करापात-करापात – माजुली, असम के वैष्णव मठ का एक पारंपरिक द्वार-KARAPAT- a traditional gate of the Vaishnava Monastery in Majuli, Assam

करापातमाजुली, असम के वैष्णव मठ का एक पारंपरिक द्वार

Introductory video on Open Air Exhibition at IGRMS, Gate no-2 : KARAPAT- a traditional gate of the Vaishnava Monastery in Majuli, Assam

माजुली असम की विशाल नदी ब्रह्मपुत्र में एक द्वीप है। माजुली को नव-वैष्णव आंदोलन, जो 15 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जागृत हुआ था, के महत्वपूर्ण  केंद्रों में से एक माना गया है, । असम के इतिहास में माजुली को 16 वीं शताब्दी में श्रीमंत शंकरदेव और उनके अग्रणी शिष्य माधवदेव की ऐतिहासिक मुलाकात के लिए याद किया जाता है,  जिसे मणिकंचन संजोग के रूप में जाना जाता है, जिससे असम में नव-वैष्णव आंदोलन को बढ़ावा मिला। कहा जाता है कि शंकरदेव ने एक बिल्वा वृक्ष लगाकर द्वीप पर प्रथम सत्र स्थापित किया और उसका नामकरण बेलगुरी किया। इस श्रृंखला के अंतर्गत इस बार माजुली, असम के कमलाबाड़ी सत्र के पारंपरिक द्वार की प्रतिकृति के बारे में जानकारी दी जा रही है जिसे वर्ष 2019 में संग्रहालय परिसर में प्रवेश द्वार क्रमांक दो के नजदीक स्थापित किया गया है।

यह वैष्णव मठ का एक आकर्षक रूप में सजाया गया विशाल और भव्य प्रवेश द्वार है, जो भक्ति की वैष्णव अवधारणा से जुड़ा है। कुछ कारापात आकर्षक रूप से चित्रित किए गए हैं, जबकि कुछ अन्य कारापात एक ही रंग से चित्रित किए गए प्रतीत होते हैं। एक सत्र से दूसरे में कारापात वास्तु प्रतिमानों में संरचनात्मक रूप से भिन्न हो सकते हैं, लेकिन भक्ति के रूप में कारापात के मुख्य अर्थ समान हैं। हालाँकि, 15 वीं या 16 वीं शताब्दी की वे संरचनाएं अब कंक्रीट संरचनाओं में बदल गई हैं, लेकिन आज भी इन प्राचीन विशाल लकड़ी के स्तंभों के तत्वों को माजुली के सत्रों के नामघर में मौजूद पा सकते हैं।

नामसिंघा (शेर की आकृति)

नामासिंघा एक अभिव्यक्ति है, जो भगवान के नाम का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी दिव्य शक्ति एवं सौम्य उपस्थिति किसी भी समय सभी के लिए सर्वोच्च है जो नैतिकता देते हैं कि प्रभु का नाम जंगल में एक शक्तिशाली शेर की तरह है, जो ताकतवर हाथी को भी पराजित कर सकता है। इसलिए, असम में नव-वैष्णव के संस्थापक, महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव ने नाम भक्ति (भगवान के नाम का पाठ करने की भक्ति) की शक्ति के लिए इस प्रतीकात्मक प्रतिमा को स्थापित किया और यह करापात का एक प्रमुख आकर्षण एवं असम  के सत्रों की वैष्णव संस्कृति का प्रतीक बन गया।

खेलनाव (नाव)

इस कारापात का क्षैतिज शीर्ष एक खेलनाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो तीव्र आवागमन या नाव-दौड़ में भाग लेने वाली एक पारंपरिक नाव है। भगतों (सत्र के भिक्षुओं) के अनुसार, खेलनाव एक ब्रह्मांडीय महासागर में पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करती है, जो मानव के अधर्मी कार्यों और बुरे विचारों की गहराई में डूबने से अनजान है। भगवान के नाम के प्रति समर्पित भक्ति इस ब्रह्मांडीय जलयात्रा में डूबने से बचा कर स्वर्ग तक पहुंचा सकती है। खेलनाव के पार्श्व सिरों में प्रतीकात्मक आकृतियाँ हैं जो मछली का आधा शरीर निगलते हुए मगरमच्छ को दिखाती हैं जो उस मानव का प्रतीक है जिसकी गलती उसे घातक प्राणियों (पाप) के मुंह में फंसा देती है और भगवान के नाम की भक्ति रूपी खेलनाव सत्य और परमानंद का एकमात्र मार्ग प्रशस्त करती है।

सिंघासन (प्रार्थना के लिए लकड़ी की बहुस्तरीय संरचना)

