ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला – Online Exhibition Series-67

ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला -67
(23 सितंबर,
2021)

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय अपनी स्थापना के समय से ही मानव जाति की गाथा को, समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में दर्शाने में संलग्न है। संग्रहालय भारतीय विरासत के संरक्षण, सवर्धन और पुनरुद्धार पर केंद्रित है। इसकी अंतरंग और मुक्ताकाश प्रदर्शनियाँ देश भर में रहने वाले विभिन्न समुदायों की लुप्त प्रायः स्थानीय संस्कृतियों की प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है। इस महामारी के दौरान सभी को अपने साथ डिजिटल रूप से जोड़ने के उद्देश्य से इं.गाँ.रा.मा.सं. 200 एकड़ में प्रदर्शित अपने प्रादर्शों को ऑनलाइन प्रदर्शित करने हेतु एक नई श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक जीवन शैली के विभिन्न सौंदर्य गुणों और आधुनिक समाज में इसकी निरंतरता को उजागर करना है।

श्रृंखला के मुख्य आकर्षण में जनजातीय आवास, हिमालयी गांव, मरु ग्राम और तटीय गांव की मुक्ताकाश प्रदर्शनियों में दर्शायी गयी पारंपरिक वास्तु विविधता है। पारंपरिक तकनीकी पार्क मुक्ताकाश प्रदर्शनी में सरल तकनीकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने में रचनात्मक कौशल को दर्शाया गया है। शैल कला धरोहर प्रदर्शनी प्रागैतिहासिक काल के दौरान मानव विचारों और संचार की अभिव्यक्ति का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। पुनीत वन प्रदर्शनी जैव विविधता के संरक्षण के पारंपरिक तरीकों को प्रदर्शित करती है। मिथक वीथि मुक्ताकाश प्रदर्शनी में विभिन्न समुदायों के दैनिक जीवन से संबंधित कथाओं का चित्रण देखा जा सकता है। कुम्हार पारा प्रदर्शनी, भारत की मिट्टी के बर्तनों और टेराकोटा परंपराओं पर केंद्रित है।

वीथि संकुल- अंतरंग संग्रहालय भवन की 12 दीर्घाओं में मानव संस्कृतियों के विविध पहलुओं को दर्शाया गया है। इसके मुख्य आकर्षण में भारत सहित दुनिया भर से संकलित प्रादर्शों को मॉडल, ग्राफिक्स, डायरोमास, शोकेसेस के माध्यम से विषयवार प्रस्तुत किया गया है।

इंगांरामासं की मुक्ताकाश प्रदर्शनी से
परोल: हिमाचल प्रदेश से पारंपरिक प्रवेश द्वार

हिमाचल प्रदेश भारत के उत्तर में स्थित एक राज्य है जो ग्रेटर हिमालय पर्वत शृंखला के मध्य भाग में आता है। इसका विस्तार समुद्र तल से 1148 फीट से लेकर 22966 फीट ऊपर तक है। हिन्दू  परम्परा के अनुसार हिमाचल प्रदेश  हिन्दू देवी-देवताओं का निवास माना जाता है शायद इसी कारण इसे देव भूमि भी कहा जाता है। हिमाचल की अपनी एक परम्परागत वास्तुकला रही है जिसे यहाँ के मन्दिरों, महलों एवं घरों में देखा जा सकता है, इसी समृद्ध और विविधतापूर्ण वास्तुकला को संग्रहालय में दिखाने के लिये संग्रहालय के स्टाफ द्वारा सन् 2001-02 में हिमाचल के चम्बा, किन्नोर, ऊना, लाहुल- स्पिति एवं शिमला जिलों का दौरा किया गया। तत्पश्चात पारम्परिक वास्तुकला को एक द्वार के रूप में निर्माण कर दिखाने का निर्णय लिया गया। सन् 2001-02 में शिमला  से देवदार की लकड़ी तथा धर्मशाला से कटे पत्थर, एक निश्चित माप में कटी स्लेटों एवं अन्य सामग्री का संकलन कर संग्रहालय लाया गया। उसके पश्चात वर्ष 2002 में  कागड़ा से कलाकारों को श्री प्रेम धिमान के  नेतृत्व में संग्रहालय आमंत्रित किया गया। कलाकारों द्वारा गेट का निर्माण प्रारम्भ किया गया। पारम्परिक निर्माण शैली के अनुरूप लकड़ी एवं पत्थरों को एक समान दूरी पर जोड़ा गया। लकड़ी के स्लीपरों के ऊपर पत्थर फिर लकड़ी की चिनाई की गई। छत पर स्लेटों को कीलो के सहारे से इस प्रकार लगाया गया है कि वे तेज हवा या भारी वर्षा से भी खिसक न सके। गेट के सामने लोग प्रमुखतः बाबा बालकनाथ, हनुमान तथा अन्य देवी-देवताओं की आकृति बनाते हैं जिससे प्रवेश  करते समय उन्हें नमन किया जा सके ।

