप में जानते हैं, जबकि वे ज्यादातर स्थायी रूप से आंगन में स्थित रसोई का उपयोग करते हैं। मवेशी शेड जो गौशाला/गोयालघर नाम से जाने जाते एवं अन्न भंडार जो स्थानीय रूप से मराई के रूप में जाने जाते हैं, तथा धान कटाई के लिये शेड, ढेंकी शल मकान के अंदर स्थित हैं। मवेशी शेड, गोआलघर में मिट्टी के कुछ बड़े टीले गाय को चारा देने का पात्र होता हैं, जिसे सामान्यतः जमीन की सतह पर थोड़ा गड़ाया जाता है। मवेशी शेड के पास शीर्ष पर एक गोलाकार छप्पर के साथ मुडे़ हुये पुआल की रस्सियों से बना एक अन्न भंडार (मराई) है, जिसमें एक परिवार के लिये एक फ़सल से दूसरी फ़सल तक पर्याप्त मात्रा में धान रखते हैं। भूमिज अपने घर को सुंदरता की दृष्टि से साफ़-सुथरा रखते हैं। वे दीवारों पर मिट्टी, गोबर व धान की भूसी से प्लास्टर करते हैं और उस पर सफेद चिकनी मिट्टी लगाते हैं। वे अपने घरों को लाल एवं पीली मिट्टी के रंगों और पुआल को जलाकर तैयार किये गये काले रंगों के बॉर्डर से सजाते हैं।

तुुलसी मंच, पवित्र तुलसी का पौधा बांकुरा जिले के अधिकांश भूमिज घरों में लगा हुआ पाया जाता है। भूमिज अपने घरों को पूर्व की ओर रखते हैं क्योंकि सूर्य उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यह उनके लिये अनिवार्य है। वे सूर्यों को मनुष्यों के फ़सल के दाता के रूप में सम्मान करते हैं और मौसमी बदलाव उनके कृषि भाग्य को प्रभावित करते हैं। यह पूरा होने के बाद, देवताओं की कृपा के लिये अनुष्ठान करते हैं। भूमिज अपने कुछ पारंपरिक देवताओं की पूजा करते है।

वे साल के पेड़ की भी पूजा करते हैं जिसका इनके जीवन में काफी महत्व है। भूमिज सिंग बोंगा, धर्म देवता एवं ग्राम देवता की पूजा करते है किन्तु कोई मंदिर नहीं बनाते है।

सारना एक पुनीत वन है जो साल जैसे विशु़द्ध जंगल के पेड़ों से बना है। करम एवं सरहुल भूमिज लोगों के मुख्य त्यौहार हैं। भूमिज प्रकृति के करीब होने के कारण चैत्र मास मे सरहुल के त्यौहार पर साल के पेड़ों की मुख्यतः बीज बोने के उपरांत अच्छी फ़सल उपहार की कामना से करते हैं। करम त्यौहार भादो माह (सितम्बर के पहले पक्ष) में मनाया जाता है। करम एक बहुत लोकप्रिय त्यौहार है जिसे शक्ति, यौवन एवं बच्चों की खुशियों के देवता करम देवता की पूजा करने हेतु मनाया जाता है। भूमिज लोग नृत्य एवं गीत के बहुत शौकीन है। बंदनाः एक दूसरा त्यौहार है जो गाय को पूजने हेतु कार्तिक माह में मनाया जाता है।

From the Open Air Exhibition of Tribal Habitat
KOTHA GHAR, A TRADITONAL HOUSE OF BHUMIJ TRIBE  from BANKURA District, WEST BENGAL

Bhumij are one of the largest tribal communities primarily distributed in West Bengal, Jharkhand, Odisha, Assam and Tripura. Etymologically, the term Bhumij is derived from the word ‘Bhu’ means ‘earth’.They call themselves the son of earth. In West Bengal they are concentrated in the districts of Bankura, Purulia, Midnapur and 24 Paragana. They speak Bhumij, but their mother tongue has been fully influenced by Bengali. Their main occupation is agriculture supplemented by fishing and hunting as their secondary occupation. They prefer to live in the rugged terrains of clad forested areas.

