वृन्दावती की कथा-THE MYTH OF VRINDAWATI

वृन्दावती की कथा

कलाकार: श्री दिवाकर मुदुली एवं श्री सुरेन्द्र मुदुली

क्षेत्र: पुरी, उड़ीसा

वृन्दा केदार नामक राजा की पुत्री थी, जिसका विवाह जालंघर नामक दैत्य से हुआ था। वृन्दा ऐसी पतिव्रता थी कि उनके व्रत के कारण ही जालंधर को मारना देवताओं के लिये भी असंभव था। युद्ध में उसके चाहे कितने भी टुकड़े कर दिये जायें वह फिर से जुड़ जाता था। अपने को अजेय पाकर जालंधर ने तीनों लोक में त्राहि-त्राहि मचा रखी थी। तब अंततः विष्णु को स्वयं जालंधर का रूप धारण कर वृन्दावती को छलना पड़ा। इसी तरह जालंधर को मारना संभव हुआ। वृन्दा, विष्णुप्रिया या राधा का ही रूप है तथा कार्तिक माह में वृन्दा व विष्णु के विवाह का पर्व पुरी क्षेत्र में विशेष रूप से मनाया जाता है। तुलसी के रूप में वृन्दा की प्रतिष्ठा समूचे भारत में है। किन्तु कुम्हार द्वारा मिट्टी का चतुर्मुखी तुलसी-चौरा. जिस पर तुलसी की ही कथा अंकित होती है, केवल पुरी की विशेषता है। वृन्दा की तपोभूमि ही आज वृन्दावन के नाम से प्रसिद्ध है।

THE MYTH OF VRINDAWATI

Artists: Shri Divakar Muduli and Shri Surendra Muduli

Region: Puri, Orissa

Vrinda was king Kedar’s daughter who was married to Jallundhar, the demon king. It was her single-minded devotion, that made Jallundhar invincible for Gods. Even when cut into pieces, his limbs would rejoin and he wouldn’t die. Ultimately Vishnu intervened, disguised as Jallundhar and that was how could be killed.

Actually Vrinda is supposed to be the eternal beloved of Vishnu; one of the many names of Radha is Vrinda. That is why in the month of October, the festival of the marriage of Vrinda and Vishnu is especially celebrated in Puri. Vrinda is worshipped as Tulsi or the Basil plant throughout India. However, this four-faced Tulsi Chaura, made by potters which carries the myth of Tulsi herself, is specific to Puri. The city of Vrindavan also derives its name from what was once the land where Vrinda sat in penance and which later got covered with the forest of the Vrinda plant.