नाग स्थान-THE NAGA SHRINE

नाग स्थान

कलाकार: श्री जगदीश पण्डित, श्रीमती गिरिजा मोइदे, श्री राजेन्द्र कुम्हार

 क्षेत्र: बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि

सर्प पूजा की परंपरा बहुत प्राचीन समय से आज तक देश के समस्त भागों में मिलती है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी के रूप में नागों का पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग-नागिन का मिट्टी में बना जोड़ा चढ़ाकर बिहार के अंचलों में पूजा की जाती है। मध्यप्रदेश के निमाड़-मालवा अंचल में चार सोलह, इक्कीस आदि कई मोड़ वाले नाग चित्रित करने की प्रथा है। सौंप के काटने से मरने वालों की संख्या देश में इतनी है कि उन्हें पूजने और उनके क्रोध से बचने के उपाय की अनेकानेक कथाएँ स्वाभाविक हैं। राजस्थान में इन्हें ताखाजी के नाम से पूजा जाता है तथा इन्हें मिट्टी की प्लेट पर नाग आकृति के रूप में बनाया जाता है।

THE NAGA SHRINE

Artists: Shri Jagdish Pandit, Smt Girija Moide and Rajendra Kumhar

 Region: Bihar, Madhya Pradesh and Rajasthan.

The tradition of snake worship is ancient to Indian Culture. Death by snake bite used to be one of the common events in rural Indian life, following which the fear induced imagination invented ways of worshipping or propitiating the snake as god. The fifth day of the waning moon in the month of Shravan (july-august) is celebrated as the day of the snake or Nagapanchami as it is popularly known as across the country. In Bihar, terracotta images of the snake couple are offered as part of the ritual worship. In the Malwa-Nimar regions of Madhya Pradesh, they paint snakes of four, sixteen or twenty one knots for the same and in Rajasthan it is revered as Takhaji, the hooded snake made in relief on a terracotta plate.