11 से 17 अक्टूबर 2021 तक / 11th to 17th October 2021

‘सप्ताह का प्रादर्श-72’
(11 से 17 अक्टूबर 2021 तक)

कोविड-19 महामारी के प्रसार के कारण दुनिया भर के संग्रहालय बंद है लेकिन यह सभी अपने दर्शकों के साथ निरंतर रूप से जुड़े रहने के लिए विभिन्न अभिनव तरीके अपना रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने भी इस महामारी द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियो का सामना करने के लिए कई अभिनव प्रयास प्रारंभ किए है। अपने एक ऐसे ही प्रयास के अंतर्गत मानव संग्रहालय ‘सप्ताह का प्रादर्श’ नामक एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत कर रहा है। पूरे भारत से किए गए अपने संकलन को दर्शाने के लिए संग्रहालय इस श्रंखला के प्रारंभ में अपने संकलन की अति उत्कृष्ट कृतियां प्रस्तुत कर रहा है जिन्हें एक विशिष्ट समुदाय या क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में योगदान के संदर्भ में अद्वितीय माना जाता है। यह अति उत्कृष्ट कृतियां संग्रहालय के ‘AA’और ‘A’ वर्गों से संबंधित हैं। इन वर्गों में कुल 64 प्रादर्श हैं।

माता की पिछोरी
(महिषासुर के साथ युद्ध में विशद माता की
कथा को दर्शाता चित्र)

कपड़े पर की गई माता की पिछोड़ी नामक इस पारंपरिक चित्रकारी को माता-नी-पछेड़ी या माता-नो-चंद्रवाओ के लोकप्रिय नाम से भी जाना जाता है। माता-नी-पछेड़ी गुजराती शब्द से उद्धृत है, “माता” अर्थात देवी “नी”अर्थात की और “पछेड़ी” अर्थात पीछे। ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति अर्ध-खानाबदोश ग्रामीण कुलों से हुई थी, जिन्होंने स्वयं के लिए चित्रकारी करके कपड़े पर मातृ देवी का मंदिर विकसित किया था। इस की विशेषता इसके मध्य भाग में माता की एक आकृति है जबकि आसपास के क्षेत्र में भक्तों, उत्सव से संबंधित सामग्रियों, फूलों और पशुओं को दर्शाते हुए लघु चित्र हैं। केंद्र में मातृदेवी को बैठी हुई मुद्रा में प्रभावी रूप से दर्शाया गया है। दुष्ट शक्तियों पर विजय प्राप्त करने वाली देवी के इस रौद्र रूप को दोनों तरफ दो दो सिर, हाथों में अस्त्र-शस्त्र और राक्षसों को मारने के लिए दहाड़ते सिंहों के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस चित्रकारी को गुजरात के वाघरी/वागड़ी समुदाय के बीच अत्यंत पवित्र कला माना जाता है।

कपड़े पर चित्रकारी में विशद / विसत माता (बीस भुजाओं वाली शक्ति की प्रतीक) को उनके वाहन पर बैठे हुए, भैंस, भुजाओं में विभिन्न अस्त-शस्त्र, और राक्षसों (महिषासुर) के लंबे बालों को पकड़े हुए दर्शाया गया है। देवी के साथ अन्य देवता, पशु पक्षी, और अन्य रूप दर्शाए गए हैं। एक मान्यता के अनुसार, देवी को शक्ति या सार्वभौमिक ऊर्जा के रूप में व्यक्त किया जाता है। एक पारंपरिक ‘माता-नी-पछेड़ी’ में केवल तीन रंगों का उपयोग किया जाता है, गहरा लाल – यह पृथ्वी का रंग माना जाता है जिसमें उपचारात्मक शक्ति होती है, काला – बुरी नज़र को रोकने वाला और दिव्य ऊर्जा को मजबूत करता है, और सफेद शुद्धता का द्योतक है।