A typical Bhumij house is rectangular in ground plan, erected by layers of thick mud wall to keep the interior cool. The house presented here is a double storied house thatched on four slopped roof made with rafters of palm wood and thick bamboo frame, the Bhumij houses are one or two storied in structure. The plinth of the house is 1 and half ft high above the ground. The upper plan of the house is supported by wooden planks running horizontally across the beams to strengthen the ascribed floor of the room lying upper side. The house has an open court called Uthan, encircled by a low height boundary wall raised with thick mud. The upper portion of the boundary wall is covered with two-sided thatch in order to prevent the direct exposition of rain and scorchy sun. It has an entrance called Sadar facing towards the east. The house has two rooms one at the ground and the other one at the top: The room at the top is approached by a staircase raised with mud. It has a small covered veranda in front of the house which sometimes served as kitchen also. The kitchen is known as Rannaghar while in most of the cases they permanently use a kitchen that lie to the courtyard. The cattle shed is known as goshala/goalghar and the granary locally known as Marai, the pounding shed known as Dhenki shal are located inside the enclosure of the homestead. The cattle shed (goalghar) has some large earthen feeding mounds of clay generally placed by struck on the ground. Near the cattle shed the granary (Marai) made entirely of ropes of twisted straw with a circular thatch on the top. This can contain a quantity of paddy sufficient for one family from one harvest to another. The Bhumij keep their house neat and clean with an aesthetic sense. They plaster the walls with clay, cow dung and paddy husks, glazing it over with white clay. They decorate their houses with red, yellow earthen colours and black borders with the help of burnt straws.

Tulsi Mancha, in which a sacred plant Tulsi planted, is found in most of the Bhumij houses in Bankura. It is obligatory for the Bhumij that they orient their houses towards east because Sun occupies a significant role in their life. They revere Sun as the giver of harvest to man and the seasonal changes affecting their agricultural fortune. After completion, rituals are performed to examine the grace of deities. Bhumij propitiate some of their traditional deities.

Bhumij worship Sing Bonga, Dharam Devta, Gram Devta but do not build temples. They worship sal tree which has a great importance in their life. Sarna is a sacred groove invariably composed of purely jungle trees such as Sal. Karam and Sarhul are the main festivals of the Bhumij community. Sarhul is celebrated in the month of Chaitra to worship the Sal tree (March/April) preliminary for commencement of agricultural operation when the seeds are sown with a hope that mother earth will gift them a bountiful harvest. Karam is celebrated in the month of Bhadra (1st half of September). Karam is the famous festival which seems to be very popular and celebrated to worship Karam Devta the god of power, youthfulness and happiness of their children. They are very much fond of dance and music. Bandna is another festival which is celebrated in the month of Kartika when the cattle are worshiped.


उत्तर पूर्वी भारत पर
जनजातीय आवास, मुक्ताकाश प्रदर्शनी से

नेकमोंग
मेघालय की गारो जनजाति का पारंपरिक आवास

गारो जनजाति मेघालय की तीन मूल जनजातियों में से एक है। वे असम, त्रिपुरा, नागालैंड और बांग्लादेश के कुछ क्षेत्रों में भी छिटपुट रूप से बसते हैं। गारो नाम उन्हें उन पड़ोसी लोगों द्वारा दिया गया है, जो गारो नहीं हैं। मातृवंशीय परंपरा के लिए प्रसिद्ध गारो परिवारों के वंशज अपनी माता के बंश नाम से जाने जाते हैं। परंपरागत रूप से, सबसे छोटी बेटी (नोकमेचिक) को मां की संपत्ति विरासत में मिलती है। बेटे युवावस्था में माता-पिता का घर छोड़ देते हैं और गांव के छात्रावास (नोकपंते) में प्रशिक्षित होते हैं। शादी के बाद पति पत्नी के घर पर रहता है। गारो अब मेघालय राज्य की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है और राज्य की कुल आबादी में एक तिहाई गारो शामिल है।

जब हम गारो गांवों के आवास और उनके बंदोबस्त को देखते हैं, तो पहाड़ी ढलानों पर छितरे हुए आवास दिखते हैं, जो बांस और लकड़ी की संरचनाओं वाले खम्बो पर बने हुए होते हैं । इन घरो पर स्थानीय घास से छाजन कर सुव्यवस्थि तरीके से छप्पर डाला जाता है। परंपरागत रूप से, मेघालय की गारो जनजाति के बीच चार प्रकार की स्थानीय वास्तुकला देखी जा सकती है। इन घरों को, लोगों के आजीविका के स्वरूप एवं सामाजिक-आर्थिक जिम्मेदारियों के अनुसार वर्गीकृत किया गया है। ये पारंपरिक बांस-प्रधान घर संरचनाएं हैं; 1) नोकमोंग (एक आम रहने का घर), 2) नोकपंते (लड़कों का छात्रावास), और बोरंग (फील्ड हाउस/ट्रीहाउस/ वॉचटावर)। घर आम तौर पर लकड़ी, बांस, बेंत और फूस जैसी प्राकृतिक रूप से उपलब्ध निर्माण सामग्री के उपयोग से बनाये जाते हैं।

