अंतरंग संग्रहालय भवन वीथि संकुल-Veethi Sankul Indoor Museum

अंतरंग संग्रहालय भवन
वीथि संकुल
Veethi Sankul
the indoor museum building


वीथी संकुल पर कैटलॉग देखने के लिए क्लिक करें- इंडोर गैलरीज परिसर
CLICK TO VIEW THE CATALOGUE ON Veethi Sankul- Indoor Galleries complex

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

वीथि संकुल (एक अंतरंग प्रदर्शनी भवन)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय (इंगांरामासं) की विशेष ताओं में 200 एकड़ के परिसर में विस्तृत मुख्य मुक्ता काश प्रदर्शनियों के साथ वीथि संकुल नामक एक अंतरंग प्रदर्शनी भवन भी है। वीथि संकुल में 12 दीर्घायें है जो कि मानव के जैव-सांस्कृतिक उद्विकास एवं विभिन्ताओं को प्रदर्शित करती हैं। इसमें मुख्यतः प्रागैतिहासिक कालीन मानव जीवन के साथ-साथ समकालीन सामाजिक जीवन की अवस्थायें, उनके जीवन यापन के तरीके, कलायें, पूजा-पाठ, वैवाहिक गतिविधियाँ, आभूषणों की विविधताएं लोक तथा जनजातीय संगीत वाद्ययंत्र, प्रदर्शनकारी कलाओं, मुखौटों, आध्यात्मिक क्रिया कलापों के साथ-साथ देश के उत्त्र पूर्वी राज्यों की संस्कृतियों के प्रादर्शो को प्रदर्शित किया गया है। 

यह वीडियो प्रस्तुति वीथि संकुल के दीर्घा क्रमांक 03 में आयोजित प्रदर्शनी ’’लिंगो यात्राः एक पर्व कोयतोर लोगों का’’ पर आधारित है। इसमे भारत के एक प्रमुख जनजातीय समूह ’गोंड’ तथा उनकी उपजातियों के जीवन दर्शन की एक झलक है।

प्रदर्शनी में एक बड़े हिस्से में वर्तमान छत्तीसगढ राज्य के बस्तर तथा आसपास के जिलों में मनाये जाने वाले उत्सव ’’कोयतोर यात्रा/लिंगो यात्रा’’ पर्व को प्रदर्शित किया गया है।

गोंड जनजाति के ये वृहत समूह अपने आप को ’’कोयतोर’’ से संबोधित करते हैं। ये जनजातियाँ  अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक एकजुटता हेतु समय-समय पर जात्रा त्योहार का आयोजन करती रहती हैं। लिंगो यात्रा’ इन जनजातीय समूहो के प्राचीन पारंपरिक उत्सव ’’पेन कारिस्ता’’ की प्रथा पर आधारित है।

प्रदर्शनी में आंगा देव के भौतिक स्वरूप को भी प्रदर्शित किया गया है जो कि साज की लकड़ी के तीन समान पाटों से निर्मित है। इसके मध्य भाग को ’’कोको’’ कहा जाता है जिसमें एक सर्प अथवा चिडिया के समान मुखाकृति दिखाई गई है। प्रदर्शनी में मुरिया लोगों में व्याप्त सामाजिक संस्था ’’घोटुल’’ को भी दर्शाया गया है साथ ही इनकी सुंदर अलंकृत कंघियाँ, टोकरियाँ, दीये, उत्कीर्णित तुंबे, आभूषण, काष्ठ कला, वाघयंत्रों, चित्रकला, देवी देवताओं की मुर्तियों इत्यादि को भी प्रदर्शित किया गया है।

————————————

Online Exhibition Series-2 :Veethi Sankul (an indoor museum building)

The important features of Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (IGRMS) spread in the campus of 200 acres are its open air exhibitions and an indoor museum building Veethi Sankul. There are 12 galleries in Veethi Sankul depicting bio-cultural evolution and variations of humankind. Exhibition displayed here showcase mainly different phases of prehistoric and contemporary life and culture of humankind, marital activities, variety of ornaments, folk and tribal musical instruments, performing arts, masks, religious and spiritual activities as also objects from cultures of North East.

This video presentation is based on the exhibition “Lingo Yatra: A festival of Koitors” mounted at gallery no. 3 of Veethi Sankul. It gives a glimpse of philosophy of Gond, a major tribal group of India and its sub groups.

A major portion of the exhibition covers Koitor Yatra / Lingo Yatra festival celebrated in the Bastar and adjoining districts of Chhattisgarh state. These larger groups of Gond tribe call themselves “Koitor” organize Jatra festival time to time for their socio-cultural integration. Lingo Jatra is based on the “Pen Karista” – an ancient traditional festival of these tribal groups.

Material form of “Anga Deo” is also displayed in the exhibition. It is made of 3 equal size wooden planks. The central portion is called ‘koko’ which resembles face of a snake or a bird. Exhibition also depicts Ghotul – a social institution of Muria tribe as also their beautifully engraved combs, baskets, lamps, engraved gourds, ornaments, wood craft, paintings, images of gods and goddesses etc.


