कुम्हारपारा – Kumharpara -ओडिशा की कुम्हारी एवं टेराकोटा परंपरा -POTTERY AND TERRACOTTA TRADITION OF ODISHA

ओडिशा की कुम्हारी एवं टेराकोटा परंपरा
क्षेत्र: सोनपुर गाँव
राज्यः ओडिशा

सोनपुर नगर ओडिशा के सोनपुर जिले में महानदी एंव तेल नदी के संगम पर बसा है। इतिहासकारों के अनुसार 10-11 वी सदी (C.E.) में सोनपुर को पश्चिम लंका के नाम से जाना जाता था। यह चित्रोपला महानदी के किनारे एवं लंका प्रांत के समीप बसा था। पश्चिम लंका की अधिष्ठात्री देवी लंकेश्वरी थीं। इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व उन प्राचीन मंदिरों से प्रमाणित किया जा सकता है जिनके लिए कुंभकार मंदिर और शाही उपयोग के लिए बडे पात्रों सहित दीपकों के रूप में अपनी सहभागिता देने के लिए एक लंबे अरसे तक जुडे़ रहे। राजाओं के दिन तो चले गए परंतु आधुनिक सोनपुर में मिट्टी के बर्तन और टेराकोटा कला की परंपरा आज भी जारी है। क्षेत्रीय लोगों के द्वारा विभिन्न प्रकार के मृदभांडों एवं दीपों की मांग त्योहारों, दैनिक उपयोग एवं जन्म से मृत्यु तक के अनुष्ठानों हेतु की जाती है। दैनिक उपयोग एवं अनुष्ठानिक मृदभांडों के अतिरिक्त हाथ के साथ-साथ चाक से बनाई गई कई आकृतियां अनुष्ठानों एवं विश्वासों/मान्यताओं से जुड़ी है। टेराकोटा के बैल की आकृतियां पशुधन जो ग्रामीण जीवन का एक अभिन्न अंग है को समर्पित अनुष्ठान पुराण तथा पुराबलादा से संबंध है। इस अनुष्ठान का आयोजन सितंबर मास में भद्ररभा अमावस्या पर बैल के प्रतीकों की पूजा कर किया जाता है। हनुमान जी की टेराकोटा प्रतिकृति लंकापुड़ी जात्रा से जुड़ी है, जो रामायण के लंका दहन कांड की स्मृति कराता है। युवा टेरकोटा निर्मित हनुमान जी की मूर्ति/आकृति की पूंछ में तेल से भीगा कपड़ा लपेटकर आधी रात तक अभिनय करते और दौड़ते है। बाद में पूंछ को दौड के दौरान जलाया जाता है। छत की खपरेलों को पशुओं की आकृतियों से सजाया जाता है। ये आकृतियां बुरी आत्माओं से रक्षा करती है साथ ही बच्चों के मनोरंजन हेतु भी प्रयोग की जाती है।

POTTERY AND TERRACOTTA TRADITION OF ODISHA
Area: Sonepur village
State: Odisha

The Sonepur town is situated on the confluence of the river Mahanadi and Tel in Sonepur district of Odisha. According to historians, Sonepur was known as Paschima Lanka (western Lanka) around 10th -11th century CE. The presiding deity of Paschima Lanka was goddesses Lankeswari. The historic importance of this place can be substantiated from ancient temples to which the Kumbhars (potters) were associated since long for giving patronage in the form of utensils like big pots and lamps for the temple and royal use. Gone are the days of kings but the tradition of pottery and terracotta art continues in modern Sonepur. Pots of different varieties and lamps are required by the local people for festival, ceremony, day to day use and ritual (birth and death) purposes. Apart from the utilitarian and ritualistic pottery, many handmade, as well as wheel, made figurines are associated with the rituals and beliefs. Terracotta bull figurines are associated with Puraunas or Pura Balada rituals dedicated to cattle wealth, the integral part of rural life. The ritual is celebrated by worshiping the bull figurines during Bhadraba Amavasyai in the month of September. Terracotta figurine of Hanuman is associated with Lanka Podi Jatra, celebrated to commemorate the Lanka Dahan episode of Ramayana. Young boys play and race till midnight with the terracotta figurine of Hanuman by tying oil dipped cloth around the tail which is lit during the race. The country roof tiles decorated with animal figurines are associated with the protection from evil spirits and used as a means of entertainment for children.