’नोकमोंग’ एक ऐसा घर है जहां परिवार के सभी सदस्य एक साथ रहते हैं। घर में सोने की जगह, चूल्हा, रसोई, पानी की भंडारण व्यवस्था, फर्मेन्टिंग शराब, मवेशियों के लिये शेड, गायों के लिये भूंसा, सुअर, मुर्गी पालन इत्यादि के साथ जलाऊ लकड़ी के लिए बाड़े का प्रावधान भी होता है। घरों का सुन्दर और सुव्यवस्थित होना ही वह वजह है जिससे गारो मातृवंशीय परिवार घरेलू गतिविधियों में अच्छी तरह से संगठित प्रतीत होता है। घर आम तौर पर पहाड़ी ढलान की समतल जमीन पर बांस एवं लकड़ी के उपयोग से विशिष्ट आकार और सुन्दर संरचनाओं का निर्माण कर बनाया जाता है। इस बांस के चबूतरे का ऊपरी भाग पर्याप्त रूप से आपस में गुंथे हुए बांस के फर्श से ढका हुआ होता है जो रहने की जगह के रूप में उपयोग किया जाता है। फर्श के तीन भाग हैं, दो बगल में जबकि एक पीछे के छोर पर है। बाएं भाग का उपयोग कई गतिविधियों के लिए किया जाता है जैसे फुरसत के क्षणों को बिताने, टोकरियाँ तैयार करने, कटे हुए कंद, मीट, मिर्च आदि को सुखाना। दायाँ भाग मुख्य रूप से बर्तन, कपड़े धोने और अन्य सहायक घरेलू गतिविधियों के लिए है।

घर के सामने की जगह जमीन से लगी हुई (बाड़े नुमा) होती है, और यह पालतू जानवरों के लिये होती है। परंपरागत रूप से, सुअर, गाय या बैल की सबसे मूल्यवान नस्ल को परिवार की संपत्ति के रूप में इस बाड़े में सुरक्षित रखा जाता है। जमीन पर लंबवत रूप से टिका हुआ लगभग डेढ़ फीट का एक विशाल गोलाकार लकड़ी का लट्ठा घर के प्रवेश द्वार का प्रतीक है। प्रवेश द्वार में एक स्लाइडिंग दरवाजा है, जिसे बांस से विभाजित चटाई से तैयार किया गया है, जो बांस के स्लाइडिंग फ्रेम पर लटका हुआ है।

बीच का कमरा सबसे महत्वपूर्ण कमरा होने के कारण तुलनात्मक रूप से सभी कमरों से बड़ा है जो स्थानीय रूप से ’डोंगरामा’ लिविंग रूम के रूप में जाना जाता है। इस बड़े कमरे के बीच में आग जलाने की जगह भी है, जिसे ’ओंगर’ कहा जाता है, जिसे ऊपर उठे मिट्टी के चबूतरे पर बनाया गया है। ’ओंगर’ के ऊपर समतल बांस से बनी मचान नुमा संरचना को लटका कर रखा जाता है जहॉं टोकरियों और आगे उपयोग में आने वाले खाद्य पदार्थों को रखा जाता है।
गारो घर के अंदर एक रसोई घर है, और दीवार जो पीछे के भाग को अलग करती है जो घरेलू देवता का स्थान है। घर के इस स्थान में महत्वपूर्ण घरेलू अनुष्ठान किए जाते हैं। इस दीवार पर घरेलू देवता की पूजा से जुड़ी अनुष्ठान सामग्री और अन्य प्रतीकात्मक सामग्री भी देखी जा सकती है।

घर के बाहर, बगल में बने चबूतरों का बहुआयामी महत्व है जिनकी संख्या अक्सर दो अथवा तीन होती हैं । यह एक उठा हुआ चबूतरा है जिसका उपयोग फुरसत के क्षणों को बिताने एवं अनाज सुखाने और अन्य प्रकार के घरेलू उपयोग के लिए किया जाता है। दांईं ओर की जगह विशेष रूप से उस अतिथि के लिए है जो उनसे मिलने आता है।


संग्रहालय की मुक्ताकाश प्रदर्शनी में प्रदर्शित इस ’गारो आवास प्रकार’ की संग्रहालय के भ्रमणाथिर्यों को खूब प्रशंसा की है क्योंकि इसके छप्पर के छाजन की सुन्दर ढंग से की गई कटाई-छटाई इस आवास प्रकार को स्वभाविक रूप से खूब आकर्षक बनाती है।