इन चित्रों की अनूठी विशेषता यह है कि एक मंदिर बनाने के लिए कपड़ों के चार से पांच चित्रों का उपयोग किया जाता है। ये खानाबदोश समुदाय देवी के महाकाव्य को चित्रित करने और उनके लिए एक अस्थायी मंदिर बनाने के लिए कपड़े पर इन चित्रों का उपयोग करते हैं। चितारा वे कलाकार थे जिन्होंने मंदिर के कपड़ों को चित्रित किया था। भुवो या भुवा पुजारी हुआ करते थे जो अनुष्ठान करते थे, और जागुआर गायक थे जो पछेड़ियों की व्याख्या करते थे। समकालीन समाज में स्थानीय समुदाय अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर इसे देवी को अर्पित करते हैं।

आरोहण क्रमांक –98.689
स्थानीय नाम माता की पिछोरी- महिषासुर के साथ युद्ध में विशद माता की कथा को दर्शाता चित्र।
समुदाय – लोक
स्थानीयता –अहमदाबाद, गुजरात
माप –लंबाई – 356 सेमी, चौड़ाई – 168 सेमी)

OBJECT OF THE WEEK-72
(11th to 17th October 2021)

Due to spread of COVID-19 pandemic the museums throughout the world are closed but identifying different innovative ways to remain connected to their visitors. Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya (National Museum of Mankind) has also taken up many new initiatives to face the challenges posed by this pandemic. In one such step it is coming up with a new series entitled ‘Object of the Week’ to showcase its collection from all over India. Initially this series will focus on the masterpieces from its collection which are considered as unique for their contribution to the cultural history of a particular ethnic group or area. These masterpieces belong to the “AA” & “A” category. There are 64 objects in these categories.

MATA KI PICHHORI
(A painting depicting the story of Vishad Mata in a battle with Mahishasura)

This traditional painting on cloth known as ‘Mata Ki Pichhori’ has its popular connotation as Mata-ni-Pacchedi or Mata- no-Chandarvao, from the area where it is originated. The term Mata-ni-Pachhedi is derived from the Gujarati word “Mata” goddess “ni” belongs to and “Pachhedi” behind. It is thought to have been originated from the semi-nomadic rural clans who developed their own clothed shrine of Mata Devi with paintings. This shrine-clothe characterises the presence of a bold central feature – an image of Mata while the surrounding spaces are filled with rows of miniatures depicting devotees, paraphernalia of the event and celebration, flowers, and animals. The most prominent image of the mother goddess is shown at the center in a sitting posture. The fierce form of the goddess overpowering the evil forces is illustrated with four heads on both sides, weapons in her hands, and Simhas (Lions) roaring to kill the demons. The painting is considered to be a sacred art among the Vaghri/ Vagadi community of Gujarat.

The painting depicts the deity Vishad/Visat Mata (Symbol of Shakti with twenty hands) sitting on her vahana, the buffalo, holding different weapons in her hands, and two long hairs of demons (Mahisasur)in action. The goddess is accompanied by other deities, birds, animals, and other forms. According to a belief, Devi or Mata is personified as Shakti or universal energy. A conventional ‘Mata-ni-pachhedi’ is used only in three colours, maroon – believed to be the color of the earth with curative power, black – toward the evil eye and strengthening divine energy, and white standing for purity.

One of the unique features of these paintings is the formation of four to five pieces of these hangings to form a shrine for the goddess. The nomadic community uses these hangings to portray the epic of the mother goddess and establish a temporary shrine for her. The Chitaras were the artists who painted the shrine hanging, the Bhuvo or Bhuva used to be the priest who performed the ritual, and Jaguars were the singer who interpreted the Pacchedis. In contemporary society, the local communities use this as an oaring after the fulfillment of their wishes.

Acc. No. 98.689
Local Name  – 
 MATA KI PICHHORI- A painting depicting the story of Vishad Mata in a battle with Mahishasura
Tribe/Community –  Folk
Locality   –  Ahmedabad, Gujarat
Measurement – Length- 356 cm., Width – 168 cm.

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