Narrative video clip on “Lingo Yatra: A festival of Koitors” mounted at gallery no. 3 of Veethi Sankul

Entrance View of Veethi Sankul- Indoor Galleries complex
A view of Gallery no-3 inside the Veethi Sankul- Indoor Galleries complex
A view of Gallery no-3 inside the Veethi Sankul- Indoor Galleries complex
A Panel view of Gallery no-3 inside the Veethi Sankul- Indoor Galleries complex
A Panel view of Gallery no-3 inside the Veethi Sankul- Indoor Galleries complex
A Panel view of Gallery no-3 inside the Veethi Sankul- Indoor Galleries complex
A Panel view of Gallery no-3 inside the Veethi Sankul- Indoor Galleries complex

मांडवा गोहरी (भील-राठवा)
वीथि संकुल भवन की दीर्घा क्रमांक 04

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रंखला के अंतर्गत इस बार हम आपका परिचय करा रहे है वीथि संकुल भवन की दीर्घा क्रमांक 04 में प्रदर्शित प्रदर्शनी ‘मांडवा गोहरी भील-राठवा के धार्मिक प्रादर्शों से । इस दीर्घा में मुख्यत: मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र राज्यों में निवास करने वाली एक प्रमुख जनजाति भील की जीवन पद्धति  और उनकी भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति को दर्शाया गया है। सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न प्रक्रियाओं के प्रभाव के बावजूद गुजरात एवं मध्य प्रदेश के भील अपनी कुशल कृषि, प्रथाओं, मेलों और त्यौहारों, लकड़ी पर खूबसूरत नक्काशी एवं चित्रकला परंपराओं के लिए जाने जाते है। इस दीर्घा में प्रदर्शित प्रदर्शनी दिखाती है कि वे सदियों से अपनी संस्कृति और परंपरा को बनाए रखने में सक्षम रहे हैं। इस दीर्घा में समुदाय के लोगों द्वारा विभिन्न अवसरों पर किये जाने वाले अनुष्ठानों, विवाह तथा त्यौहारों को दर्शाया गया है। विशेष रूप से मांडवा गोहरी, गोल गाधेड़ो, गातले पूर्वज पूजा, भील और राठवा के विवाह मंडप, बाबा डुगर देवता का तीर्थ, इंद पूजा और पिथौरा आदि दीर्घा की दीवारों पर मिट्टी से उभारकर बनायी गयी आकृतियों पर सुंदर चिंत्राकन किया गया हैं। इस दीर्घा में प्रादर्शों के साथ-साथ प्रसिद्ध फोटोग्राफर स्वर्गीय आनंदी लाल पारीक द्वारा झाबुआ के भीलों पर आज से लगभग 60-70 वर्ष पूर्व  लिये गये छायाचित्र भी शामिल हैं। संग्रहालय द्वारा इन दुर्लभ छाया चित्रों का संकलन वर्ष 2005 में  किया गया था। इन चित्रों में उनकी गोदना परंपरा सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं, वेश-भूषा और आभूषणों को दर्शाया गया है। इस दीर्घा में लगभग 280 प्रादर्श  एवं 40 ब्लैक एंड व्हाइट छायाचित्र देखे जा सकते हैं।

Mandwa Gohari (Bhil and Rathwa)
Gallery No.4 of Veethi Sankul (Indoor Gallery)

Under the online exhibition series of IGRMS, this time, we introduce an exhibition from Gallery No.4 of Veethi Sankul (Indoor Gallery) called ‘Mandwa – Gohari’, a display projecting the socio-religious life of the Bhil and Rathwa tribe of India. The gallery showcases the traditional life-style, tangible and intangible cultures of the Bhils, a prominent tribe living mainly in Madhya Pradesh, Gujarat, and Rajasthan Maharashtra. Despite the influence of various social change processes, the Bhils of Gujarat and Madhya Pradesh are still known for their efficient agricultural practices, profound fairs and festivals, beautiful wood carving and painting traditions. The exhibition displayed in this gallery shows their rich culture and traditions that they have maintained for centuries. It depicts various aspects of rituals related to the marriage ceremony and festivals performed by the community members on various occasions. In particular, the gallery showcases the beautiful art of Wall-reliefs depicting the scenes of Mandwa Gohri, Gol Gadhedo, Gathela Ancestor Puja, Bhil- Rathwa wedding pavilions, Shrine of Baba Dugar Devta, Ind Pooja and Pithora, etc. The gallery’s impressive collection includes photographs taken by renowned photographer late Anandi Lal Pareek on the Jhabua Bhils about 60-70 years ago. These rare black and white photographs were collected by the museum in the year 2005. The photographs depict various aspects of traditional Bhil life-ways, and it also provides a scintillating view of their dress, jewelry, and tattooing tradition. About 280 exhibits and 40 black and white photographs can be seen in this gallery.

पारंपरिक ‘गोल गाधेड़ों’ त्यौहार एक दृश्य / A view of Traditional Gol Gadhedo Festival
गोल गाधेड़ो  उत्सव का एक भित्ति चित्र  /  A mural painting of Gol Gadhedo at Veethi Sankul Gallery no-4
पारंपरिक गातला का एक दृश्य  / A view of traditional Gatala
पारंपरिक रूप से पत्थर पर निर्मित गातला का एक दृश्य  /  A view of Traditional Gatala on stone
पारंपरिक वेश-भूषा में भील युवती /A Bhil lady in traditional attire
पारंपरिक बाबा डुगर के एक दृश्य  / A view of traditional Baba Dugar Dev
बाबा डुगर देव  को समर्पित अनुष्ठान / ituals dedicated to Baba Dugar Dev
बाबा डुगर देव पूजा स्थल / Sacred place of Baba Dugar Dev
बाबा डुगर देव – टेरकोटा मन्नत / Offerings of terracotta temple to Baba Dugar Dev

