योटशुंग-योटशा-Yotshung-Yotsha

’’योटशुंग-योटशा’’

(लोहा पिघलाने की पारम्परिक तकनीक)

समुदाय – मईतई

क्षेत्र- ककचिंग   

जिला- थौबल (अब ककचिंग)

राज्य- मणिपुर

      मणिपुर के ककचिंग लोगों के बीच लोहा प्राप्त करने की कला बहुत ही अनोखी है। ककचिंग क्षेत्र के मईतई समुदाय के लोगो के द्वारा लोहा प्राप्त करने की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण भाग उनके द्वारा जमीन के नीचे लौह अयस्क के भंडार को खोजना होता है। ये खनिज भंडार जमीन की ऊपरी सतह पर दिखाई नहीं देते बल्कि 10 से 12 फिट की गहराई में जाकर इनकी पहचान करना होता है। लौह अयस्क के छोटे-छोटे कणों को पहचानने एवं उनको एकत्रित करने की देशज ज्ञान पद्धति व कौशल उन्है विशिष्ट बनाता है। ककचिंग लोगों की लोहा प्राप्त करने की यह तकनीक वर्तमान में प्रचलन में नहीं है। इस प्रदर्श में पारंपरिक भट्टी और धौकनी के साथ-साथ ककचिंग के लौह प्रगलक लोगों द्वारा लौह अयस्‍क को गलाकर लौहा प्राप्‍त करने की प्रक्रिया में उपयोगी उपकरण हैं।

“Yotshung-Yotsha”

(Traditional Iron Smelting Technique)

Ethnic Group: Meitei

District: Thoubal(Now Kakching)

State: Manipur

The process of extracting iron among Kakching people of Manipur is very unique. The most important part of the iron making process among the Kakching is the way they identify the deposits of iron ores in the earth. These mineral deposits are not visible to the surface of ground but have to identify 10 to 12 feet under the ground. The local knowledge systems and skill of identifying and collecting the small pebbles of iron ores makes them very unique. The iron extracting technology of Kakching is no more in practice. On display are the traditional furnace and below along with the forging device used by the Kakching iron smelters in the process of smelting and forging iron.