गणगौर की कथा व अनुष्ठान-THE MYTH AND RITUAL OF GANGAUR

गणगौर की कथा व अनुष्ठान

कलाकार: श्री सखला राम

क्षेत्र: सिरोही, राजस्थान

चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमीं से गणगौर पर्व राजस्थान के सभी लोगों द्वारा, किन्तु गरासिया लोगों द्वारा विशेष रूप से चौदह दिन तक मनाया जाता है। इस्सर तथा गणगौर की लकड़ी की आकृति को सजाकर लड़कियाँ सिर पर रख नृत्य करती हुई गाँव में फेरी निकालती हैं और बाजरे तथा ज्वार की नई बालियों का आपस में आदान-प्रदान करती हैं। प्राचीन काल में कठिन तप द्वारा गौरी ने महादेव को वर के रूप में प्राप्त किया था। क्वाँरी कन्याएँ इसी भावना से गणगौर-इस्सर का व्रत करती हैं, जो शायद गौरी-महादेव का ही लोक प्रचलित रूप माने जाते हैं। यहाँ पत्थरों पर गणगौर पर्व के साथ गरासिया लोगों के विवाह की रस्म का भी निरुपण किया गया है।

THE MYTH AND RITUAL OF GANGAUR

Artist: Shri Sakhla Ram

Region: Sirohi, Rajasthan.

The festival of Gangaur, starting from the ninth day of the bright fortnight of Chaitra month (March-April) is celebrated for fourteen days throughout Rajasthan, especially by the Garasia people. Girls carrying wooden icons of Gangaur and Issar, take out a procession through the village and exchange new sheaves of wheat and maize among themselves. It’s a ritualistic

re-enactment of the ancient myth of Gauri regaining Mahadev as her husband through severe austerities. During Gangaur, the village maidens observe fast in honour of Gangaur-Issar in a similar spirit.