सप्ताह का प्रादर्श-EXHIBIT OF THE WEEK-153

सप्ताह का प्रादर्श-153
(
04 से 10 मई 2023 तक)
सुराही (उमर खय्याम),

बीदरी काम का टोंटीदार जग

बिदरी 14वीं शताब्दी में बहमनी सुल्तानों के शासन के दौरान कर्नाटक के बीदर शहर में विकसित एक लोकप्रिय शिल्प है। ऐसा माना जाता है कि इस कला की उत्पत्ति पर्शिया में हुई थी और वहां से कारीगर बीदर आए और शाही परिवारों के लिए उत्कृष्ट कृतियों को बनाने के लिए कारीगरों को प्रशिक्षित किया। जस्ता, तांबा और सीसा बीदरी के पात्रों का मुख्य कच्चा माल है। जड़ने के लिए सोने, चांदी और पीतल के तारों का उपयोग किया जाता है। वर्तमान प्रादर्श एक आकर्षक सुराही है जिसमें चांदी से जटिल पुष्प और ज्यामितीय रूपांकन किए गए हैं।

बिदरी पात्रों को बनाने की प्रक्रिया में चार चरण होते हैं- ढलाई, नक्काशी, जड़ाई और ऑक्सीकरण करना। पहले चरण में कारीगर साँचे में ढालकर वस्तु को आकार देते है। साँचे को बनाने के लिए महीन लाल मिट्टी और गाय के गोबर के मिश्रण का उपयोग किया जाता है। मिश्रण तैयार करने के लिए अन्य अलौह धातुओं के साथ 16:1 के अनुपात में जस्ता और तांबे का उपयोग किया जाता है। मिश्र धातु के इस पिघले हुए घोल को सांचे की खाली जगह में डाला जाता है। दूसरे चरण में धातु की सतह को काला करने के लिए पात्र को कॉपर सल्फेट के घोल में डुबोया जाता है। यह प्रक्रिया डिजाइन बनाने के लिए डिजाइनर को एक गहरे रंग की सतह प्रदान करती है। इस डिजाइन पर शिल्पकार छोटी छेनी का उपयोग कर आकृति उकेरता है। इसके बाद शुद्ध चांदी के महीन तार या चपटी पट्टियों को सावधानी से इन खांचों में ठोंका जाता है। ऑक्सीकरण या काला करना चौथा चरण है जो जड़ाई को नुकसान पहुँचाए बिना सतह पर एक स्थायी काला रंग प्रदान करने की प्रक्रिया है। आधार सामग्री की सतह को काला करने के लिए अमोनिया युक्त सल्फेट को पर्याप्त पानी में मिलाया जाता है और घोल को लोहे के बर्तन में कोयले वाले चूल्हे पर उबाला जाता है। तैयार वस्तु को इस गर्म घोल में डुबाया जाता है जिससे जिंक मिश्रधातु स्थायी रूप से काले रंग में बदल जाती है जबकि चांदी अपनी शुद्धता बनाए रखती है। अंत में कारीगर कोयले के चूर्ण और मूंगफली के तेल के मिश्रण को मलमल के कपड़े से वस्तु पर पॉलिश कर अच्छी चमक प्रदान करता है।

आरोहण क्रमांक 2017.337
स्थानीय नाम : सुराही, (उमर खय्याम),
बीदरी काम का टोंटीदार जग
समुदाय: लोक
स्थान: बीदर, कर्नाटक

Exhibit of the week- 153
(04th to 10th May 2023)
SURAHI, (Umar Khayam)

A spouted jug of Bidri work

Bidri is a popular craft flourished in the city of Bidar, Karnataka during the rule of Bahmani Sultans in the 14th century. This art form is believed to have originated in Persia and artisans from Persia came to Bidar and trained artisans to create masterpieces for royal families. Zinc, copper and lead are the main raw materials of bidriware. Gold, silver and brass wires are used for inlay. The present object is a beautiful surahi with intricate floral and geometric designs in silver work.

The making process of bidriware includes four steps- molding, carving, inlaying and oxidizing. In the first stage artisan cast the item by molding. The mixture of red and fine clay and cow dung are used to make the mould. Zinc and copper in the proportion of 16:1 with other non-ferrous metals are used to prepare the solution. This molten alloy solution is poured into the vacant space of mould. In the second stage, the vessel is dipped into the copper sulphate solution for blackning the metallic surface. This procedure helps the designer to draw the design on a dark surface. The craftsman uses small chisels to engrave the design over the freehand etching. Fine wire or flattened strips of pure silver are then carefully hammered into these grooves. Oxidizing or blackening is the fourth stage which marks the process of imparting a permanent black colour on the surface without damaging the inlay. “For blackening the base material sulphate containing salt ammoniac is mixed in sufficient water and the solution is boiled in an open iron vessel on a charcoal hearth. The finished article is then given a dip in this hot solution. The zinc alloy turns into a permanently jet black colour while the silver retains its purity. Lastly the artisan polish the article by the paste of charcoal powder mixed with groundnut oil with the help of muslin cloth for good shine.


Acc. No. 2017.337
Local Name : SURAHI, (Umar Khayam), A spouted jug of Bidri work
Community: Folk
Locality: Bidar, Karnataka

#surahi #umarkhayam #spoutedjug #bidriware #folk #bidar #karnataka #igrms #museumfromhome #objectoftheweek #ethnograhicobject #museumobject #museumofman #museumofmankind #museumofhumankind #experienceigrms #igrmsstories #staysafe