बदलते समय के साथ, आधुनिक जीवन शैली धीरे-धीरे पारंपरिक जीवन शैली में प्रवेश करने लगी है। गारो जनजाति की बहुमुखी बांस-प्रभुत्व वाली स्थानीय वास्तुकला अब आधुनिक जीवन शैली के अनुरूप बदल रही है । यह वास्तुकला दुर्लभ है जो केवल मेघालय में गारो निवास के दूरदराज के गांवों में ही देखी जा सकती है। इंगांरामासं ने अपनी मुक्ताकाश प्रदर्शनी में प्रदर्शित इस समुदाय के पारंपरिक आवास प्रकार को संरक्षित किया है । संग्रहालय इस जनजाति की गौरवशाली संस्कृति को जन-जन तक पहुंचा रहा है।

From the Tribal Habitat, Open Air Exhibition on North Eastern India
Nokmong

A traditional Garo House of Meghalaya

The Garos are one of three native tribes of Meghalaya. They are also sporadically distributed in Assam, Tripura, Nagaland, and some areas of Bangladesh. The name Garo has been given to them by the neighboring people, who are the non-Garos. A very well-known tribe for their matrilineal tradition and the heir of the families take their clan titles from their mothers. Traditionally, the youngest daughter (nokmechik) inherits the property of the mother. Sons leave the parents’ house at puberty and are trained in the village dormitory (nokpante). After getting married, the man lives in his wife’s house. Garos are now the second-largest tribe in the state and comprised one-third of the local population. 1

When we look at the habitat and settlement pattern of the Garo villages, one may find sparsely arranged, bamboo-dominated house types raised on stilts of bamboo and wooden poles having nicely trimmed thatch structures along the ridges of hill slopes. Traditionally, four types of vernacular architecture could be seen among the Garo tribe of Meghalaya. These houses are classified according to the livelihood patterns, socio-economic liabilities of the tribe. These traditional bamboo-dominated house structures are; 1) Nokmong (a common living house), 2) Nokpante (Boy’s Dormitory), and Borang (Field house/ treehouse/ watchtower). They normally use naturally available building materials like timbers, bamboo, cane, and thatch. 

Nokmong is a house where every A’chik(family members) stays together. The house has the provisions for sleeping, hearth, sanitary arrangements, kitchen, water storage, fermenting wine, a place for cattle-shed or stall-feeding the cow, pigsty, hencoop, and enclosure for stacking firewood. These neatly arranged space of the house perhaps is why the Garo matrilineal family appears to be well organized in domestic activities. The house is typically erected through a stilted bamboo structure and local wood along the hill slope to obtain a plain platform above the ground. The top of this bamboo platform is adequately covered with a matted bamboo floor and used as a living space. There are three extensions on the floor plan, two along the sides while one at the rear end. The left extension is used for multiple activities like spending leisure, preparing baskets, drying sliced tubers, meats, chilies, etc., while the right extension is primarily meant for washing utensils, clothes, and other auxiliary domestic activities. 

The front space of the house touches the ground, and it occupies a space for the domestication of animals. Traditionally, the most valued breed of either Pig, Cow, or a Bull is kept reserved in this enclosure as the family’s wealth. A massive circular log of about one and a half feet rested vertically on the ground is marks the entrance of the house. The entrance has a sliding door prepared from a bamboo-splitted mat hanging on a sliding frame of bamboo tube. 

The central hall being the most important room, is comparatively bigger and locally known as Dongrama or a living room. This big hall also has a central fireplace called Ongar, raised out of a mud plinth. The hanging platform of bamboo in layers is placed above this fireplace to stack food items and baskets for more prolonged use. 

Garo house has a kitchen inside, and the wall that separates the rear extension is a place of the domestic deity. Important rituals of domestic affairs are conducted in this space of the house. Ritual items and other symbolic paraphernalia associated with the worship of domestic deity could be seen on this wall. 

Two or three outwardly extended pile structure from the side of the house has multifunctional importance. It is a raised platform sometimes used to spend leisures and drying grains and other kinds of household utilities. The right side extension is specially meant for the guest who visits them.

The museum visitors complement this house type exhibited in the open-air exhibition premises of the museum as ‘the house with a nice haircut’ because of its attractive nature of nicely trimmed thatched-roof structure. 