Introductory video on the Gallery-4 at Veethi Sankul- Mandwa Gohari (Bhil and Rathwa)Proudly powered by WordPress


वीथि संकुल भवन की दीर्घा क्रमांक 02 से
झारखंड की उथलू बिरहोर जनजाति

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के वीथि संकुल भवन की दीर्घा क्रमांक 02 आदिवासी और ग्रामीण समाजों की पारंपरिक आजीविका एवं आवास प्रतिमानों को दर्शाती है। इस दीर्घा में कुल 667 प्रादर्श  हैं जो विभिन्न पर्यावरणिक क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और लोक समुदायों की पारंपरिक आर्थिक पारंपरिक जीवन शैली गतिविधियों पर आधारित उत्तरजीविता  रणनीतियों और विशिष्ट आजीविका प्रकारों को दर्शाते हैं।  

        इस प्रस्तुति में, झारखंड की  बिरहोर जनजाति के संग्रह से  उनकी जीवन तरीकों को दर्शकों के लिए प्रस्तुत किया गया है। संग्रह में उनका आवास, उपकरण, हथियार, अस्त्र, फंदे और जाल तथा  टोकरियाँ शामिल हैं। प्रदर्शनी के रोचक पहलुओं में से एक है कुंबा नामक जुड़वां झोपड़ी। इस विशिष्ट आवास प्रकार को संग्रहालय में स्वयं उथलू बिरहोर समुदाय के लोगों ने तैयार किया था।

        बिरहोर मुख्य रूप से झारखंड के हजारीबाग, रांची और सिंहभूम जिलों में केंद्रित हैं। वे ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल राज्यों में भी विस्तृत हैं। यह जनजाति दो भागों में विभक्त है  (अ) उथलू बिरहोर या घुमन्तु जो अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं, और (ब) जंघी बिरहोर जो अब स्थायी जीवन जीने लगे है। अब इन्हें इन राज्यों में PVTG के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड राज्य में उनकी आबादी लगभग 10,000 है। बिरहोर मुंडारी शब्द बिर और होर से मिलकर बना है जिसमें  बिर का अर्थ है वन और होर का अर्थ है लोग और इस तरह बिरहोर का शाब्दिक अर्थ है। “वन के लोग”। इन्हें अन्य स्थानीय समुदायों द्वारा मांकड़िया और चोपदार के नाम से भी जाना जाता है।

        उथलू बिरहोरों की अस्थायी बस्ती को टांडा कहा जाता है। इसमें कुंबा ( परिवार का आवास ) के कुछ समूह शामिल हो सकते हैं, जिसके मुखिया या “नाया” नाम के पुजारी होते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उनमें आध्यात्मिक दुनिया से जुड़ने और आत्माओं के क्रोध  से उत्पन्न दुर्भाग्य को दूर करने की क्षमता होती है। बरसात के मौसम को छोड़कर, बिरहोर जंगलों में अपने परिवारों और सामान के साथ छोटे-छोटे समूहों में प्रवास करते हैं। पुरुष आत्माओं को विभिन्न अवसरों पर बलि चढ़ाने के लिए मुर्गियाँ, आखेट उपकरण, शस्त्र और फंदे लेकर चलते हैं।  इसके विपरीत, महिलाएं अपने सिर पर खजूर की पत्तियों की चटाई, टोकरियाँ, ओखली और मूसल, कुछ अनाज और खाना पकाने के बर्तनों में पानी लेकर चलती हैं।  बच्चे  छोटे जानवरों को पकड़ने में प्रयुक्त फंदे लेकर चलते हैं।

        बिरहोर छोटे जानवरों का शिकार करने और शहद, विभिन्न प्रकार के खाद्य और जड़ी-बूटियों को इकट्ठा करने के साथ-साथ सामूहिक प्रयास से  बंदरों को पकड़ने के भी शौकीन हैं। वे भोजन और रस्सी तैयार करने में प्रयुक्त चॉप और सियाली की तलाश में जंगलों में विचरण करते हैं और पास के साप्ताहिक बाजार में, इन उत्पादों को बेचकर अपनी आवश्यकताओं की अन्य वस्तुएं  खरीदते हैं। वन संसाधनों में आती कमी और उनकी जीवन पध्दति में हस्तक्षेपों के कारण बिरहोर अब  धीरे-धीरे एक अलग प्रकार की अर्थव्यवस्था और संसाधनों पर निर्भर होते जा रहे हैं।

From Veethi Sankul’s Gallery No. 2 of IGRMS
The Uthlu Birhors of Jharkhand

Veethi Sankul’s Gallery No. 2 of IGRMS presents the livelihood and settlement patterns of the tribal and rural societies. It houses 667 objects and presents the tribal and folk communities living in different ecological settings. The survival strategies and distinctive livelihood patterns based on their traditional economic activities are presented in this gallery.

In this episode, a collection from the Birhor tribe of Jharkhand showcasing their traditional way of foraging life is presented for the visitors. The collections include simple households, tools, weapons, snares, baskets, and nets used by the tribe in their foraging activities. One of the exciting aspects of the exhibition is the display of a twin hut known as Kumba. This typical house type was prepared by the Uthlu Birhors themselves at the time of making the exhibition.