      हिमालय के मन्दिरो में पगोडा, गुवंद, शिखर,  शिवालय, सतलुज, पिरामिडिकल  शैली  के शिखर पाये जाते हैं। इस द्वार को बनाने के लिये कलाकारों द्वारा पगोडा, सतलुज एवं शिवालय शैली  का मिश्रित प्रयोग किया गया है, जो कि हिमाचल के मन्दिरों, महलों एवं पारम्परिक घरों  की वास्तुकला को प्रदर्शित करता है। इस तरह के द्वारों को हिमाचल में अधिकांशतः परोल के नाम से जाना जाता है। संग्रहालय में इसे सन् 2002 में द्वार क्रमांक एक पर निर्मित किया गया है।

Online Exhibition Series-67
(23rd September, 2021)

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya engaged to portray the story of humankind in time and space since its inception. The Museum focuses on salvaging and revitalization of Indian heritage. Its indoor as well as open-air exhibitions showcase the relevance of the vanishing local culture of the different communities living across the country. With the aim of connecting everyone digitally during this pandemic, the IGRMS is presenting a new series of online exhibitions of its exhibit displayed across 200 acres. The main aim of the exhibition is to highlight the varied aesthetic qualities of the traditional lifestyle and its continuity in modern society.

The main attraction of the series includes the depiction of vernacular architectural diversity portrayed in the open air exhibitions of Tribal Habitat, Himalayan Village, Desert Village and Coastal Village. The Traditional Technology Park open air exhibition depicts the creative skills in using natural resources through simple technology. Rock Art Heritage open air exhibition is a remarkable example of expression of human thoughts and communication during the prehistoric times. The Sacred Grove open air exhibition showcases the traditional practices and way of conserving the bio-diversity. The depiction of narratives or stories related to every day life of various communities can be seen in Mythological Trail open air exhibition. The Kumhar Para open air exhibition focuses on the pottery and the terracotta traditions of India.

The indoor museum building Veethi Sankul houses 12 galleries depicting the diverse facets of human cultures. Its main attraction includes the thematically arranged galleries with models, graphics, diaromas, showcases, panels of the valuable ethnographic collections of the museum from different parts of India and abroad.

From open air exhibition of IGRMS
Parol: Traditional Entrance Gate from Himachal Pradesh

Himachal Pradesh is a state situated in northern India, It lies in the central part of the Greater Himalayan mountain range.  Its extension ranges from 1148 feet to 22966 feet above sea level.  According to Hindu tradition, Himachal Pradesh is considered an abode of Hindu gods and goddesses, perhaps that is why it is also known as Dev Bhoomi. Himachal Pradesh has its own traditional architecture which can be seen in its temples, palaces and houses.  To show this rich and vivid architecture in the museum, the staff of the museum, visited Chamba, Kinnaur, Lahul-Spiti, Una and Shimla districts of Himachal Pradesh in the year 2001-02. And, then it was decided to show case the traditional architecture by constructing a gate.  In 2001-02, construction material like deodar wood, stone for walls, slates for roof and other materials were collected from Shimla and Dharamshala and brought to the museum.  In the year 2002, artists from Kangra were invited to the museum to construct the gate under the leadership of Mr. Prem Dhiman. According to the traditional construction style, wood and stones were joined at an equal distance. Stones were laid on top of wooden sleepers, and again wooden sleepers were kept.  The slates were fixed on the roof with the help of nails in such a way that even the strong wind or heavy rain cannot move them.  In front of the gate, people mainly draw the figures of Baba Balaknath, Hanuman, and other deities, so that they can be saluted whenever they enter from this gate.

 A huge variety is found in the Himalayan temples so for as making of their crown portion is concern. A mixture of pagoda, Sutlej and Shivalaya style has been used by the artists to make this gate, which combines the architecture of the temples, palaces and traditional houses of Himachal Pradesh. Such gates are mostly known as Parol in Himachal Pradesh.  In the Museum, it has been built in the year 2002 at main entrance no. 1.

Introductory video on the open air exhibition of IGRMS Parol: Traditional Entrance Gate from Himachal Pradesh