With the changing time, modern livelihood has gradually started to enter into the traditional way of living. The versatile bamboo-dominated vernacular architecture of the Garo tribe is now transforming to tune with the modern way of living. It becomes scarce and could only be in the remote villages of the Garo habitat in Meghalaya. IGRMS preserves this community exhibited traditional house type in its Open Air Exhibition and disseminates the glorious culture of the tribe to the masses. 

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1 source: Wikipedia


जनजातीय आवास मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
ओडिशा की सावरा जनजाति
का पारंपरिक आवास प्रकार

सावरा ओडिशा की सबसे  प्राचीन जनजातियों में से एक है। सावरा यों तो पूरे राज्य में फैले हुए हैं पर उनकी आबादी का बड़ा हिस्सा गजपति और रायगडा जिले के गुनुपुर उप-मंडल में रहता है| उन्हें विभिन्न नामों से पुकारा जाता है जैसे सौरा, सौरा, सबारा, सावरा, सौर, सोरा आदि| यह भारत का प्रमुख आदिवासी समुदाय है जिसका अपना लंबा इतिहास है। इनका उल्लेख संस्कृत साहित्य, महाकाव्यों, पुराणों और अन्य धर्म ग्रंथों में मिलता है। विशेष रूप से ओडिशा में, वे भगवान जगन्नाथ की पूजा से बहुत घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं, जो एक पौराणिक परंपरा के अनुसार सावरा देवता के रूप में उत्पन्न हुए और बाद में शाही संरक्षण में पुरी लाए गए। सावरा पूर्वी भारत के ऊंचे दुर्गम स्थानो पर रहते हैं। वे मुख्य रूप से दो वर्गों, पहाड़ी सावरा या लांजिया सावरा और निचली भूमि सावरा या सुधा सावरा में विभाजित हैं। गांव पहाड़ी ढलानों पर  दूर-दूर बसे हुए होते है | गांव के प्रवेश द्वार पर गांव देवताओं (काष्ठ स्तम्भ) की स्थापना होती है | आकर्षक दीवार पेंटिंग  बनाते हैं, जिसे “इदितल” कहा जाता है| सामाजिक-धार्मिक रीति-रिवाज इनके सांस्कृतिक जीवन में सबसे अधिक महत्व रखते हैं। इनकी भाषा ऑस्ट्रो-एशियाई परिवार के कोल-मुंडा समूह से संबंधित है | सावरा मध्यम कद के होते हैं,  महिलाएं पुरुषों से छोटे कद की होती हैं, इनके त्वचा का रंग  हल्के पीले से गहरे-भूरे रंग का होता है |  सिर पर घने लहरदार बाल होते है जो चेहरे पर कम होते है। सावरा प्रदेश अपनी ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों,  तीक्ष्ण पर्वत धाराओं और ढलानयुक्त दूर-दूर घाटियों के साथ अपनी पोडु खेती के कारण बहुत सुरम्य होते है | पत्थरों द्वारा एक के ऊपर एक रचित  सीढ़ीदार धान के खेत, पहाड़ियों और घाटी की सुंदरता को बढ़ाते है। सवरा सिंचाई में भी निपुण हैं | इन्होंने पहाड़ की धाराओं को  बांधकर अपने सीढ़ीदार खेतों को सींचने के लिए पहाड़ी से नीचे पानी इकट्ठा करने में उल्लेखनीय कौशल दिखाया है। सावरा स्थानांतरित और स्थायी खेती में समान रूप से माहिर हैं। सावरा अपनी झोपड़ियों का निर्माण पहाड़ियों की तलहटी में या पहाड़ी ढलानों पर करते हैं|