The Birhors are concentrated mainly in the Hazaribag, Ranchi, and Singhbhum districts of Jharkhand. They are also scattered in the states of Odisha, Chhattisgarh, and West Bengal. The tribe is divided into two – (a) the Uthlu Birhor or the wanderers who move from one place to another for their foraging activities and (b) The Janghi Birhors or the settlers started living a settled life. Now they are categorized as the PVTG’s in these states. According to the 2011 census, their total population in the State of Jharkhand is approx 10,000. Birhor derived from the Mundari words Bir and Hor; Bir means Forest and Hor mean people, and the literal meaning of Birhor is “Forest People.” They are also known as Mankaria and Chopdar by other communities.

The temporary settlement of the Uthlu Birhors is called Tanda. It may consist of a few groups of Kumbas (family house) headed by the headman or the priest called Naya, who is believed to have the ability to connect with the spiritual world and avert the misfortunes from the ill-ailments of the spirits. Except in the rainy season, they move from jungle to jungle in small groups with families and their belongings. Men carry fowls for occasional sacrifices to the spirits, hunting tools, weapons, and nets. In contrast, women carry on their heads the items like palm-leaf mats, baskets, wooden mortar & pestle, baskets with grains they have, and cooking pots for carrying water. Children are allowed to carry snares to train them for catching small animals. 

Apart from hunting small games and collecting honey, fibers, edibles, and herbs, they are fond of catching Monkeys. It is performed with a collective effort. They wander from one forest to another in the quest for food and collection of Chops and Siali by which they prepare ropes. In the weekly market nearby, they sell these products and do purchase their requirements. With a deep erosion of forest resources and other interventions to their life-ways, they are slowly moving to a changing economy and resources. 

A Birhor man posing with his hunting net

Introductory video on the Veethi Sankul’s Gallery No. 2 of IGRMS-The Uthlu Birhors of Jharkhand


वीथि संकुल- अंतरंग भवन दीर्घा क्रमांक 02 में प्रदर्शित
देवार और रबारी समुदाय के ख़ानाबदोश जीवन

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने अपनी दीर्घा क्रमांक 02 में आदिवासी और ग्रामीण समाजों की पारंपरिक आजीविका एवं आवास प्रतिमानों को दिखाया है। दीर्घा में 667 प्रादर्श हैं जो विभिन्न पर्यावरणिक क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और लोक समुदायों की पारंपरिक आर्थिक गतिविधियों को दर्शाते हैं। इस श्रंखला में छत्तीसगढ़ के देवार समुदाय और गुजरात के रबारी समुदाय के खानाबदोश जीवन की जानकारी आगंतुकों के लिए ऑनलाइन प्रस्तुत की जा रही है। इस संग्रह में इन दोनों समुदायों के पारंपरिक घरेलू सामान, गहने, वस्त्र तथा वाद्य यंत्र आदि शामिल हैं। रबारी पारंपरिक घरों “भुंगा” के एक भाग को सौंदर्य परक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। ख़ानाबदोश देवार के संग्रह को उनके अस्थायी आवास के साथ दिखाया गया है।

देवार मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पाये जाते हैं तथा माना जाता है कि वे गोंड राज्य के पतन के बाद गढ़ मंडला नामक अपने मूल स्थान से प्रवास कर गए थे। देवार पुरुष गायन में निपुण होते है और अन्य समुदायों के लिए भाट का काम करते हैं। महिलाएं गोदना गोदने में कुशल होती हैं। वे गाँव या कस्बे के बाहर नदी, तालाब, कुएं के किनारे और घने पेड़ों के नीचे टेंट लगाकर डेरा डालना पसंद करते हैं और आस-पास के गांवों के लोगों को अपनी गायन सेवाएं प्रदान करते हैं और कुछ समय बाद एक नए स्थान पर चले जाते हैं। देवारों ने साप्ताहिक बाज़ारों में जाकर गोदना गोदने का काम प्रारंभ कर दिया है। देवार समुदाय के प्रादर्श में उनकी प्रमुख देवियों यथा हिंगलाज देवी, बूढ़ी माई, चौरा देवी और कस्तूरी देवी के स्थान को भी प्रस्तुत किया गया है। चैत (मार्च-अप्रैल ) और कुंवार (सितंबर-अक्टूबर) की नवरात्रि में देवी को प्रसन्न करने और आर्शीवाद मांगने के लिए प्रसाद आर्पित किया जाता है।

रबारी जनजातीय पशुपालक ख़ानाबदोश हैं। वे राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी मैदानों में निवास करते हैं। रबारी का ख़ानाबदोश जीवन उनके द्वारा पाले जाने वाले पशुओं के झुंड के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। वे चारागाहों की तलाश में पशुओं के साथ लंबी यात्रा करते हैं और यह मौसमी प्रवास अपने मूल स्थान पर लौटने तक लंबा दूरी तय कर लेते है। वर्तमान में रबारी जनजाति ने अपने निर्वाह के लिए पशुपालन के पारंपरिक व्यवसाय के साथ कृषि का काम भी शुरू कर दिया है। रबारी महिलाएं अपनी कुशल कढ़ाई, चित्रकारी और मिट्टी से भित्ती चित्रण, जिसमें दर्पण का काम शामिल होता है, के लिए जानी जाती हैं। दीर्घा में इस प्रदर्शनी के माध्यम से आगंतुक रबारी समुदाय के ख़ानाबदोश जीवन का वास्तविक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

Exhibit from the Indoor Gallery no.2 of Veethi Sankul
Nomadic life of the Dewar and Rabari community

The Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya showcases the traditional livelihood and housing patterns of tribal and rural societies in its gallery No. 2. The gallery houses 667 exhibits that narrate the survival strategies, livelihood patterns and traditional economic activities of tribal and folk communities living in different environmental zones. In this episode, exhibits portraying the nomadic life of the Dewar community from Chattisgarh and Rabari from Gujarat are being presented for the online visitors. The collections include traditional household items, ornaments, textiles, and musical instruments of these two communities. The Rabari households are aesthetically presented with an ambiance of a life-size Bhunga (a traditional house) laid in a sectional view. The collections from the nomadic Dewar are uniquely presented with their temporary shelter.