सत्र के नामघर (प्रार्थना कक्ष) के अंदर प्रार्थना के लिए रंगीन और बहुस्तरीय लकड़ी की संरचना का एक विशाल सिंघासन स्थापित है। सभी सत्रों में सिंघासन में भगवान के नाम उच्चारण के लिए सबसे अधिक भक्ति निहित है। हिंदू विश्वास परंपरा के अनुसार सिंघासन को कछुआ पर खड़ा दिखाया गया है, जो पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करता है। सप्त स्तरीय सिंघासन ‘सप्तबैकुन्ठ’ का प्रतिनिधित्व करता है, जो सर्वोच्च प्रभु के सात आकाशीय निवास हैं।

सारांश

यह कारापात वैष्णव मठ के द्वार का केवल वास्तु प्रतिमान ही नहीं है बल्कि इस नदी-द्वीप असम में नव-वैष्णव धर्म का प्रचार करने वाले लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को संस्थागत रूप देने के साथ विकसित हुई रचनात्मकता की सार्थक अभिव्यक्ति भी है। हालाँकि, सत्र में प्रयोग किए गए प्रतीकों को धार्मिक संस्तुति प्राप्त है तथापि यह एक अनुशासित सामाजिक जीवन, सदभाव और अखंडता का प्रसार करता है।

  1. https://www.atributetosankaradeva.org/satra_majuli.htm

KARAPAT- a traditional gate of the Vaishnava Monastery
in Majuli, Assam

Majuli is an island of the mighty river Brahmaputra, Assam. Majuli has been reckoned as one of the important nerve centers of the Neo-Vaishnavite Movement that awakened in the later period of the 15th Century CE. In the history of Assam, Majuli is remembered for the historic meet of the Srimanta Sankardeva and his foremost disciple Madhavdeva in the 16th Century CE, and this event is reckoned as the Manikanchana Sanyog that propelled the neo-Vaishnava movement in the Assam. It is said that Sankaradeva established the first institution Satra on the island by planting a Bilva tree and naming the place as the Belguri1.

In this episode, an architectural grandeur and cultural meanings of Karapat with reference to the prototype of the magnificent gate from the Kamlabari Satra, established in the Museum premise in the year 2019 is presented.

It is an attractively decorated massive gate that stands at the entrance of Satra- a Vaishnava Monastery, associated with the Vaishnava concept of Bhakti or devotion. Some Karapats are attractively painted, while some other Karapat appears to have been painted with a single color. Karapat from one Satra to the other may structurally differ in terms of their architectural patterns, but the core meaning of the use of Karapat as a devotional entity remains the same. Although those structures of the 15th or 16th Centuries have transformed into concrete structures, one can still find the elements of these ancient but massive wooden structures of pillars existing in the Namghar of Majuli Satras today.

Naamasingha (the lion figure)

Naamasingha is an expression that represents the name of Lord, whose divine power and benign presence are ever supreme to all the supremacies that gives the moral that the name of the Lord is like a powerful Lion in the jungle who can even overpower the mighty elephant. Therefore, Mahapurush Shrimanta Sankardeva, the founder of neo-Vaishnava in Assam, conjugated this highly expressive symbolic statue to the power of Naam Bhakti (the devotion of reciting the name of Lord) and it became a prominent attraction of the Karapat and a symbol of the Vaishnava culture of the Satras of Assam.

Khelnao (the boat)

The horizontal top of this Karapat represents a Khelnao, the traditional boat used in speedy transport or a boat-race. According to Bhagatas (monks of the satra), Khelnao (boat) represents the Earth sailing on the time of a cosmic ocean, uncertain about sinking into the depth of sinful acts and evil thoughts carried by the humans. A sincere devotion to the name of the Lord can protect and overcome the sink in this cosmic sail to reach the heavenly life. The lateral ends of Khelnao have symbolic figures showing a Crock like a creature swallowing half the fish’s body that symbolizes the human whose mistake may befall into the mouth of deadly creatures (sin) and Bhakti (devotion) with the name of Lord is believed that Khelnao is the only path to the truth and bliss”.

Singhasan (multi-tiered wooden structure for prayer)

Inside the Naamghar (Prayer Hall) of the Satra (Vaishnav Monastry), a huge Singhasan of the colorful and multitiered wooden structure is installed for Prayer. Among all the Satras, Singhasan carries the highest Bhakti of the recitals to the name of the Lord. According to the Hindu belief, the Singhasan is shown standing on the Tortoise, representing the Earth. The seventh tiered Singhasana represents ‘Sapta Baikuntha,’ the seven celestial abodes of the supreme Lord.

Summary

It appears that the Karapat is not merely an architectural form of a gate in the Vaishnava Monastery; it carries meaningful expressions of human creativity evolved with an institutionalized set up of the socio-cultural life of the people who preach neo-Vaishnavism in this river-island Assam. Although the symbols used in the Satra institution are religiously ordained, it disseminates a disciplined social life, harmony, and integrity.

https://www.atributetosankaradeva.org/satra_majuli.htm