अधिकांश सावरा गाँव घने जंगलों में होते हैं, और अजनबियों को अक्सर इन गाँवों में टेढ़े-मेढ़े जंगल के रास्तों का पता लगाना मुश्किल होता है। उनके घर अक्सर समानांतर पंक्तियों में होते हैं जो क्रमबद्धता को दर्शाते हैं। झोपड़ियाँ आयताकार होती हैं जिनकी दीवारें मिट्टी से बनी होती हैं और उन पर पत्थर बड़े करीने से मिट्टी से मढ़े जाते हैं जो अक्सर सफेद धारियों से सजाए जाते हैं। लिविंग रूम में फर्श से लगभग पांच ऊपर क्रॉस बीम द्वारा बनाई गई लाफ्ट पर अनाज टोकरियों में रखा जाता है | छत ढलानयुक्त और घास की छप्पर वाली होती है | छत की घास को दो-तीन साल में एक बार बदला जाता है । सावरा का मुख्य भोजन चावल, रागी या जाना या कुछ अन्य आनाज है। कभी-कभी वे आम के बीज, रागी और चावल की गिरी से तैयार जौ खाते हैं। मिट्टी के पत्रों में भोजन पकाते है और पत्तियों से निर्मित पात्रों में खाते हैं | ये शाकाहारी भोजन की तुलना में मांसाहारी भोजन अधिक पसंद करते है और इसके बिना कोई त्योहार नहीं मनाया जाता साथ ही किसी अतिथि का स्वागत मांसाहारी भोजन के बिना संभव नहीं है। सावरा ने अपने पंथ में कई देवी-देवताओं और अर्ध-देवताओं को शामिल किया है | उनकी मूल विश्वास प्रणाली पूर्वजों और आत्माओं की पूजा के इर्द-गिर्द केंद्रित है। इन सभी देवताओं और आत्माओं की अपने अनुयाईयों से निरंतर अपेक्षा होती है। उनका मानना ​​है कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं तो वे उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। इन सभी देवताओं और  पूर्वजों की आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए  वे मुर्गी,  बकरी,  भेड़,  सूअर,  भैंस और शराब के बर्तन और कपड़े चढ़ाते हैं।

नृत्य सावरा जीवन का अभिन्न अंग है। ये स्त्री-पुरुष, सभी के मनोरंजन का महत्वपूर्ण स्रोत है। इनका कोई भी त्यौहार या समारोह नृत्य के बिना पूरा नहीं माना जाता है। सावरा द्वारा तीन प्रकार के प्रमुख नृत्य किए जाते हैं, ये हैं बागा बागुली, रसराकेली और  दलखाई नृत्य। बागा-बगुली नृत्य सावरा के महत्वपूर्ण नृत्यों में से एक है। बागा-बगुली नृत्य अविवाहित लड़कों और लड़कियों द्वारा ग्राम माँ या कुडनबोई के निर्देशन में किया जाता है। जब भी कोई अतिथि गांव में आता है  तो उनके मनोरंजन के लिए  प्रेम और सम्मान का प्रतीक ‘बागा-बगुली’ नृत्य का आयोजन किया जाता है। सावरा बहुत ही कलात्मक लोग हैं,  उनका कौशल न केवल उनके भित्ती चित्रों में बल्कि उनके नृत्य और संगीत में भी प्रकट होते हैं। उनके गीतों के शब्द संयोजन में हास्य, रोमांस और माधुर्य का खूब समावेश होता है | संगीत ने उनके ग्रामीण जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगीत उनके लिए मात्र नाच-गाने का विषय नहीं है बल्कि इसका संबंध मुख्य रूप से अनुष्ठान और शारीरिक एवं आध्यात्मिक कल्याण की परंपरा, रीति-रिवाजों, शादी विवाह और अन्य समारोहों के साथ वसंत से जुड़े अनुष्ठानों से भी है। वे विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजाते हैं जैसे कि विभिन्न आकारों के ड्रम, बांसुरी, पाइप, झांझ, शहनाई, घडि़याल, रस्सियां ​​​​और स्ट्रिंग वाद्ययंत्र। सावरा संस्कृति की विलक्षणता पूर्वजों की पूजा में है जिसे वे ‘दुंबा’  कहते हैं, जो इस विश्वास के साथ की जाती है की पूर्वज मृत्यु के बाद भी दुनिया में रह रहे हैं और अभी भी परिवार की भलाई के लिए उनकी देखभाल कर रहे हैं। वे सोचते हैं कि अपने सुख-दुख और सामाजिक कार्यों में पूर्वजों को भूलना पाप है। पांचवीं पंचवर्षीय योजना की शुरुआत के बाद से सावरा जनजातियों के समग्र कल्याण के लिए एक उप योजना ताकि इन पर विशेष ध्यान दिया जा सके| इससे जुड़े कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रशासनिक संरचना भी बनाई गई। भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, ओडिशा में सावरा की जनसंख्या 5,34,751 है |

From Tribal Habitat Open Air Exhibition
Traditional House type
of Saora Tribe of  Odisha