The Dewars are found mainly in Madhya Pradesh and Chhattisgarh, and they are known to have moved from their original place called Garha Mandla after the fall of the Gond state. Devar men are proficient in singing and work as the minstrel for the other communities. Women are skilled in marking tattoos. They prefer to camp by setting tents near the river, pond, well, and under the dense trees outside the village or town and provide their minstrel services to the people of nearby villages and move to a new place after some time. Dewars have started to engage their work of tattooing by visiting the weekly markets. Dewar exhibit also presents the abode of their principal deities namely Hinglaj Devi, Budhi Mai, Chaura Devi, and Kasturi Devi. In Navratri of Chaitra and Kuwaar, offerings are made to the Goddess for appeasement and seeking blessings.

The Rabari tribe is a shining example of the pastoral nomads. They are found in the desert plains of Rajasthan and Gujarat. The nomadic life of the Rabari is deeply associated with their herds of animals they rear. They travel a long distance, searching for pastures to feed their animals, and this seasonal movement takes a long course to return to their native place. Presently, the tribe has also started the work of agriculture with the traditional occupation of animal husbandry for their subsistence.  The Rabari women are known for their skillful embroidery, painting, and clay relief work that embodies the art of mirror embellishment. Visitors may find a first-hand experience to explore the nomadic life of the Rabari tribe through this exhibition in the gallery.

  • दीर्घा क्र. 02 में प्रदर्शित भूंगा (पारंपरिक आवास) का एक दृश्यअपने पारंपरिक आवास में खाना पकाती हुयी रबारी महिलाएं आर्थिक गतिविधियों का एक मनोरम दृश्यकच्छ गुजरात में स्थित रबारी जनजाति का एक पारंपरिक गांवकशीदाकारी करती हुयी रबारी महिलाएंपारंपरिक वेश-भूषा में रबारी महिलाभूंगा (पारंपरिक आवास) के भीतर सज्जित भित्ती चित्र युक्त भंडार का एक दृश्ययात्रा करते हुये रबारी समुदाय के लोगरबारी जनजाति के परिवार रबारी जनजाति अपने पशुओं के साथ ऋतू प्रवास करते हुयेदीर्घा क्र. 02 में प्रदर्शित देवार समुदाय पर आधारित एक प्रादर्शगोदना गोदने का कार्य करती हुयी देवार महिला देवार समुदाय के खानाबदोश जीवन का एक दृश्य देवार समुदाय के देवी-देवता देवार का एक परिवारवाद्य यंत्र बजाते हुये देवार

Introductory video on the Exhibit from the Indoor Gallery no.2 of Veethi Sankul – Nomadic life of the Dewar and Rabari community


वीथि संकुल अंतरंग प्रदर्शनी दीर्घा क्रमांक-8 से
भारत के जनजातीय एवं लोक समुदायों में प्रचलित मुखौटे

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की दीर्घा क्रमांक 08 में भारत के जनजातीय एवं लोक समुदायों में प्रचलित मुखौटों को प्रदर्शित किया गया है। सन 2007 में संग्रहालय के स्थापना दिवस के अवसर पर प्रारंभ की गयी इस दीर्घा में कुल 183 मुखौटे प्रदर्शित हैं जो विभिन्न पर्यावरणिक एवं भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और लोक समुदायों में पारंपरिक रीति-रिवाजों, उत्सवों, नृत्यों आदि के अवसर पर पहने जाते हैं। इस दीर्घा में पश्चिम बंगाल के राजबंशी, कर्नाटक के तुलु, मध्य प्रदेश के बैगा, झारखंड एवं हिमाचल प्रदेश के लोक समुदाय, अरुणाचल प्रदेश के मोन्पा, उड़ीसा के चित्रकार, सिकिक्म के बौध्द समुदाय आदि के द्वारा उपयोग किए जाने वाले मुखौटों को प्रदर्शित किया गया है। इस दीर्घा में विभिन्न माध्यमों जैसे लकड़ी, पीतल, पेपर मेशी से बने तथा मोर पंखों से सुसज्जित विविध प्रकार के मुखौटे दिखाये गये हैं जो अपने उद् भव एवं स्थानीय संसाधनों के उपयोग के कारण भौगोलिक पहचान और अद्भुत कलाकारी को प्रकट करते हैं। इन मुखौटों के माध्यम से किसी महान व्यक्ति, पूर्वज देवी-देवता या रक्षकों का रूप धारण कर उनके वास्तविक जीवन के चरित्र को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।

संग्रहालय की ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला की इस प्रस्तुति के अंतर्गत मुखौटों पर आधारित इस दीर्घा की प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों को भारत के विभिन्न राज्यों की मुखौटा परंपरा से रूबरू कराया जा रहा है।

