देवराई-DEVRAI

देवराई-महाराष्ट्र के पुनीत वन

महाराष्ट्र राज्य के सिन्धुदुर्ग व रत्नागिरी जिले के प्रत्येक गांवो में करीब एक पुनीत वन अवश्य पाया जाता है, कुछ एक निजी पुनीत वनों या देवराई को छोड़कर बाकी सभी पुनीत वनों की भूमि शासकीय होती है। यद्यपि इसे प्रबंधन व प्रशासन के लिये संबंंिधत ग्राम पंचायत®ं क® सौंप दिया गया है। गांवों के पारंपरिक फैसले लिये जाने वाले संस्था जिसे मनकरिज व गावकर्स कहा जाता है, विशेष रूप से सामाजिक-धार्मिक मामलों मे अत्यंत सशक्त है। व्यक्तिगत उपयोग के लिये देवराई से वृक्ष®ं की लकड़ी, छाल, पत्ती इत्यादि को बाहर ले जाना पूर्ण रूप से वर्जित है।

इस क्षेत्र के ग्रामीणों का विश्वास है कि पुनीत वन की सभी सम्पत्ति वन-देवता की होती है। इन वनों मे कई महत्वपूर्ण और दुर्लभ वृक्ष प्रजातियाँ पायी जाती है विशेष रूप से पश्चिमी घाट में औषधीय पौधे पाये जाते है, जो कहीं और नहीं पायी जाती या फिर वनों के विनाश या आवश्यकता से अधिक उपभोग के कारण विलुप्त हो गयी हैं। विभिन्न देवराई में विशालकाय वृक्ष जैसे लुप्तप्रायः पेड-पौधों जैसे एन्टीएरिसट®क्सीकेिरया, टरमिनालियाबेल्लारिका, टेट्रामेलेस न्युडिफ्ल®रा, इंटाडा आदि पाये जाते हैं। इसके अलावा देवराई मे लुप्तप्रायः पेड-पौधे जैसे सैगरेइयालौरिफोलिया, होलीगरनारनौटियाना, अनैमिरटैकोकुलश, ब्युटियापार्विफ्ल®रा व एम®फर्®फाइलस की कई प्रजातीयाँ यहाँ आज भी संरक्षित है।

प्राकृतिक संपदा का भंडार होने के अलावा देवराई गांववालों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उत्सव व निर्णय लेने के अवसरों पर गांव वालों को इकट्ठा होने का स्थान भी प्रदान करता है। बहुत से गांवों मे अन्तेष्टि हेतु जंगल का कुछ भाग आरक्षित किया जाता है। इन पुनीत वनों मे पेड़ों की कटाई व संरक्षण केवल अन्तेष्टि हेतु ही किया जाता है। देवराई क्षेत्रों मे जल का सतत स्त्रोत ह®ता है। देवराई अपने आस-पास के कुँओं को पुनर्जीवित करते हैं तथा शुष्क मौसम में पानी का एकमात्र स्त्रोत होते हैं।

DEVRAI–Sacred Groves of Maharashtra

In Ratnagiri and Sindhudurg Districts of Maharashtra, each village has at least one Sacred Groves. With a few exceptions of privately owned Sacred Groves of  Devraies, lands of all the groves belong to the revenue department. However, it is handed over to respective village panchayats for their management and administration. The traditional decision making body of village, consisting of ‘Mankaries and Gaokars’, is still very strong, specially in taking decision on social-religious matters. Extraction of timber or any other forest produces from Devrai is strictly prohibited for personal use.The villagers believe that the entire property within the sacred groves belongs to the deity. These groves harbor many important and rare plant species, specially the medicinal plants from Western Ghats, which are hardly found elsewhere are being lost otherwise as a result of deforestation or over-exploitation. Many of these Devraies have giant species of Antiaristoxicaria, Terminaliabellerica and Tetramelesnudiflora as well as lianas like Entada. Population of the species like Antiaristoxicaria, Sageraealaurifolia, Holigarnaarnottiana, Anamirtacocculus, Buteaparviflora and many species of Amorphophyllus, etc are now restricted only to the groves.

Apart from functioning as repositories of the natural wealth, these groves play an important role in the socio-cultural life of these villages and from an integral part of it. These groves provide a place for village gatherings during festivals, as well as at the time of decision-making with respect to community concerns, such as, beginning of agricultural or developmental activities. In many villages a forest patch is specially preserved as cremation or burial ground. The trees in these groves are both preserved as well as cut, only for the purposes of cremation. Many of these sacred groves have perennial sources of water. Devraies have helped in recharging the wells in their vicinity and have provided the only source of water during water scarcity in dry seasons.