The Saora’s are known as one of the oldest tribes in Odisha. Bulk of their population lives in Gajapati district and Gunupur sub-division of Rayagda district. They are  also found in all the districts of the state. They are known from various names such as saora, saura, sabara, savara, saur, sora etc. They find mention in the Sanskrit literature, the epics, the puranas and other religions texts. Especially in Odisha, they have been very intimately connected with the worship of Lord Jagannath who according to a legendary tradition originated as a Sabara deity and was later brought to Puri under royal patronage. They live in the hilly and mountainous region of Eastern India. They are mainly divided into two classes Hill Saoras or Lanjia Saoras and low land Saoras or Sudha Saoras. Their scattered housing pattern in hill slopes, installation of village deities (Wooden posts) at the entrance of the village, ingeniously prepared stone bounded terrace fields with inbuilt water management system, lineage organization called Birinda, attractive wall paintings called “ Idital” and peculiar socio-religious customs are the most significant aspects of their cultural life. Their language belongs to the Kol-Munda group of the Austro-Asiatic linguistic family. Saoras are of medium height, women being shorter than men, light yellowish to dark-brown in complexion and having wavy hair, thick on the head and scanty on the face. The Saora country with its lofty hills, dashing mountain streams and gaping valleys is very picturesque and slopes to some extent due to their podu cultivation, which enhances the beauty of the hills and valley by terraced paddy fields rising one above the other supported by stone revetments. The Saora’s are also good at irrigation and have shown remarkable skill in collecting water by bunding  mountain streams and leading them down hill to irrigate their terraced fields. The Saora’s build their huts at the foot of hills or on hill slopes wherever convenient level grounds are available close to hill streams. Most of the Saora villages lie concealed in jungles, and strangers often find it difficult to trace their way to these villages along zig-zag jungle paths. Their houses are often aligned in parallel rows which reflect a sense of orderliness.

The huts are rectangular with walls build of mud and stone neatly plastered with clay and often decorated with white stripes. In the living room, there was rift made by cross beams, about five feet from the floor, on which grain is stored in baskets. The slope of the roof is very steep and very low from the ground level. The grass thatched roofs is replaced once in two-three years. The principal food of Saoras is gruel (Jau) prepared out of rice or ragi (Elucine Coracana) or Jana (Sorghum Vulgare) or some other miner millets. Sometimes they eat Jau prepared from the kernel of the mango seed, ragi and rice. Leaf cups and leaf plates are mostly their utensils. Food is cooked in earthen pots, Non-vegetarian food is much more relished than the vegetarian food. Although the Saora’s pantheon has incorporated within itself a number of gots, goddesses and demi-gods, their original belief system centers around the worship of ancestors and spirits .All these gods and spirits have constant demand on their living beings. They believe that, if their demands are not met they may cause harm to them. To satisfy and worship all these deities, spirits and ancestors, they sacrifice hen, goats, sheep, pigs, buffalos offer liquor pots and cloths.

 Dance is the part and parcel of the life of Saoras. It is the most important source of recreation for all men and women of the tribe. No festival or ceremony is considered complete without a dance performance. There are three kinds of dances performed by the Saora’s, these are Baga Baguli Dance, Rasarakeli dance, Dalkhai dance. Baga-Baguli dance is one of the most important dance of the Saoras.  It is performed by the unmarried boys and girls under the instructions of the village mother or Kudanboi. Whenever any guest comes to the village, this dance is performed to entertain the guest as a mark of love and respect. The Saoras are very artistic people, their skills are not only revealed in their wall paintings but also in their dance and music. In their songs, one can find a great deal of humour, romance and melody in combination of the words. Their music is predominately a matter of tradition of rituals and physical or spiritual well being. Music played an important part in village life. It is associated not only with the dance and songs but also with the rituals associated with spring customs,wedding and other ceremonies. They play a variety of musical instruments such as drums of various sizes, flutes, pipes, cymbals, clarinets, gongs, rasps and string instruments. The uniqueness of Saora culture is the worship of ancestors what they call ‘Dumba’   with a belief that they are living in other world (after death) still closely looking after well being of the family. They think that it is a great sin to forget the ancestors in their social functions, sorrows and happiness. Since the beginning of the fifth five year plan, a sub plan for the overall wellbeing of Saora tribes have been setup and special administrative structure was created to ensure various implementation of various programmes. According to 2011 census of India, the Saora  population in Odisha is 5,34,751.