From the Veethi SankulIndoor Gallery no:8
Masks prevalent among the tribal and

folk communities of India

The Gallery number 8 in the Indoor museum of Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya displays a wide range of collection of masks prevalent among the tribal and folk communities of India. The gallery was opened in the year 2007 on the auspicious occasion of Foundation Day celebration of the Museum. In this gallery, 183 masks are displayed showcasing the aspects of their traditional uses in the ceremonies, festivals and dances of tribal and folk communities residing in the different ecological and geographical settings. The exhibition includes masks from Rajbanshi community of West Bengal, metal mask from the Tulu people of Karnataka, the Baiga of Madhya Pradesh; mask traditions from Odisha and Himachal Pradesh, Buddhist masks from the Monpa tribe of Arunachal Pradesh and Sikkimese people of Sikkim. This gallery exhibits a large variety of masks available in different media like wood, brass, papier-mâché decorated with feathers of peacock which culturally specifies the unique craftsmanship and geographical distinction of their origin and local resources. Using the medium of these masks, the metaphors of various legendary figures, ancestral and guardian deities theatrically presented to inform the masses about the prowess and morals of these characters.

Through this online presentation of the exhibition based on the collection of masks, this museum tries to link our visitors to take a look into the vibrant tradition of the Indian masks.


एथनो-म्यूजिकल दीर्घा से 
(वीथि संकुल -अंतरंग संग्रहालय भवन )
रॉचेम- एक मिजो संगीत वाद्य यंत्र 

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के आरक्षित संग्रह में 1400 से अधिक संगीत वाद्ययंत्र हैं। ये संगीत वाद्ययंत्र देश के आदिवासी, ग्रामीण और लोक समुदाय से एकत्र किए गए है । संग्रहालय के पारम्परिक संगीत वाद्ययंत्रों के संग्रहों को प्रदर्शित करने वाली इस एथनो-म्यूजिकल दीर्घा में आवश्यक रिनोवेशन के पश्चात् इसके विस्तारित स्वरुप को संग्रहालय के 40 वें स्थापना दिवस समारोह के शुभ अवसर पर दर्शकों  के लिए पुनः प्रारम्भ किया गया | इस दीर्घा के संयोजन हेतु संग्रहालय के  विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्रों के विशाल संग्रह में से 204 वाद्ययंत्रों का चयन किया गया । दीर्घा  में प्रादर्शों  को टाइपोलॉजिकल रूप से क्रमबद्ध किया गया है और इसमें भारत में मणिपुर राज्य के युवा मूर्तिकला कलाकारों द्वारा विकसित पुतलों या 3 डी मॉडल शामिल हैं। एक विशेष कोना पश्चिम बंगाल और झारखंड की संथाल जनजाति से संबंधित पारंपरिक वाद्ययंत्र बनम के संग्रह को समर्पित है।

ऑलाइन प्रदर्शनी की यह श्रृंखला रॉचेम नामक एक संगीत वाद्ययंत्र की जानकारी प्रदान करता है जो मिजोरम के मिजो जनजाति से  संबंधित है। यह संगीत वाद्ययंत्र संग्रहालय  की एथनो-म्यूजिकल गैलरी के विंड इंस्ट्रूमेंट्स सेक्शन में प्रदर्शित किया गया है। रॉकेम मिज़ो जनजाति का एक कुशलतापूर्वक तैयार किया गया वाद्य यंत्र है । यह भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में रहने वाली कुकी-चिन जनजातियों के बीच व्यापक रूप से फैली हुई है और विभिन्न कुकी और चिन जनजातियों द्वारा अलग-अलग नामों से जानी जाती है। रॉचेम की तैयारी में प्रयुक्त सामग्री लगभग अन्य समकक्षों के समान है। इसे अलग-अलग लंबाई के स्थानीय छोटे बांस की छड़ी, सूखी लौकी, पीतल की पन्नी, मधुमक्खी के मोम और सीप के खोल के पाउडर का उपयोग करके तैयार किया जाता है। लौकी और छोटे बांस के नरकट रॉचेम के सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं, उन्हें उचित समय पर एकत्र कर रखा लिया जाता है और उचित समय पर इनका उपयोग  वाद्ययंत्र के निर्माण हेतु किया जाता है । लौकी या तो जंगली हो या आसपास के आवासीय क्षेत्र में लगा कर, उसे तैयार होने तक किसी भी प्रकार के अवांछित नुकसान या क्षति से बचाव  और सुरक्षा दी जाती है। लौकी की बाहरी सतह पीली हो जाने पर इसे एकत्र कर लिया जाता है। लौकी को छीलकर कुछ दिनों के लिए धूप में रखा जाता है। इसे कीट और दीमक  से बचाने के लिए चूल्हे अथवा चिमनी के ऊपर रखा जाता  है।

रॉचेम का  मुख्य भाग कम्पन्न होने वाले सूखे लौकी का होता है। इसमें बांस के पाइप के नौ सरकण्डे हैं जिनमें स्वरों और ध्वनि  के ट्यूनिंग हेतु छिद्र हैं। इनमें से प्रत्येक पाइप में वांछित स्वरों और ध्वनि के अनुसार अंदर की ओर पीतल धातु की पन्नी की बजर होती है। बजर की कंपन ध्वनि के साथ गूंजन उत्पन्न करने लिए लौकी के मुंह से बांस के पाइप से बना एक फुकनी डाला जाता है। रॉचेम केवल पुरुष द्वारा बजाया जाता है। रॉचेम बजाने की अपनी कुशलता  के लिए  इन्हें मिज़ो समाज मेंसम्मानजनक स्थान प्राप्त है। वाद्य यंत्र को एक सुविधाजनक स्थिति में पकड़कर,  हवा की फूंक के साथ बांस के पाइप के छेद पर उंगलियों के साथ लयबद्ध स्वर व ध्वनि उतपन्न  करता है। कुछ लोक प्रदर्शनों में, रॉचेम वादक अन्य नर्तकियों के साथ नृत्य का भी प्रदर्शन करता है। चूंकि यह वाद्य यंत्र खुशी और प्रसन्नता से जुड़ा है, इसलिए इसे पारंपरिक रूप से मृतकों के शोक समारोह के दौरान बजाने से परहेज किया जाता है।