Introductory video on Tribal Habitat Open Air Exhibition Traditional House type of Saora Tribe of  Odisha

जनजातीय आवास
मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
कुनेमेची
चाखेसांग नागा का आवास

चाखेसांग जनजाति का नाम तीन नागा उप-समूहों चखरू, खेजा और संगतम के संयोजन उपरांत रखा गया है, ये  सभी एक संयुक्त क्षेत्र में निवास करते हैं। ये नागालैंड के फेक जिले में ठंडे पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते है।

चाखेसांग नागा में धनी प्रतिष्ठित व्यक्ति के आवास को कुनेमेची कहा जाता है। इसकी पहचान आवास में निर्मित सीका नामक एक सींग जैसे आकृति से की जा सकती है। किसी गाँव में सीका युक्त आवास यह दर्शाता है कि  व्यक्ति ने गाँव के लोगों को कई बार सामूहिक रूप से दांवते दी हैं । घर की सभी सामग्री तथा उनका आकार और आकृति समाज में व्यक्ति के समृद्धि और मूल्य को परिलक्षित करते हैं।

विस्तृत नक्काशी वाली सामने की दीवार को थिल्पा कहा जाता है। इसे मिथुन और भैंस के बहुत से कपालों से सुसज्जित किया गया है, जो पशु धन की समृद्धि का प्रतीक है। साथ ही यह घर के निर्माण के दौरान उसके द्वारा किए पशु बली की संख्या को भी दर्शाता है। शिकार किए गए जानवरों जैसे जंगली सूअर, बंदर आदि के कपाल उनके शिकार कौशल और बहादुरी को प्रदर्शित करते हैं। लकड़ियों पर की गयी नक्काशियों के अपने अलग-अलग अर्थ हैं जो गृह स्वामी की इस क्षमता को दर्शातें हैं कि वह अपने समाज का ऐसा व्यक्ति है जो गांव की भलाई के लिए अपने धन को खर्च कर सकता है।

लकड़ी के क्षैतिज तख्तों की पंक्तियों में उकेरी गयी महिला स्तन की आकृतियों के दो अर्थ हैं। यह एक ओर यह उर्वरता का प्रतीक है तो दूसरी ओर यह व्यक्ति के पास मौजूद खाद्यान्न के प्रचुर भंडार को भी दर्शाता है। मानव सिर की आकृति और हॉर्नबिल के कपाल वीरता के प्रतीक हैं। सूर्य, चंद्रमा और सितारों के दैवीय प्रतीक अपने लोगों को दी गयी दावतों और बलिदानों के साक्ष्य हैं। घर के सामने खड़े पांच खंभों में योद्धाओं के और दैवीय प्रतीक हैं जो घर को किसी भी तरह के विनाश से बचाते हैं।

यह वीडियों शृंखला नागालैंड के चाखेसांग नागा जनजाति के इस शानदार घर की व्याख्या करता है जिसे वर्ष 2003 में नागालैंड से एक महत्वपूर्ण स्थानीय आवास के रूप संग्रहालय में स्थापित और प्रदर्शित किया गया था।

From Tribal Habitat
Open air exhibition of IGRMS
KUNEMECHE:
The Chakhesang Naga House of Merit

The tribe Chakhesang is named after the union of three Naga sub- groups namely Chakhru, Kheza and Sangtam; all living in a compact territory. They are distributed in cold hilly terrain of Phek district of Nagaland.

The House of a richman among the Chakhesang Naga is called Kunemechi. One can identify this house by the presence of a horn like projection called Ceka. The person who has given several feasts to the villager is only entitled to adorn his house with Ceka. It is the symbol that shows the status that he has given feast for several times to the villagers. All the materials, shape and size of the house determines the richness and value of the owner in his society.

The front wall with elaborate carvings is called Thilpa.  It is decorated with a series of Mithun and Buffalo skulls, symbolizing a good possession of animal wealth. This also shows the number of sacrifices he made during the construction of the house. Skulls of the hunted animals like the skull of wild boar, monkey etc. are also decorated above the main door to display his hunting skill and bravery. All these carvings are manifested with individual meanings that proves the ability of the owner that he is the person in his society who could afford to spare his wealth for the well-being of the village.

The carved motives of women breasts that are arranged in rows of the horizontal planks has dual meanings. It represents the symbol of fertility on one hand and it also signifies the enormity of food grains possessed by the owner. The motives of human head and skull of hornbill are the symbol of valour. Heavenly symbols of Sun, Moon and Stars are portrayed in witness and evidence of the sacrifices he made for giving feast to his people.   Five upright pillars standing in the front of the house possesses the motives of warriors and the heavenly symbols to guard and protect the house from any kind of the destruction liable to be meted out of the unwanted evil forces.

The present episode of Online Exhibition Series explains this magnificent house type of the Chakhesang Naga tribe of Nagaland which was installed and exhibited as an important vernacular house collected from Nagaland in the year 2003.

From Tribal Habitat
Open air exhibition of IGRMS
KUNEMECHE: The Chakhesang Naga House of Merit