चीन और कई अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में, यह वाद्य  यंत्र विभिन्न स्थानीय रूपों में भी देखा जाता है। रॉचेम के  विभिन्न स्थानीय स्वरुप हमें संगीत की एकता और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ उनके प्राचीन अतीत में मिज़ो के अनकहे ऐतिहासिक संबंधों का संकेत प्रदान करता है।

From the Ethno-Musical Gallery
(Veethi Sankul Indoor Building Complex)
RAWCHEM- THE MIZO MUSICAL INSTRUMENT

The Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya has over 1400 musical instruments in its reserve collection. These musical instruments were collected from the tribal, rural and folk population of the country. The gallery showcasing the Ethno-musical collections had undergone the revamp process and it was re-opened to the general public during the auspicious occasion of the 40th Foundation Day Celebration of the museum. Out of the large collection of musical instruments of various types in the museum, 204 instruments were selected and displayed for public in this gallery. The exhibits in gallery are typologically ordered and it contains mannequins or 3D models developed by the young sculpture artists hailing from the state of Manipur in India. A special corner is dedicated to collections of Banam –a traditional string instrument belonging to the Santhal tribe of West Bengal and Jharkhand. 


This episode provides information of a musical instrument called Rawchem that comes from the Mizo tribe of Mizoram. This musical instrument is exhibited in Wind Instruments Section of the ethno-musical gallery of the IGRMS. Rawchem is an ingenously prepared wind instrument of the Mizo tribe. It is widely spread among the Kuki-chin tribes inhabiting across the north-eastern region of India and known by different names by different Kuki and Chin tribes. The materials used in the preparation of Rawchem are almost similar to the other counterparts. It is prepared by using local small bamboo reeds of different length, dry gourd, brass foil, bee wax and powder of oyster shell. Bottle gourd and small bamboo reeds being the most important component of Rawchem; they are collected in appropriate time and kept for seasoning. The gourd either wild or planted in the surrounding homestead land is given appropriate care and protection from any kind of unwanted loss or damages until it is harvested. The gourd is collected only when the outer surface of the body turns yellow. The skin of the gourd is scrapped and exposed to the sunlight for few days. It is than seasoned by keeping above the fireplace to prevent from insect and termite attack. 

Rawchem consists of a resonating body of dry gourd. It has nine reeds of bamboo pipe with tuning holes for notes and sounds. Each of these pipes contains brass metal foil buzzer fixed inside according to the desired notes and sound. A bellow made of bamboo pipe is inserted from the mouth of the gourd to blow wind into the shell to resonate with the vibrating sound of the buzzer. Rawchem is played only by the male. He has a dignified position in the Mizo society for his skillful art of playing Rawchem. By holding the instrument in a convinient position, the player blows air from the mouth piece and tunes the rythmic notes with fingers on the holes of the bamboo pipes. In some folk performances, Rawchem player also exhibit elegant moves and bodily gestures to accompany the other dancers. Since this instrument is associated with the mark of joy and happiness, it is traditionally refrain to play during the mourning ceremony of the dead. 

In China and many other South-east Asian countries, this wind instrument is also seen in different local forms. Although, Rawchem exists with different ethnic versions, this unique musical instrument provides us an indication of musical oneness and the untold historical connections of the Mizos with other South-east Asian countries in their ancient past.  

Introductory video on the Ethno-Musical Gallery (Veethi Sankul Indoor Building Complex) RAWCHEM- THE MIZO MUSICAL INSTRUMENT

अंतरंग संग्रहालय भवन वीथि संकुल से
दीर्घा क्रमांक 5
जातीय कलाएं गोदना परंपरा

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के अंतरंग संग्रहालय भवन वीथि संकुल की दीर्घा क्रमांक 5 में भारत के जनजातीय एवं लोक समुदायों में प्रचलित जातीय कलाओं से संबंधित 123 प्रादर्शों को प्रदर्शित किया गया है। यह प्रादर्श विभिन्न पर्यावरणिक एवं भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी  और लोक समुदायों के रीति-रिवाजों, त्यौहारों, सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों से संबंधित है।   

प्रदर्शित किये गये प्रादर्शों में तमिलनाडु के चेटिटयार समुदाय के नक्काशीदार दरवाजे, छत्तीसगढ़ के समुदाय रजवार की भित्ति कलाकृतियाँ, उड़ीसा के भोत्तडा जनजाति की धान से सृजित कलाकृतियाँ, मध्य प्रदेश की बैगा जनजाति की गोदना परंपरा, आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की चित्रकला, अगरिया जनजाति के विवाह दीप एवं मिथिला क्षेत्र की छठ पूजा से संबंधित प्रादर्शों को प्रदर्शित किया गया हैं। ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला के इस अंक में दर्शकों को इन विभिन्न कला रूपों में से बैगा जनजाति की गोदना परंपरा से रूबरू कराया जा रहा है।

बैगा जनजाति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं झारखंड में पायी जाती है। म. प्र. के मंडला, डिंडौरी, बालाघाट, शहडोल एवं अनूपपुर जिलों में बैगा समुदाय बड़ी संख्या में निवासरत हैं। मध्य प्रदेश में यह समुदाय विशेष रूप से संवेदनशील जनजाति समूह के अंतर्गत आते है। बैगा जनजाति की अपनी विशेषता, अपनी परंपरायें और अपनी कला है जो उनके क्षेत्र के वातावरण एवं प्राकृतिक संपदाओं और संसाधानों से प्रभावित है। बैगा जनजाति की विभिन्न कलाओं में से एक गोदना कला बेहद खास है इनकी तथा इससे सामाजिक- सांस्कृतिक एवं आर्थिक मान्यताओं से जुड़ी होती हैं। गुदना गुदवाने वाली महिलाओं की समाज में मान प्रतिष्टा ज्यादा होती है। इनका मानना है कि अधिक गुदनाधारी महिलाओं की ससुराल में विशेष सम्मान प्राप्त होता है।

महिला के शरीर में कम गोदना परिवार की निर्धनता का प्रतीक माना जाता है इसलिए इनमें गुदना गुदवाना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। गुदना इनके शरीर का आभूषण है। 8-12 साल की उम्र में लड़कियां गुदना गुदवाने लगती हैं और विवाह के बाद तक गुदवाती रहती है। बैगाओं में सारे गुदना एक साथ नहीं गुदवाये जाते। विभिन्न प्रकार के गोदना गुदवाने का समय और आयु अलग-अलग होती है। सबसे पहले शरीर के ऊपरी भाग कपाल, फिर हाथ, पीठ, जांघ, पछड़ी और अन्त में छाती पर गुदना गोदवाया जाता है। गोदना गुदवाने का कार्य बरसात को छोड़कर किसी भी मौसम में किया जा सकता है।

बैगा महिलाओं का गुदना बादी जाति की बदनिन महिलाओं के  द्वारा गोदा जाता है। यह लोग गांव- गांव घूमकर गोदना गोदने का कार्य करते है। बैगा जनजाति में गोदना गुदवाने के प्रति अनेकों सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएं समाज में विद्यमान  हैं जो जातीय परक, सौंदर्य परक, आध्यात्मिक परक, उपचार परक होती है।

गोदना उपकरण : काजल के लेप, सुई, हींग, तेल, और रुई गोदना कला के अनिवार्य उपकरण है। कई जनजातियों में विशेष कर बैगा में काजल के लेप की जगह पेड़-पौधे की पत्तियों का रस, रमतिला का तेल एवं भिलवा बीज का उपयोग किया जाता है।

From Veethi Sankul
the indoor museum building
Gallery No 5

Ethnic Art Tattoo tradition

Gallery number 5 of the Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya displays 123 exhibits related to the ethnic arts prevalent in tribal and folk communities of India. The exhibition focuses on the art objects that link to the traditional customs, festivals, socio-cultural and religious rituals of the native communities living in different environmental and geographical settings of the country.

The exhibits include intricately carved wooden doors of the Chettiar community of Tamil Nadu, lattice and mural exhibit of the Rajwar community of Chhattisgarh, Paddy craftwork of the Bhotada tribe of Orissa, tattoo tradition of Baiga tribe of Madhya Pradesh, paintings of the aboriginal tribe of Australia and Agaria tribe. In addition, exhibits related to the magnificent craft of iron marriage lamps and artworks related to Chhath puja of the Mithila region, Bihar, are showcased. Display in the gallery in this episode of the online exhibition series, the audience is introduced to the tattooing tradition of the Baiga tribe from various art forms.

Baiga tribe is mainly found in Madhya Pradesh, Chhattisgarh, and Jharkhand. Many Baiga people live in Mandla, Dindori, Balaghat, Shahdol, and the Anuppur districts of Madhya Pradesh. In this state, the community is recognized as the particularly vulnerable tribal group (PVTGs). The Baiga tribe has its own specialty of traditions and art, influenced by the surrounding environment and natural resources where they live. One of the important art forms of the Baiga tribe is tattoo art which is very special and deeply associated with their socio-cultural belief and economic activities. Women who bear tattoos attain high social prestige. They believe that heavily tattooed women get a special space of respect from their in-laws.

A woman with a meager tattooed body is considered to have reflected the family’s poverty, so it is necessary to get tattooed. The tattoo is regarded to be the ornament of a women’s body. At the age of 8-12 years, girls start tattooing their bodies and continue till after marriage. Among the Baiga women, all the tattoos are not prepared at once. There is appropriate age and timings for attaining different types of tattoos on their body. Initially, the upper part of the body is tattooed, especially on the forehead, then the hands, back, thighs, and finally on the chest. Tattooing can be done in any season except the rainy season.

The tattoos of Baiga women are prepared by the specialized Badnin women who belong to the Badi caste. They travel from one village to the other to perform the work of tattooing. In the Baiga society, many cultural beliefs concerning the practice of tattooing exist, and they are associated with their ethnic identity, aesthetic beauty, spirituality, and an act of healing. Items like Mascara paste, Needles, Asafoetida (Hing), Oil, and cotton are used as essential ingredients and tools used for tattooing. However, common to other tribes and the Baigas in particular, prefer to use the juice extracted from the leaves of a plant, oil of Ramtila, and Bhilwa seed as indelible material instead of Kajal paste.

Introductory video on Veethi Sankul : the indoor museum building – Gallery No 5 : Ethnic Art Tattoo tradition